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“ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी” अंक-33 (विषय: नीड़ की ओर) में स्वीकृत सभी लघुकथाएँ

(1). आ० महेंद्र कुमार जी
नर्क

‘‘क्या जिसका कोई देश न हो उसका कोई घर भी नहीं होता?’” बिना पेट वाली वह लड़की अभी भी उस सवाल में ग़ुम थी जिसका अभी तक उसे कोई उत्तर नहीं मिला था।
अभी कुछ महीने पहले ही वह अपने पिता के साथ इस देश में आयी थी, सोलह दिन समुद्र में तो बाइस दिन पैदल चलने के बाद। बड़ी मुश्किल से दोनों की जान बची थी। थोड़ी राहत उन्हें तब मिली जब वो शरणार्थी शिविर में पहुँचे। यहाँ उनके जैसे हज़ारों थे।
‘‘क्या हुआ था तुम्हारे साथ?’” किसी ने उसके पिता से शिविर में पूछा। ‘‘क्या होगा, वही जो सबके साथ हुआ।’” और उसके पिता शून्य में खो गये। ‘‘जी भर गया हो तो मारो इन सालियों की छाती पे गोली। इन्हीं से ये सपोलों को दूध पिलाती हैं।’” फौजी अफ़सर ने जैसे ही अपने सिपाहियों से कहा पूरे गाँव में गोलियों की आवाज़ गूँज उठी। बच्चों के गले रेत दिये गये। पहले से बांधे गये युवकों और बुज़ुर्गों को गोलियों से भून दिया गया। बहुत से लोग मार कर नदी में फेंक दिये गये। जहाँ जो भी सामान मिला उसे लूट लिया गया और फिर घरों में आग लगा दी गयी। हर तरफ़ लाशों पर लाशें बिछी थीं। बड़ा ही ख़ौफ़नाक मंज़र था। कुछ एक लोग जो जंगल में भाग कर अपनी जान बचा सके उन्हीं में ये दोनों भी शामिल थे।
शिविर में अक्सर लोग आपस में बातें किया करते थे, ‘‘आख़िर हमारी ही सरकार और हमारे ही सेना हमारे साथ ऐसा कैसे कर सकती है?’” हालात यहाँ बेहतर तो थे पर अच्छे नहीं। लोगों को न तो भरपेट खाना ही मिल रहा था और न ही साफ़ पानी। उनके पास कोई रोज़गार भी नहीं था। नागरिकता तो थी ही नहीं। बच्चों को भी स्कूल में पढ़ने का कोई अधिकार नहीं था। ‘‘मेरे पास दस एकड़ ज़मीन थी पर अब मैं एक बोतल पानी भी ख़रीद कर नहीं पी सकता।’” अपनी एक टांग गँवा चुका शख़्स अक्सर यह कहते-कहते रो पड़ता था। ऐसी ही न जाने कितनी कहानियाँ लोगों की आँखों में तैर रही थीं।
तभी एक लड़का उस बिना पेट वाली लड़की के पास दौड़ते हुए आया और चीख़ते हुए बोला, ‘‘जल्दी चल तेरे पिता को पुलिस वाले उठा ले गये हैं।’” वह बिना एक भी पल गँवाये वहाँ से भागी। उसके पीछे वह लड़का भी चिल्लाते हुए दौड़ रहा था, ‘‘तेरे पिता आतंकवादी हैं क्या? तेरे पिता आतंकवादी हैं क्या?’’
अचानक काग़ज़ का एक टुकड़ा उड़ते हुए उस लड़की के मुँह पर आया और चिपक गया। लड़की वहीं औंधे मुँह गिर गयी। उस काग़ज़ में गुलाबी रंग से परियों की कहानी छपी थी पर वह धूल से इतनी ज़्यादा सनी थी कि उसे पढ़ा नहीं जा सकता था।
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(2).  आ० सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप जी
अंतहीन उड़ान

सूरज ढलने को है। मैं अकेला चौपाल में बैठा उन दिनों के याद में खोया हूँ जब शाम होते ही यहाँ जमघट लग जाती थी। पर आज सिवाय कुछ छुट्टा पशुयों के, कोई नजर नहीं आ रहा है। मैं सुनहरे अतीत को वक़्त के हाथों बर्बाद होते देख वक़्त को कोस ही रहा था कि वक़्त ने आवाज दी-
"अरे गाँव भाई! आप उदास लग रहे हो। सब ख़ैरियत तो है?"
