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ओपेन बुक्स ऑनलाइन, लखनऊ चैप्टर का वार्षिकोत्सव – 2019 : एक प्रतिवेदन ::डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव

रविवार दिनांक 24 नवम्बर 2019 को पेपर मिल कॉलोनी, निशातगंज, लखनऊ स्थित कैफ़ी आज़मी अकादमी के सभागार में ओपेन बुक्स ऑनलाइन, लखनऊ चैप्टर ने एक गरिमामय कार्यक्रम प्रस्तुत कर अपना वार्षिकोत्सव मनाया I इस अवसर मुख्य अतिथि थे सुपरिचित साहित्यकार एवं चिंतक-दार्शनिक डॉ. अनिल मिश्र I नगर के जानेमाने छंदकार डॉ. अशोक कुमार पाण्डेय ‘अशोक‘ तथा सहयोगी महाविद्यालय, खुशहालपुर, बाराबंकी के निवर्तमान प्राचार्य डॉ. बलराम वर्मा ने विशिष्ट अतिथि के आसन सुशोभित किए I कार्यक्रम का सूत्रपात करते हुए संस्था के संयोजक डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव ने सभी आगंतुकों का स्वागत किया और ओपेन बुक्स ऑनलाइन लखनऊ चैप्टर का संक्षिप्त परिचय दिया I इसी के साथ कार्यक्रम के प्रथम सत्र का संचालन करने हेतु उन्होंने ओपेन बुक्स ऑनलाइन की कार्यकारिणी के सदस्य डॉ. शरदिंदु मुकर्जी का आह्वान किया I

डॉ. शरदिंदु मुकर्जी के संचालन में कार्यक्रम का समारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष अतिथियों के द्वारा किये गए दीप प्रज्वलन से हुआ I तदनंतर आलोक रावत ‘आहत लखनवी’ ने माँ सरस्वती की सरस वंदना प्रस्तुत की I इसके बाद मंचासीन अतिथियों द्वारा ओपेन बुक्स ऑनलाइन, लखनऊ चैप्टर की स्मारिका पत्रिका, मनोज शुक्ल ‘मनुज’ सम्पादित ‘सिसृक्षा’ एवं डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव के कथा-संग्रह ‘ फिर रोया विभीषण’ का विमोचन किया गया I

आयोजन में अगले कार्यक्रम के रूप में आदरणीय अशोक कुमार पाण्डेय ‘अशोक’ की अध्यक्षता में ‘छंदोबद्ध कविता - पुनर्स्थापना की आहट’ विषय पर विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए. डॉ. बलराम वर्मा ने कहा कि समकालीनता की आँधी में लोगों ने यह मान लिया कि छंद ‘आउट-डेट’ हो गए I सच्चाई यह है कि आँधी से आँखों में धूल भर जाती है और ‘विज़न’ अस्पष्ट हो जाता है I साठ-सत्तर के दशक में जब समकालीन कविता पूरे भारत में फल फूल रही थी, तब डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ ने छंदकारों को प्रोत्साहित करने के लिए यहीं लखनऊ से एक अनूठी अलख जगाई थी I उन्होंने ‘सुकवि विनोद’ नामक पत्रिका निकाली थी जो कई वर्ष तक निर्बाध प्रकाशित हुयी I

डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव ने कहा कि हम जब यह कहते हैं कि ‘छंदोबद्ध कविता - पुनर्स्थापना की आहट‘ तो शायद हम मान लेते हैं कि पूर्व में छंद रचना कदाचित विस्थापित हुयी होगी I परन्तु यह सत्य नहीं है I परम्परावादी कवि और खासकर वे जो छंदों को ही काव्य रचना की कसौटी मानते हैं, उनकी कलम निर्बाध गति से चलती रही I डॉ. लक्ष्मी शंकर ‘निशंक’, बलबीर सिंह ‘रंग’; भारत भूषण, डॉ. गणेशदत्त सारस्वत आदि ने छंद का दामन नहीं छोड़ा I आज भी अशोक कुमार पाण्डेय ‘अशोक’, ओम नीरव जैसे कवि अपनी छंद-बद्ध रचना से ही लोकप्रियता के शिखर पर हैं I इसलिए यह कहना तो बेमानी होगी कि छंद-बद्ध कविता फिर से लौट रही है I सच्चाई तो यह है कि कविता जगत से छंदों का पलायन कभी हुआ ही नहीं I

