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कवयित्री संध्या सिंह कृत “मौन की झनकार” (गीत संकलन ) का लोकार्पण - एक विहंगम दृष्टि-डॉ0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव

ओपन बुक्स ऑनलाइन (ओ बी ओ) लखनऊ चैप्टर एवं अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान के संयुक्त तत्वाधान में दिनांक 19-11-2017 को प्रख्यात गीतकार एवं साहित्यकार डॉ धनंजय सिंह की अध्यक्षता में हुए एक कार्यक्रम में शहर की जानी-मानी कवयित्री श्रीमती संध्या सिंह के गीत संकलन “मौन की झनकार” का लोकार्पण पेपर मिल कालोनी स्थित ल इंडिया कैफ़ी आमी अकादमी के सभागार में हुआ. इस अवसर पर मंचस्थ विद्वानों एवं साहित्यकारों में नवगीत की सशक्त हस्ताक्षर पूर्णिमा वर्मन, कवि एवं ग़ज़लकार डॉ.हरिओम, साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र, कवि आचार्य ओम नीरव तथा लेखक राम किशोर मेहता प्रमुख थे. कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीमती रत्ना श्रीवास्तव ने किया.

डॉ. हरिओम ने चर्चित संकलन की समीक्षा करते हुए कहा कि मौन जब गंभीर और दीर्घकालिक होता है तो उसका जब्त टूटने लगता है और उसमें स्पंदन होने लगता है जो कालान्तर में मधुर झंकार बन जाता है. उन्होंने कवयित्री संध्या सिंह की कृति में रूपायित उनकी क्षमताओं की सराहना करते हुए कहा कि वह दिन दूर नहीं जब यही झंकार एक अनहद गूँज के रूप में वातावरण में फैल जायेगी.

ओम नीरव ने संध्या सिंह की काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कवयित्री ने मुक्त कविता से अपना लेखन प्रारम्भ किया और फिर वे गीत के क्षेत्र में आयीं और अब वे छंदाधारित गीत बड़ी गरिमा से लिख रही हैं. उनके गीतों में मात्रिक विन्यास कहीं भी त्रुटिपूर्ण नहीं है, एक-आध जगह जो कमी दिखती है वह प्रूफ रीडिंग की चूक मात्र है. ओम नीरव के अनुसार संध्या जी की भाषा बहुत समर्थ है और वे क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं करतीं. भाव की अनुकूलता को साधने के लि उन्हें उर्दू  भाषा या देशज शब्दों का प्रयोग करने से भी परहेज नहीं है.  दृष्टि, ऋतु जैसे शब्दों के स्थान पर नज़र और मौसम का प्रयोग करना उनकी भाषाई सादगी का प्रमाण है.

मुख्य अतिथि पूर्णिमा वर्मन के अनुसार संध्या सिंह के गीत समाज और मन की गहरी पर्तों को खोल नारी विमर्श का एक विस्तृत अध्याय रचती हैं.

डॉ. अनिल मिश्र  ने कवयित्री के गीतों में आध्यात्मिक तत्वों की पड़ताल की. फेसबुक पर संध्या सिंह ने सफलता के जो झंडे गाड़े हैं, उनका उल्लेख करते हुए कहा कि कवयित्री को उनकी रचनाओं पर दस-बीस नहीं बल्कि ढाई सौ और तीन सौ तक कमेंट्स मिले हैं जो अपने आप में एक मानदंड है.

विशिष्ट अतिथि राम किशोर मेहता ने संध्या जी की रचनाओं को मौन साधक की सार्थक मुखरता के रूप में अभिव्यक्त किया.

 

डॉ० धनंजय सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण में उन क्षणों को याद किया जब लगभग पाँच वर्ष पूर्व उनका परिचय संध्या सिंह और उनकी रचनाओं से हुआ था. कवयित्री की क्षमताओं की थाह लेकर ही उन्होंने सलाह दी थी अपनी रचनाओं का संशोधन कभी किसी की कलम से मत कराना. परामर्श अवश्य लेना पर  उस पर विचार का सहमत होने पर ही अपनी रचना में स्वयं संशोधन करना. डॉ. धनंजय सिंह की यह सम्मति सभी उदीयमान एवं संघर्षरत युवा कवियों एवं साहित्यकारों के लिए एक दिशावाही सन्देश है. संध्या सिंह के नारी विमर्श की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि कवयित्री की कविताओं में विद्रोह है, छटपटाहट है, तहखाने से ऊपर खुली हवा में आकर सांस लेने की जद्दोजहद है परन्तु वह पुरुष विरोधी नहीं है. उसमें घृणा या प्रतिशोध जैसी भावना नहीं है.  राजेन्द्र यादव के नारी विमर्श की विद्रूपता से उन्होंने अपने को अलग कर रखा है.  अंत में संध्या सिंह के उज्ज्वल भविष्य और सफलता की कामना के साथ कार्यक्रम अपने  उत्कर्ष  पर पहुँचा .

ओपन बुक्स ऑनलाइन (ओ बी ओ) लखनऊ चैप्टर के संयोजक डॉ.शरदिंदु मुकर्जी ने कम शब्दों में अपना सारगर्भित धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और सभी को सूक्ष्म जलपान ग्रहण करने हेतु आमंत्रित किया.

 

(मौलिक/अप्रकाशित)







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