मैं वक़्त की ओर रुख करते हुए बोला - "क्या बताऊँ वक़्त भाई! अपने स्वावलंबी स्वरूप को नष्ट होते इन्ही आँखो से देख रहा हूँ। मैं उदास इस बात से हूँ कि भौतिकवादी विकास किस तरह जड़ों से काट कर हर किसी को परजीवी और बेकार बना रहा है।"
"विकास तो अच्छा ही होता है। और विकास तो समय की माँग है। फिर तुझे विकास से ऐतराज क्यों है गाँव भाई?" वक़्त ने तल्ख होकर प्रश्न दागा।
मैनें भी उसी स्वर में अपनी बात कह दी- "विकास से ऐतराज नहीं है वक़्त भाई! पर विकास के साथ गिरते मानवीय मूल्यों और सामाजिकता को एकाकीपन में बदलते देख मन खिन्न है। एक छप्पर उठाने को जहाँ पूरा गाँव चल पड़ता था आज वहीं जनाजा उठाने के लिए भी बमुश्किल से कंधे मिल पा रहे हैं।"
"परिवर्तन तो सत्य सनातन नियम है गाँव भाई। और तुम इससे वाकिफ़ भी हो, फिर? ।" वक़्त उसी बेरुखी से बोला।
मैं लम्बी साँस खिंचते हुए बोला- "हाँ वक़्त भाई! यह परिवर्तन ही तो है। पहले जहाँ पूरा गाँव बाग बगीचे से घिरा रहता था आज वहाँ एक भी पेड़ दिखाई नहीं दे रहा है। जहाँ दूध की नदियाँ बहती थीं, आज पावडर का दूध बाजार से खरीदा जा रहा है। जिस गाँव में बच्चे बाजरे की रोटी शौक से खाते थे आज पिज्जा बर्गर खा रहे हैं।"
"यह तो लोगों की जीवनशैली में सुधार का नतीजा है, इस बात को क्यों नहीं कह रहे हो। आज लोगों का जीवन पहले से कई गुना बेहतर हो गया है।" वक़्त ने तर्क दिया।
मैं वक़्त की बात बीच में काटते हुए बोल पड़ा- "पर लोगों ने खुद को मशीन के अधीन कर लिया है, आप इसे क्यों नहीं कहते? अब तो संबंध भी फोन पर निभाये जा रहे हैं। त्योहार, लोक संस्कृति, लौकिक रीति रिवाज और परम्पराएं सब बेमानी हो गईं सी लगती हैं।"
वक़्त मुझे समझाते हुए बोला- "केवल नकारात्मक पहलू ही क्यों देख रहे हो गाँव भाई? भले यह समय बाजारवाद का है पर इसने लाखों लोगों को रोजी-रोटी भी दिया है। इसी को नई दुनिया कहते हैं।"
मैं चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक हँसी लिए बोल पड़ा- ‘‘सच में यह नई दुनिया है वक़्त भाई जो सिर्फ लाभ कमाना चाहती है। सम्बन्ध बनावटी तथ बाजारू हो गए हैं। कभी नंगे और भूखे पेट चहकने वाला गाँव, विदेशी जूतों की आभा देख अचानक कुंठित और अतृप्त नजर आ रहा है। नौजवानों की नई पीढ़ी दारू, पान, बीड़ी और पाउच की दीवानी हो गयी’’
वक़्त ने भी मुझपर तंज कसा- "क्या गाँव भाई! आप भी दकियानूस और लकीर के फकीर सी बात करते हो। आज का युवा पहले से ज्यादा शिक्षित और समझदार है।"
मैं झल्लाते हुए बोला-"हाँ, क्यों नहीं। माँ-बाप ने पढ़ाया-लिखाया, बेटा पत्नी के साथ बाहर जाकर बस गया। उसके पास बच्चों और पत्नी के लिए पैसा है पर माँ-बाप के लिए न पैसा है और न वक़्त। बूढ़ी आँखे इंतिजार करते-करते दम तोड़ दे रही हैं। क्या इसी को आप शिक्षित और समझदार बोलते हो?"
वक़्त इस बार मेरे विपरीत कोई तर्क न दे सका। वह बोला-" हाँ गाँव भाई! मैं भी तुमसे सहमत हूँ। शाम के समय तो पंछी भी अपने नीड़ की ओर रुख कर देते हैं। पर यह इंसान! यह तो ऊँची उड़ान के चक्कर मे वास्तविक रास्ता ही भटक गया है।"
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(3).  आ० ओमप्रकाश क्षत्रिय जी
नौकरानी
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पतिपत्नी के नौकरी जाने के बाद बच्चों को संहालने, संस्कारित करने के साथसाथ मनोरंजन करवाने वाली एक अदद् नौकरानी उन्हें नहीं मिल रही थी.
“यह काम तुम ही करो. मैं तो आया कम बाई ढूंढढूंढ कर थक गया हूं.” पति ने अपना पल्ला झाड़ते हुए  कहा.
“बाई तो मिल रही है. वह सर्वगुण संपन्न भी है. मगर, हाथ साफ करना उस की फितरत में शामिल है. इस से बच्चे में क्या संस्कार आएंगे ?” पत्नी ने प्रश्न किया.
“संस्कार के लिए हम उसे बोर्डिंग स्कूल में डाल देते हैं.'
“पिता हो कर,  बच्चों को अपने से दूर करने की सोच रहे हो. “पत्नी ने कहा, “बच्चे मांबाप के पास रह कर संस्कारित होते हैं. यह अटल सत्य है.'
“हमें इतना समय कहां है ? उन्हें संस्कार दे सकें.” पति बोला , “पैसा और ऐशोआराम के लिए नौकरी करना हमारी मजबूरी है.'
'मां बाप बच्चों के लिए अपने सब सुखआराम छोड़ देते हैं ?” पत्नी बोली, “आप कहे तो मैं नौकरी से छुट्टी ले लूँ ?'
“तुम पहले ही बहुत छुट्टी ले चुकी हो. फिर यह समस्या का समाधान नहीं है ?” पति ने बात संहाली तो पत्नी उखड़ पड़ी, '“अब आप ही देखिए कि बच्चों की देखभाल और संस्कारित करने के लिए आप किस तरह की व्यवस्था कर सकते हैं ?'
सुबह के ये संवाद याद करते हुए आफिस से थकीहारी आई पत्नी ने यह जानने की कोशिश की कि बच्चे कहाँ होंगे और क्या कर रहे होंगे . पति ने बच्चो के लिए कोई व्यवस्था की या नहीं ? तभी पत्नी को बच्चों के चहचहाने व हंसनेकूदने की आवाज आई तो उस ने कमरे में जा कर बच्चो से इशारे में पूछा, “क्या बात है ? बहुत चहक रहे हो ?'
'हुरर्र रे ! पापाजी नानी को लेने गए है.” बच्चों ने चहक कर जवाब दिया तो पत्नी की आंखें पति के इस समाधान पर खुली के खुली रह गई, " क्या !"
बच्चों ने वही बात दोहरा दी.
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(4). आ० मनन कुमार जी
वापसी
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-बिलकुल नहीं।
-थोड़ी प्रतीक्षा कर लेती।
-कहा न?अब और नहीं...।
-संघर्ष से ही सफलता मिलती है।
-हाँ दीदी,संघर्ष से ,छलावे से नहीं।
-क्या मतलब है तुम्हारा?
-यही कि हम ठगे गये,बस।
-उँ?