ग़ज़लकार भूपेन्द्र सिंह का मानना था कि साहित्य एक कला है और उसमें काव्य ललित कला है I ललित कला के जो मूल अवयव हैं कि उसमें सुकुमारता होनी चाहिए, लय होना चाहिये, लालित्य होना चाहिए और मनोरंजकता होनी चाहिए I ये अवयव काव्य में उसकी छंदबद्धता के कारण ही आते हैं I अतः छंदबद्धता निश्चय ही काव्य का अनिवार्य अंग है I परिस्थितियों के कारण लोगों ने इससे अलग जाने की कोशिश की और निश्चय ही उनका दौर भी चला परन्तु उसे ललित कला नहीं कहा जा सकता. काव्य तभी तक कला है जब तक उसमें उसके मूलभूत अवयव विद्यमान हों I

अध्यक्ष आदरणीय अशोक कुमार पाण्डेय ‘अशोक‘ का स्पष्ट मत था कि छंद साधना मांगता है I इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता I अज्ञेय के ‘तार सप्तक’ से मात्रा और वर्ण के बंधन से मुक्त जिन अतुकांत कविताओं का सूत्रपात हुआ, उनमें भी कुछ तत्व अवश्य रहा है, तभी उसे इतनी लोकप्रियता प्राप्त हुयी I मुझे लगता है इन कविताओं में कविता हृदय से न निकलकर बुद्धि से संचालित हुयी है I उसका अपना एक महत्व हो सकता है पर कविता वह है जो हृदय से निकले जिसमें रसात्मकता हो, लय हो , गति हो ,प्रवाह हो और प्रमाता के हृदय को मथ देने की क्षमता हो I यह केवल छंदबद्ध कविता से ही संभव है जो साधना मांगती है जहाँ रस को सिद्ध करना पड़ता है I

उक्त वैचारिक विमर्श के बाद कानपुर से पधारे बाँसुरी वादक एवं ग़ज़लकार नवीन मणि त्रिपाठी ने बाँसुरी वादन की एक उत्कृष्ट प्रस्तुति दी I इनका भरपूर साथ सुश्री सरिता कटियार ने दिया , जिन्होंने मिट्टी के घड़े पर वादन कर सबका मन मोह लिया I

बाँसुरी वादन के बाद डॉ. अनिल मिश्र ने डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव कृत मलिक मुहम्मद जायसी के जीवनपरक उपन्यास ‘पंडितन केर पछलगा ‘ पर विस्तार से चर्चा की I डॉ. मिश्र का मानना था कि यदि पाठक ने इस उपन्यास को पूरा पढ़ लिया तो यह समझिये कि उसने लगभग पचहत्तर प्रतिशत जायसी को जान लिया I उन्होंने कहा कि डॉ. श्रीवास्तव ने इस पुस्तक को गहन शोध करने के पश्चात, पैंसठ वर्ष की अवस्था में लिखा है, जो अपने आप में एक क्रिएशन है I डॉ मिश्र के विचार में यह पुस्तक साधारण पाठक के लिए नहीं लिखी गयी है I इसे लेखक ने जिज्ञासुओं के लिए लिखा है, विद्यार्थियों के लिए लिखा है, शोधार्थियों के लिए लिखा है I यह उनके लिए लिखा गया है जो साहित्य का सच्चे मन से अनुशीलन करते हैं I

कार्यक्रम के आख़िरी दौर में डॉ. अनिल मिश्र की अध्यक्षता एवं मनोज शुक्ल ‘मनुज ‘ के संचालन में ओपेन बुक्स ऑनलाइन, लखनऊ चैप्टर के सदस्यों एवं अतिथियों द्वारा काव्यपाठ हुआ I इस अवसर पर ओ बी ओ लखनऊ चैप्टर की सदस्या संध्या सिंह ने छत्तीसगढ़ से पधारी कवयित्री सुश्री आशा अमित नशीने को शाल और मेमेंटो भेंट कर उनका सम्मान किया I काव्यपाठ के उपरांत सुश्री नमिता सुन्दर ने अतिथियों, आगंतुकों और व्यवस्था में सहयोग करने वाले सभी लोगों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद प्रस्ताव पाठ किया I एक सशक्त और सफल साहित्यिक कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सुधिजनो ने ओ बी ओ लखनऊ चैप्टर को बधाई दी I

(मौलिक व् काशित )

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