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ओबीओ लखनऊ-चैप्टर की साहित्य-संध्या माह जनवरी, 2018, एक प्रतिवेदन -- डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव

ओबीओ लखनऊ-चैप्टर की साहित्य-संध्या माह जनवरी, 2018, एक प्रतिवेदन -- डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव

‘रोहतास एन्क्लेव’ पहुंचते ही दो बातें मन में कौंधती हैं. पहली यह कि यहाँ सामान्य कद-काठी के एक ऐसे पोलरमैन का आवास है, जिसने न केवल अंटार्कटिका में एक इतिहास रचा अपितु जिसकी सरलता और सादगी सदैव एक प्रेरणा का उत्स बनती है. दूसरी बात यह कि मान्यतानुसार ‘रोहतास’ सतयुग के सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व द्वारा बसाया गया एक ऐतिहासिक नगर है.

‘रोहतास एन्क्लेव’ में ओबीओ लखनऊ चैप्टर की गोष्ठियाँ प्रायशः होती रहती हैं. इस बार भारत के गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 2018 को सायं 3 बजे कविता का अखाड़ा एक बार फिर से जमा. इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ० अशोक शर्मा ने की. संचालन की मधुर डोर मनोज कुमार शुक्ल ‘मनुज’ के युवा हाथों में थी.

काव्यारंभ  संचालक  की ‘वाणी वंदना’ से हुआ. वंदना के तुरंत बाद काव्य-पाठ के लिए ‘मनुजने ग़ज़ल  के सजीले फनकार आलोक रावत ‘आहत लखनवी’  को आमंत्रित किया. 

‘आहत’ जितना अपनी उम्दा ग़ज़लों के लिये जाने जाते हैं, उतना ही उनका सुमधुर कंठ भी लोगों में लोकप्रिय है. पहले उन्होंने इतिहास के वीर सपूतों को याद करते हुए वीर रस से ओत-प्रोत एक कविता पढ़ी जिसमें महाराणा प्रताप से सम्बंधित अंश इस प्रकार था –

 

जंगल में रह घास-फूस का बना निवाला खाया

किन्तु नहीं अकबर के आगे अपना शीश झुकाया

जूते की नोकों पर रख ली राणा ने सुल्तानी

रंग मेरा केसरिया बालम खून मेरा बलिदानी

 

‘आहत लखनवी’ ने कुछ नए अंदाज़ की ग़ज़लें भी सुनायी और सभी उपस्थित जनों को ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ बना दिया. एक बानगी यहाँ प्रस्तुत है –

 

आज फिर छत पे मेरा चाँद नजर आया है

क्यों न फिर आज चलो ईद मना ली जाये.

 

गणतंत्र दिवस की गरिमा को नमन करते हुए शरदिंदु मुकर्जी ने सबसे पहले गुरुदेव रवींद्रनाथ रचित “भारत तीर्थ” कविता के कुछ अंश का भावानुवाद अपने शब्दों में सुनाया –

....यहाँ खड़े कर बाहु प्रसारित

नर-नारायण को नमन करूँ मैं

उदार छंद में परम आनंद से

उनका आज वंदन करूँ मैं

ध्यानमग्न है यह धरती

नदियों की माला जपती

यहीं नित्य दिखती है मुझको

पवित्र यह धरणी रे

भारत के जनमानस के सागर तीर में....(मूल बांग्ला से अनूदित)

 

इसके बाद उन्होंने ‘प्रार्थनाशीर्षक से एक स्वरचित कविता सुनायी जिसकी अंतिम कुछ पंक्तियों से पूरी कविता का भाव स्पष्ट हो जाता है –

 

जब तुम आओ,

अपने स्पर्श से मेरी अज्ञानता को झंकृत कर,

नए शब्दों की, नए संगीत की

और हरित वेदना की रश्मि डोर पकड़ा देना,

मैं उसके आलोक में

तुम्हारे आनंदमय चरणों तक

स्वयं चलकर आऊंगा मेरे प्रियतम

 

कवयित्री भावना मौर्य अपनी रवायती ग़ज़लों के लिए जानी जाती हैं. उन्होंने अपने कोमल कंठ से बातरन्नुम ग़ज़ल पढ़कर वातावरण को रससिक्त कर दिया. उनकी एक ग़ज़ल का मतला इस प्रकार है –