-हाँ।अब बटुआ खाली है दीदी।वापसी के किराये भर के पैसे बचे हैं,वो भी ट्रेन के सेकेण्ड क्लास के।
-मेरे-तुम्हारे जेवर हैं न।देख लेंगे कुछ दिन और।कहीं तुम्हे कोई फिल्म/सीरियल मिल जाये।
-नाटक खत्म हुआ दीदी।पटाक्षेप होना बाकी है।
-समझी नहीं मैं।
-वे गहने ही तो बिकते रहे अब तक,घर-किराये और खाने-पीने के लिए।
-और तुम...
-सादगी का नाटक करती रही ,कि सादगी में रुप निखरता है,रोल मिल जाते हैं।
-मोंटी ने कुछ नहीं किया?
-किया दीदी,किया। उसने मेरे भोलापन से खेल किया',रजनी फफक पड़ी।
-कलमुँहा कहाँ मिलेगा?खून पी जाऊँगी उस हरामी का',बबिता गुर्रायी। रजनी सामान समेटने लगी।
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(5).  आ० तस्दीक अहमद खान जी
आधी रोटी
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अनवर बेरोज़गारी और लोगों के तानों से तंग आकर रोज़ी की खातिर शाहिद के साथ बम्बई तो आ गया मगर उसके हालात देख कर दंग रह गया |वो शाहिद से बोला:
"तुम गाँव जाते हो तो अच्छे अच्छे कपड़ों में नज़र आते हो ,मगर यहाँ ?"
शाहिद बीच में ही बोल दिया:
"यहाँ का हाल वहाँ मत बताना ,यह करीम सेठ की बेकरी है, मैं यहाँ काम करता हूँ और रात को स्टोर में सो जाता हूँ "
अनवर ने फिर पूछा "अलग कमरा क्यूँ नहीं ले लेते हो "
शाहिद ने जवाब में कहा " हम अलग कमरा या खोली लेकर रहने लगे तो कुछ भी नहीं बचा पाएँगे "
अनवर ने फिर काम के बारे में पूछा" क्या काम करना होगा "
शाहिद ने कहा " जो इलाक़ा मेरे पास है ,वहाँ सवेरे चार बजे उठ कर घरों में पाव / ब्रेड पहुँचाना है "
अनवर यह सुनते ही खड़ा हो गया और बोलने लगा " यह तो एक मज़दूर से बुरी ज़िंदगी है "
शाहिद ने अनवर के काँधे पर हाथ रख कर कहा "नोट कमाने के लिए सब कुछ करना पड़ता है "
अनवर ने मायूस हो कर कहा:
"इस ज़िंदगी से तो गाँव की ज़िंदगी अच्छी है ,मज़दूरी ही करनी है तो गाँव कौन सा बुरा है ,वहाँ कम से कम सोने को अपनी छत और खाने को आधी रोटी तो मिल ही जाएगी | "
यह कहते हुए अनवर अपना सामान बैग में रखते हुए शाहिद से बोला:
"रेलवे स्टेशन को कितने नंबर की बस जाती है ?"
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(6). आ० डॉ टी आर सुकुल जी

टूटी बाउंडरी

प्रोफेसर साहब ने घर की टूटी बाउंडरी बाल को रिपेयर कराने के लिए एक मजदूर और मिस्त्री को लाकर काम कराना प्रारंभ कर दिया। मजदूरों से काम कभी कराया तो था नहीं इसलिए, वह उनको काम समझाकर अपने पढ़ने लिखने में लग जाते और बीच बीच में काम का निरीक्षण करने आ जाते। बीड़ी पीते देख वे उन्हें समझाते कि इससे शरीर को बहुत नुकसान होता है। मजदूर भी उनकी बातों से सहमत होते परन्तु तर्क भी देते कि साहब, क्या करें आदत है, थोड़ा सुस्ता लेते हैं । और, जोर से मुंह से धुआॅं बाहर निकालते जिसे देख प्रोफेसर अन्दर चले जाते। दोपहर में मिस्त्री जब खाना खाने अपने घर चला जाता मजदूर वहीं पर बैठ कर साथ में लायी रोटियाॅं, नमक मिर्च के साथ खाने लगता। यह देख प्रोफेसर की दयालु पत्नी उसे अचार और सब्जी दे दिया करती।
काम पूरा होने पर प्रोफेसर ने उनकी मजदूरी के पैसों का भुगतान किया। मिस्त्री तो पैसे लेकर चला गया, मजदूर बैठा रहा। प्रोफेसर की पत्नी ने पूछा, 
‘‘क्या बात है, पैसे कम हैं क्या? लो, बीस रुपये और ले लो।’’
सुनकर मजदूर जोर से रोने लगा इतना कि प्रोफेसर पति पत्नी दोनों को उसे शान्त करने में बहुत प्रयत्न करना पड़ा। शान्त होते ही वह सिसकते हुए बोला,
‘‘माताजी ! पता नहीं अब कहाॅं काम मिलेगा, किस किस की दुतकार , डाॅंट फटकार और गालियां सुनना पड़ेंगी। पिछले सात माह से यहाॅं वहाॅं मजदूरी करते करते पता नहीं क्यों , पहली बार आपके यहाॅं अपने घर जैसा लगा ।’”
‘‘क्यों? पहले क्या मजदूरी नहीं करते थे?’” प्रोफेसर की पत्नी ने आश्चर्य से पूछा।
‘‘नहीं माताजी ! गाॅव में हमारी तीस एकड़ उपजाऊ जमीन है, माता पिता भी हैं। बारहवीं फेल हो जाने पर मैं ही घर की खेती सम्हालने लगा। परन्तु पिताजी की रोज रोज की डाॅंट फटकार से ऊबकर मैं भाग आया और मजदूरी करने लगा। आपके यहाॅं आकर मुझे लगा कि अपना घर ही ठीक होता है। इसीलिए आॅंखे भर आईं । ’’
‘‘अरे बेटा ! अपने घर वापस लौट जाओ, मां बाप तो संतान के भले के लिए ही डाँटते हैं, इसका क्या बुरा मानना?’”
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(7).  आ० विनय कुमार जी
जड़ों की ओर

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उसने उठने के बाद अपने फोन को चेक किया, कोई मिस्ड काल या मैसेज नहीं था| मन फिर से उदासी के भंवर में गोते लगाने लगा, पता नहीं कितने दिन और ऐसे ही बिताना पड़ेगा| वैसे दीदी ने तो कहा था कि बाबा भी तुम्हें उतना ही याद करते हैं जितना तुम करते हो, लेकिन उसे अपनी तरफ से कहने की हिम्मत नहीं थी| आखिर पिछले कुछ महीनों में उसने बाबा की कई फोन कॉल्स को लिया ही नहीं था| लेकिन अब गुस्सा शांत हो रहा था और सबसे बड़ी चीज थी गाँव छोड़ते समय माँ का उदास चेहरा, जो उसे अब बेतरह साल रहा था| 
"तुम्हारे साथ के पढ़े सभी लड़के कहीं न कहीं नौकरी कर रहे हैं लेकिन तुम क्यों गांव पर ही रहना चाहते हो? इस खेती में कुछ नहीं होगा"| बाबा के इस सवाल का जवाब देने की उसने कई बार कोशिश की लेकिन उन्होंने सुनने से इंकार कर दिया| बाबा को शायद अपना अतीत दिखता था और उसके गांव में ही रहकर कुछ करने की इच्छा उनको छलावा ही लगती थी| 
"तुझे पालने में कितनी दिक्कते हुई हैं, तू चाहता है कि तेरे भी बाल बच्चे उसी तरह पलें| हमारी चिंता का बहाना बनाकर यहाँ मत रुक, जाकर कोई अच्छी भली नौकरी ढूंढ़ और फिर अपनी गृहस्थी बसा", बाबा ने अपना फैसला सुना दिया था| आखिर क्यों वह गांव पर ही रहकर कुछ नहीं कर सकता, उसे समझ नहीं आता था|
उस दिन सुबह उठते ही बाबा ने टोक दिया तो उसने अपना आपा खो दिया "आप यही चाहते हैं न कि मैं आपकी नज़रों से दूर हो जाऊँ| ठीक है, आज ही मैं निकल जाऊँगा और फिर वापस नहीं आऊँगा"| और वह उस दिन निकल गया लेकिन बाबा उसके सामने नहीं आये, शायद उसके सामने अपने आप को कमजोर नहीं करना चाहते थे|
"अब तो तू कुछ करने लगा है, एक बार गांव जाकर माँ बाबा को देख आ", दीदी के फोन ने उसे अपनी हिचक तोड़ने पर मजबूर कर दिया | अब उससे रहा नहीं गया और उसने बाबा को फोन लगा ही दिया| बाबा के फोन पर बजती हर घंटी जैसे उसे उनके पास, बहुत पास लेती जा रही थी|
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(8).  आ० मोहम्मद आरिफ़ जी

बँटवारा
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“ कहना तो नहीं चाहिए मगर कहना भी ज़रूरी है । दिल पर पत्थर रखकर कहने जा रही हूँ मेरे बच्चों ।"
" ऐसी कौन-सी आफत की बारिश हम पर होने वाली है माँ ।"
" बात ही कुछ ऐसी है ।"
" हमें यह घोंसला छोड़ना होगा ।"
" क्या कहा !" बच्चों ने एक स्वर में कहा ।
" हाँ , आज सुबह ही घर के मालिक के मुख से सुना है कि वह इस नीम को धराशायी करेगा । वजह बँटवारा । नीम को आँगन से काटकर बीचों-बीच दीवार खड़ी करके अपने दोनों बेटों में हिस्सा करना चाहता है ताकि दोनों में रोज़-रोज़ का झगड़ा ख़त्म हो जाए । नीम आड़े आ रहा है इसलिए नीम को काटकर दीवार खड़ी करना चाहता है ।"
" माँ ये बँटवारा क्या होता है ?" दूसरे बच्चे ने बड़ी मासूमियत से पूछा ।
" मेरे प्यारे इंसानों में बँटवारे की अजब बीमारी फैली है । जिसकी चपेट में जंगल , ज़मीन ,पेड़-पौधे , घर-आँगन सभी आ गए हैं । मैंने दूसरा नीड़ तलाश लिया है ।" और मैना अपने सभी बच्चों को लेकर फुर्र हो गई ।
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(9). आ० प्रतिभा पाण्डेय जी
पिंड दा भ्रा  

उस दिन वो सुबह से ही बाऊजी से खुलकर बात करने की हिम्मत जुटा रहा था I रिनी ने रात को उसे बताया था कि सामने वाली स्ट्रीट में गेरेज चलाने वाले एक पाकिस्तानी के  पिता के साथ आज कल बाउजी की गहरी छन  रही हैIबाउजी टेबल पर थपकियाँ देते हुए पंजाबी गाना गुनगुना रहे थे I
‘“आज ये इतना पुराना गाना कैसे याद आ गया आपको? बचपन में माँ सुनाया करती थी I” बातों का सिरा पकड़ते हुए वो डाइनिंग टेबल में उनके पास बैठ गया I
“तुझे याद है!शुक्र है! मुझे तो लग रहा है कि इन दस सालों में तू और रिनी, गोरों से भी दस कदम आगे वाले गोरे बन गए होI’” बाउजी धीरे से  मुस्कुरायेI
“ऐसा नहीं हैI पर यहाँ के तौर तरीके अलग हैं I’” उसे समझ नहीं आ रहा था बात कैसे उठाये I
“खूब देख लिए तेरे लन्दन के तौर तरीके इस एक महीने मेंI मेरा अगले महीने इंडिया लौटने का टिकट करवा देI घर की याद आ रही है I वैसे मोहम्मद के साथ पार्क में समय अच्छा कटता है आज कलI’” बाउजी टेबल पर थपकियाँ देकर फिर  गुनगुनाने लगेI