दर्द सीने में दबाता जा रहा है आदमी

ग़म छिपाकर मुस्कराता जा रहा है आदमी 

 

‘नवगीत’ विधा में अपनी खास दखल रखने वाले और ओबीओ लखनऊ चैप्टर की मासिक गोष्ठी में पहली बार पधारे कवि अनिल वर्मा ने अपना गीत कुछ इस प्रकार पढ़ा –

 

सिंदूरी सपने पल छिन

हरसिंगार फूल से झरे

डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव ने स्वाधीनता दिवस पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेताओं और प्रतिनिधियों से एक प्रश्न किया -

 

कब वीरों की दग्ध चिता पर कब समाधि पर आओगे?

कब सुख से सूखे लोचन पर करुणा के घन लाओगे?

झूठा नाटक कब तक मरने

वालों पर सविनय होगा?

कब तक अधरों के फूलों से

मातम का अभिनय होगा?

कब तक शव–पर्वत पर चढ़कर तुम परचम लहराओगे?

 

नए साल के स्वागत में उन्होंने आंचलिक अवधी में रचित अपने कुछ ‘बरवै’ छंद पढ़े, जिनके कुछ नमूने यहाँ दिए जा रहे हैं -

 

हमरा मुख का देखौ, तुमहू गाव

नवा साल है आवा खुशी मनाव

 

नया साल नहि तापै सब कुछ खोय

वह तो मानुष नाहीं भकुआ होय 

 

मनोज कुमार शुक्ल ‘मनुज’ अपनी कविताओं के माध्यम से ओज के प्रतिमान बनते जा रहे हैं. व्यवस्था के प्रति उनका आक्रोश अधिकाधिक मुखर हो चला है. वे कहते हैं –

 

चुगलखोर,  मक्कारों को है बाँट रहा जुगनू उजियारा

मौन हुआ सूरज जैसे ही मुखर हुआ काला अँधियारा

 

जानी-मानी कवयित्री संध्या सिंह ने अपनी परिचित भंगिमा में एक बड़ा ही सुन्दर मुक्तक पेशकर उपस्थित सुधीजनों का मन मोह लिया –

 

फूलों में काँटों के नश्तर मालूम है न

गुलदस्ते के पीछे खंजर मालूम है न

लिए हथेली पर क्यों फिरते दिल शीशे का

बात-बात पर उठते पत्थर मालूम है न 

ओबीओ लखनऊ चैप्टर के सौभाग्य से आज की गोष्ठी में जाल-पत्रिका, ‘अभिव्यक्ति’ और ‘अनुभूति’ की प्रख्यात संपादक तथा नवगीत विधा के प्रति समर्पित सुपरिचित कवयित्री पूर्णिमा वर्मन भी उपस्थित थीं. उन्होंने ’राम भरोसे’ शीर्षक की अपनी कविता का पाठ किया. कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं –

 

दुनिया को मर्ज़ी से बाँटा
उसकी थाली अपना काँटा
इसको डाँटा उसको चाँटा
रामनाम की ओढ़ चदरिया 
कैसे आदमज़ात छल रहे-
राम भरोसे!

 

अंत में अध्यक्ष डॉ० अशोक शर्मा ने कमान सँभाली. आपका उपन्यास ‘सीता के जाने के बाद राम’ आजकल सुर्ख़ियों में है. डॉ० शर्मा की रचनाओं में एक अन्तर्हित आध्यात्मिक बोध रहता है जो उनके स्वभाव की अपनी निजी विशेषता भी है, यथा -

 

रस्ते भी, आप भी, हम भी वही हैं

सब वही केवल समय बदला हुआ है. 

 

काव्य-पाठ के बाद गरमा-गरम समोसे और चाय का अपना अलग ही लुत्फ़ है. ओबीओ लखनऊ चैप्टर के संयोजक डॉ. शरदिंदु मुकर्जी एवं उनकी सहधर्मिणी कुंती मुकर्जी का आतिथ्य हमेशा ही आह्लादकारी होता है. सब आस्वाद ले रहे थे और मैं सोच रहा था, यह कवि भी अजीब जीव है -

बरतता है धैर्य जब वह बोलता है

काव्य में कवि अमिय रस सा घोलता है

मौन में उसके छिपी है आग बेशक  

खोलता है मुख अगर तो खोलता है                 

                  (सद्यरचित )

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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