“आप उन लोगों के साथ ज्यादा दोस्तियाँ मत बढाओ बाउजीI कई बार इन लोगों के धोखे में हम लोगों पर भी यहाँ के लोगों का गुस्सा निकल जाता है I पिछले सात आठ सालों में माहौल ऐसा बन गया हैI”  एक साँस में बोल गया वो बाउजी से आँखें मिलाये बगेरI
“ कौन इन लोग ! क्या कह रहा है पुत्तर ! वो पंजाब का है,हमारे गाँव का I पार्टीशन के समय आठ नौ साल का था I खूब बातें याद हैं उसे पिंड कीI”  बाउजी का चेहरा तमतमा गया थाI
बाहों में गड़ती रिनी की उँगलियों से उसका ध्यान टूटा I रिनी उसको कसकर पकड़े हुए थीI सड़क में एक तरफ बुरी तरह घायल मोहम्मद पड़े हुए थे I कुछ अंग्रेज़ मवाली अस्सी साल के इस वृद्ध को पीटकर भाग गए थे I
“डज़ एनी बडी नो हिम ?’’गोरा पुलिस वाला कड़क आवाज़ में पूछ रहा थाI
रिनी धीरे से उसके कान में फुसफुसाई  “चलो, चलो यहाँ सेI’’
उस दिन वो बाउजी को बताना चाह रहा था कि उस गाने का मतलब भी याद है उसेI गाने में  माँ अपने बेटे से कह रही है कि बुजदिली का काम करके अपना कायर चेहरा लेकर घर लौटा तो मै घर के दरवाज़े बंद कर दूँगी I पर बाउजी के गुस्से के कारण वो आगे कुछ बात नहीं कर पाया था I हफ्ते भर बाद दिल के दौरे से बाउजी चल बसे थेI
“ डज़ एनी बडी नो हिम ?’” गोरे की आवाज़ इस बार और कड़क थी I
“यस आई डूI”  रिनी का हाथ झटककर वो अब गोरे की आँखों में सीधे झाँक रहा थाI 
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(10).  आ० डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी
नीड़ की ओर

पादरी ने पंजीकृत लिफाफा खोला. उसमें मात्र सौ रुपये का एक चेक था . लिफ़ाफ़े पर प्रेषक का नाम था -आपका कृतग्य . पता अधूरा था . पादरी के चेहरे पर एक अद्भुत मुस्कान फ़ैल गयी –‘आज भी हैं ऐसे लोग “उन्होंने सीने के सामने क्रास बनाकर प्रभु यीशु को याद किया . इसी के साथ उनकी आँखों के सामने हठात उस लड़के का चेहरा नुमांयां हुआ जो कुछ दिन पहले लहूलुहान अवस्था में गिरिजाघर में आया था . उसने पादरी को बताया कि वह वहाँ एक काम्प्टीशन देने आया था, पर उसका एक्सीडेंट हो गया. उसका सारा सामान नष्ट हो गया और पैसे भी किसी ने निकाल लिए. उसने बहुतेरे लोगों से मदद माँगी, पर किसी ने उसकी मदद नहीं की और यह कि वह बड़ी आश लेकर फादर के पास आया है.पादरी ने उस युवक को ध्यान से देखा . उसे चोटें तो लगी थीं, पर गनीमत यह थी की वह चल फिर सकता था . उसकी बेबसी उसके चेहरे से टपक रही थी .
‘वेल बॉय, यह हाउस ऑफ़ गॉड है” -फादर ने गंभीरता से कहा ,”  यहाँ पहले तुम्हारी प्राथमिक चिकित्सा होगी. इसके बाद हम और बात करेंगे .”
पादरी चाहते थे कि युवक कुछ दिन गिरिजाघर में रहकर चिकित्सा कराये और स्थिति सामान्य होने पर अपने घर जाये. पर युवक ने जिद की, “‘फादर, मैं तुरंत अपने घर जाना चाहता हूँ . मेरे न पहुँचने पर मेरे माता-पिता बहुत चिंतित होंगे . वहां जब माँ मेरे सर पर हाथ फेरेगी और पिता सहारा देंगे तो मैं जल्द ही ठीक हो जाऊँगा. फादर, घर तो घर ही होता है न ‘
‘एस माय बॉय “पादरी ने समर्थन में सिर हिलाया ,” यू अर राईट” . फादर के मन   में एक द्वन्द चल रहा था –“ मुझे कॉन्फेशन कराना चाहिए था, पर इससे क्या कराता . यह तो सचमुच दुखियारा है. “
यह सोचते-सोचते पादरी ने अपना पर्स निकाला और युवक के सामने बढाकर कहा –“टेक एज मच यू नीड”
युवक ने सकुचाते हुए सौ रूपये का एक नोट निकाला .
‘टेक मोर, इट विल नॉट बि सफीशिएन्ट .’
युवक ने हाथ जोड़ लिये. पादरी ने फिर कुछ नहीं कहा. वे अपनी कार से युवक को बस स्टेशन ले गए. बस रवाना होने के बाद भी फादर वहीं खड़े रहे और पक्षी को तब तक नीड़ की ओर जाते देखते रहे, जब तक बस आँखों से ओझल न हो गयी.
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(11). आ० अजय गुप्ता 'अजेय जी
अपना काम 
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आज चौदवंहा दिन है विवेक को शहर से गांव लौटे हुए। जब से आया है बदला-बदला सा है।
अपने पिता के साथ अपने ढाबे-गुमठी का हर काम करता है। सामान लाना, साफ-सफ़ाई करना, ग्राहकों से आर्डर लेना, मेज पर कपड़ा मारना, झूठे बर्तन उठाना, उनकी शिकायतें सुनना...सब कुछ। घरवाले खुश भी हैं और हैरान भी।
अभी छह महीने पहले ही तो गया था विवेक इस सब काम को किसी नौकर से करवाने को कहकर। कहता था ये घटिया काम नहीं करूंगा और शहर में जाकर नौकरी करूँगा। फिर अचानक ये परिवर्तन कैसे??
अब यह तो सिर्फ़ विवेक खुद ही जानता था कि उसने छह महीने शहर के छोटे से होटल में वेटर की नौकरी की है।
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(12).  आ० शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी
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नीड़ की ओर 'नीड'
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'ज़रूरतें” आधार हैं 'निर्माण” की। 'निर्माण” के लिए ज़रूरत है साथी की, परिवार की, समाज और राष्ट्र की... यहां तक की वैश्वीकरण की भी! इन सब ज़रूरतों का अब घोषित या अघोषित सा अनुबंध है तकनीकीकरण, आधुनिकीकरण और व्यापारीकरण से उच्च-स्तरीय या निम्न-स्तरीय स्वार्थों की कसौटियों पर! घोंसले मौजूद हैं प्राकृतिक, कृत्रिम या डिजीटल! ये या तो प्रकृति की देन हैं या तैयार किए गए हैं अथवा बड़ी चतुराई से तैयार करवाये गये हैं उद्योगपतियों द्वारा, देश-विदेश की सरकारों या नेताओं अथवा कलाकरों और साहित्यकारों द्वारा, वैज्ञानिकों द्वारा.... या फिर माफिया, आतंकी संगठनों द्वारा अथवा कट्टरपन्थियों या तानाशाहों के द्वारा! ये घोंसले किसके हैं, किसके लिए हैं, इनमें प्रविष्टि हेतु कौन-कौन अनुबंधित हैं और कौन-कौन प्रतिबंधित? यह भी समय की करवट और स्वार्थों अथवा पारस्परिक-स्वार्थ-विनिमय द्वारा तय हो जाता है स्वाभाविक रूप से या व्यावसायिक रूप से!
नई सदी के परिवारों, समाजों, राष्ट्रों, व्यवसायों, फैशनों और तकनीकी-विकासों और उनके लिए घोषित या अघोषित 'ज़रूरतों” पर विचार-विमर्श होता रहा है। नई दुनिया में घौंसले तलाशे जा रहे हैं या तराशे जाते रहे हैं... धरती पर ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष या ब्रह्मांड में भी! 
"ज़रूरतमंद हैरान-परेशान हैं! सब कुछ होते हुए भी बहुत कुछ नहीं है! घर-संसार में, समाज में, देश और दुनिया में; प्रकृति और पर्यावरण में; अंतरिक्ष में; विज्ञान और उसके अनुसंधान में!" मनुष्य भौंचक्का सा सोच रहा है!
"कहां विचरण करना है? किस घोंसले में रहना है? देशी या विदेशी? प्राकृतिक या कृत्रिम; वैज्ञानिक या अवैज्ञानिक?" पुराने ज़माने और नये ज़माने के बुद्धिजीवियों की सोच उलझती ही जा रही है। नई पीढ़ी दुविधा में भागम-भाग मचाये हुए है! 
"आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है! आविष्कार ही विकास का मार्ग है" मनुष्यों के एक बड़े वर्ग का यही समवेत स्वर रहा है!
"नहीं! 'नीड़” की ओर 'नीडी” है इस सदी में। जो विकसित हैं वे 'नीड़” हैं और जो अविकसित या विकासशील हैं, वे 'नीडी” हैं 'ज़रूरतमंद” हैं; बात इंसान की हो, समाज या राष्ट्र की; सबको घोंसले चाहिए!" वास्तव में आज के दौर के मनुष्य का यही राग है, आलाप या प्रलाप है! 
'नीड” ले जाती है 'नीडी” को अपने अभीष्ट 'नीड़” की ओर!
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(13). आ० वीरेंद्र वीर मेहता
अभी दिन ढला नहीं

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"मैं नहीं जानता कि तुम परदेश की जमीन छोड़ कर मेरी चिता को कंधा देने भी आओगे या नहीं क्योंकि पिछले बरस तुम्हे जन्म देने वाली भी तुम्हारी राह देखते-देखते चली गयी। बरहाल उसी की इच्छा अनुसार, मैं अपना सब कुछ तुम्हारे नाम कर रहा हूँ लेकिन......!"
हाल ही में गुजरे मित्र का आखिरी पत्र पढ़ते हुये मैं कुछ देर के लिये रुक गया। मेरी नजरें उसके बेटे 'अमन” पर जा टिकी जो करीबी लोगों के बीच सिर झुकाये बैठा था। पिछले दो वर्षों में बार-बार बुलाने की कोशिश के बाद भी वह नहीं आ सका और अब जब लौटा भी तो, समय गुजर चुका था। कमरे में व्याप्त चुप्पी को तोड़ मैं पत्र आगे पढ़ने लगा।
".... लेकिन इसे पाने के लिये एक छोटी सी शर्त है जो तुम्हे पूरी करनी होगी। हमने तुम्हारी जिद के चलते तुम्हें विदेश भेजा था लेकिन तुम्हारी माँ हमेशा चाहती थी कि तुम अपनी जन्म भूमि पर रहो और यहां के लोगों के लिये कुछ करो। बस, जो वह चाहती थी, वही मैं करने जा रहा हूँ। मेरी वसीयत के अनुसार मेरा सभी कुछ तुम्हारा होगा, यदि तुम यहीं रहकर अपने वतन के लोगों के लिये कुछ कर सको? नहीं तो, मेरा सब कुछ एक ट्रस्ट के अधीन होगा जो हमारे जैसे संतान होते हुये भी संतान-विहीन जीवन जीने वालों के लिये काम करेगा।" पत्र पढ़कर मैं चुप हो गया। सभी की नम आँखें अमन की ओर जा टिकी थी।
"अंकल! आप मेरा एक काम करेंगे!" एक लंबी चुप्पी के बाद अमन मुझसे मुख़ातिब हुआ। "पापा का सब कुछ 'ट्रस्ट” को सौंप दे।"
"हूँ! यानि कि तुम हमेशा के लिये परदेश लौट जाना चाहते हों।" मैं एकाएक और उदास हो गया। "ठीक भी है अब यहां तुम्हारा बचा भी कौन है?"
"नहीं अंकल। मैं लौटकर नहीं जा रहा बल्कि इस बार वापिस लौटने के लिये जा रहा हूँ। उसकी नजरें एक विश्वास से भरी हुयी थी। "माँ-बाऊजी जैसे न जाने कितने 'माँ-बाप” अपने बच्चों के इंतजार में आँखें बिछाये आखिरी लम्हें जी रहे होंगे। यदि दो-चार को भी मैं घर वापिस ला सका, तो मैं समझूँगा कि मैंने माँ की इच्छा पूरी कर दी है।
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(14).  आ० डॉ कुमार सम्भव जोशी जी.
वापसी
.
"तुझे पता नहीं बेटी, तेरी तलाश में पिछले पाँच साल से मैं कहाँ कहाँ नहीं भटका." चाचा ने उसे गले लगा कर कहा.
"माँ बाबा के जाने के बाद चाची के दुर्व्यवहार से तंग आकर घर छोड यहाँ भाग आई थी चाचाजी." उसे लगा कि शायद इतने बरसों में खून का रंग चाचा को खींच लाया था.
"पर तूने तो इतनी जल्दी बड़ी तरक्की की. इतना बड़ा मकान, गाड़ी.." चाचा की आँखें फैल गई.
"घर से भागी लड़की बहुत दिनों तक संघर्ष करती रही चाचाजी. मगर अंत में टूट गई." उसने अटकते हुए कहा.
"क्या मतलब?" चाचा कुछ चौंके.
"ये पैसा मकान गाड़ी सब मेरी देह की कमाई है." उसने नजरें झुका ली.
चाचाजी के गले में कुछ अटकता सा लगा
"देहवृत्ति,... वै**,.. इसे वापस परिवार में लेकर जाना?.." उनके मन में उहापोह हुई.
"नहीं मेरी बच्ची! बहुत झेला है तूने. अब और नहीं." चाचा ने जी कड़ा कर कहा.
"मैं भी बहुत थक चुकी हूँ चाचाजी. अगर इस बँगले की आखिरी किश्त न चुकानी होती तो मैं कब का ये पेशा छोड़ देती. ... पर अब बस; अब घर लौटना ही है." बिखरी हुई सी वह सिमटने लगी.
"नहीं बिटिया!" वे कुछ उचके.
"जब इतना ही सहा है तो थोड़ा और सही. यह किश्त चुक जाए, बँगला अपना हो जाए, फिर हम घर लौट चलेंगें. तब तक कुछ दिन और...." चाचा के चेहरे पर एक अजीब सा भाव कौंध गया.
उसने चाचा के चेहरे पर भरपूर नज़र डाली. आँखों में दर्द और ज़बान में कड़वाहट घुल आई.
"लौट जाओ चाचा! मैं लोगो को कुछ पल के रिश्ते का भरम देकर पैसे बनाने का धन्धा करती हूँ. मुझे लोग वै** कहते हैं. मैं समझ नहीं पा रही कि तुम जैसों को क्या कहना चाहिए?"
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(15).  आ० तेजवीर सिंह जी
आशियाना
.
कबूतर का एक जोड़ा पिछले कई दिन से मेहता जी के घर के  बाहरी हिस्से में अपना घोंसला बनाने का प्रयास कर रहा था। वह जिस स्थान पर भी अपने घोंसले की नींव जमाते, मेहता जी की पत्नी उस जगह झाड़ू मार देतीं। कबूतर का जोड़ा पुनः नयी जगह यही कार्य दोहराते।  लेकिन कुछ समह बाद उस जगह का भी वही हश्र होता। ऐसी क्रिया जब बार बार हुई तो कबूतरी का धैर्य टूट गया। क्योंकि वह अंडे देने की जल्दी में थी|
"क्या मिलता है इन लोगों को, बार बार हमारा घर तोड़ देते हैं"?
"हम लोग तो पक्षी हैं। इनके कुछ नहीं लगते। लेकिन ये तो अपने जाति बंधुओं के भी घर तोड़ने में माहिर हैं"।
"इससे इनको क्या हासिल होता है"?
"इंसान बहुत से कार्य कुछ पाने के लिये नहीं वल्कि दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिये भी करता है"।
"परंतु ऐसा क्यों"?
“इन्हें इसी में आनंद मिलता है। यही तो इंसानी फ़ितरत है। शायद इसी सोच के कारण ये ज़मींन पर रेंगते हैं, वरना हमारी तरह ये भी उड़ रहे होते” |
"इसका मतलब इस तरह तो हमारा घर कभी भी नहीं बन पायेगा"?
"नहीं रे, दुनियाँ बहुत बड़ी है। अब हम इंसानों की बस्ती से दूर किसी बाग बगीचे में अपना आशियाना बनायेंगे"।
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(16).  आ० राहिला जी
तुलसी
.
" मैं इतनी देर से जो समझा रहा हूँ ,तुम समझने की कोशिश करो सुरेश! हमें समाज में रहना है तो समाज के नियम भी मानने पड़ेंगे।समाज को नकारने का दुस्साहस कौन कर सकता है?"
"भाईसाहब!समाज का तो पता नहीं , लेकिन मैं अपनी औलाद को नहीं नकार सकता।"
"फिजूल की बातें मत करो, औलाद हमारी भी है। परिवार में और भी बच्चियां हैं ।उन्हें ब्याहना है या नहीं।"
"तो इसमें मेरी बच्ची बीच में कहाँ से आ गयी? आपने तो देखा था ना, क्या हाल किया था उन लोगों ने मेरी बच्ची का ।"
"ससुराल में छोटी-मोटी लड़ाई झगड़ा तो होता ही रहता है। और रही उनके डिमांड की बात, तो वह कौन सी अनोखी बात है!आजकल कई लोग करते हैं।"
"आपके कहने का क्या मतलब है?"
"मतलब ये है कि कोई अपनी ब्याहता लड़की को महीनों मायके बैठाता है क्या ?"
"भाईसाहब ! ना मैं उन लालचियों को एक धेला नहीं दूंगा ।और ना ही अपनी बच्ची को मरने के लिए दोबारा वहां भेजूंगा... "
" अरे...,जरा समझ से काम लो सुरेश ! लड़कियां अपने घर में ही सुहाती है। तुम ..."
बात पूरी होती, इससे पहले वह भाईसाहब की बात काट कर बोला,
"इन सब बातों को मैं नहीं जानता भाईसाहब! मैं तो इतना जानता हूँ, जिस पौधे को उखाड़ कर मैनें उन्हें सौंपा था।अब उसे वापस अपने  आँगन में रोप चुका हूँ। और  तुलसी किसी और के नहीं,  अपने ही घर में है।"
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(17).  आ० रेणुका चितकारा जी
अपने पराये
.
“ खाना लगा दूँ आपका “ घुटनों पर हाथ रखे थकान को अपनी बनावटी मुस्कान के पीछे छिपाते हुए उमा ने श्यामदास जी से पूछा |
“ अब तो मान जाओ उमा , माना नजर कमजोर है मेरी लेकिन तजुर्बा नहीं मै फिर कह रहा हूँ रूबी वैसी नही है जैसी तुम उसे समझ रही हो “ अखबार को एक तरफ रख श्यामदास जी ने अपने चश्में पर लगी धूल साफ़ करते हुए कहा |
“ सारी दुनिया एक सी नहीं होती जी , बचपन से जानती हूँ उसे ,सगी मौसी से ज्यादा मानती है मुझे वो “  अपनी नज़ारे छिपाते हुए उमा जी ने जवाब दिया |
“ अच्छा....यही बात जरा नजर मिला कर बोलो मुझे, तुम खुद भी जानती हो लेकिन मानना नहीं चाहती " श्यामदास जी ने उमा के चेहरे को घूर कर देखा l
" आप तो नाहक ही ...." कुछ बोलने ही लगी थी उमा जी कि श्यामदास जी फ़िर बोले,
"मौसी मौसी बोल कर जिस झूठे प्यार का दिखावा वो करती है ना.. उसका पर्दा एक दिन जरुर हट जायेगा तब पता चलेगा तुम्हे “ श्यामदास जी की आवाज क्रोध के कारण तेज हो गई थी |
उमा जी ने शब्द उनके भीतर कही दब से गए पर दो मोती आँखों से लुढक कर चुगली कर गए |
असपष्ट स्वर फूटे उमा जी के मुंह से “ यहाँ रुबी की बेटी के साथ मन लग जाता है जी वहां तो कोई भी नहीं बचा अब ...“ |
" जानता हूँ उसकी बेटी का मोह रोकता है तुम्हे “ श्यामदास जी ने अपने क्रोध पर काबू करते हुए कहा | 
उमा ने कुछ जवाब न देते हुए बस अपना सर झुका लिया |
श्यामदास जी ने उनका हाथ अपने हाथो में ले कर कहा “ अपना इकलौता बेटा पराया कर दिया इस शहर की आबो हवा ने , जब अपने खून को हम देहातीयो को अपनाने में शर्म आती है तो रूबी तो तुम्हारी दूर की भांजी है, सोचो वो हमें अपना इतना खर्चा कर यहाँ शहर मे क्यों लाएगी " श्यामदास जी को बस गीली आंखो से देखाती रही उमा जी l
" उसको तो बस एक मुफ्त की आया की जरूरत थी जो उसके और उसके पति के ऑफिस जाने के बाद उनकी बेटी को संभाल सके " कहते हुए श्यामदास जी कुर्सी पर बैठ गये l
"देखना जी समय आने पर अपना बेटी वाला फर्ज निभायेगी वो " ऊमा जी ने एक और प्रयास किया l
" हाँ हाँ...जब वो बेटी के बीमार होने पर माँ का फर्ज निभा सकती है तो तुम्हारे बीमार होने पर बेटी का फर्ज कैसे भूल सकती है , तभी तो इतने तेज बुखार में भी तुमको काम की हिदायत दे चली गई ऑफिस“
श्यामदास जी का स्वर व्यन्गात्मक था l
इतना सुनते ही लाख कोशिश से रोका हुआ आंसुओ का बांध उमा की आँखों से हार गया और श्यामदास जी के कंधे पर टूट गया |
उन्होंने उमा के आंसू पोंछते हुए कहा “ आओ उमा, लौट चलते है अपने छोटे से नीड़ की तरफ वापस गाँव जहाँ परायों में भी सच्चा अपनापन बाकी है बनावटी नही , वहां परायो में प्यार बाटेंगे और अपने हिस्से का प्यार सम्मान कमाएंगे “|
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(18). आ० सतविन्द्र कुमार जी  
अपने लोग अपना देश

“ यू ब्लडी इंडियन…….”
उसके मालिक ने जैसे ही उसे झिड़कना शुरु किया,पहली गाली सुनते ही वह खो गया। चन्द महीने पहले कितने अरमान लिए वह आस्ट्रेलिया आया था। इन दिनों में बीसियों जगह नौकरी कर चुका था। पशुओं की देख-रेख, खेती,घर की सफाई,बैरे का काम,सेल्स बॉय का काम और कईं ऐसे ही काम। हर जगह जी तोड़  मेहनत के बावजूद प्रताड़ना सही। मालिकों की नस्लीय टिप्पणी सुनता गया, नया काम ढूँढता गया। इसी सप्ताह इस फर्नीचर हाउस में काम शुरु किया था।पूरे मन से काम करता रहा। सप्ताहांत पर पारिश्रमिक मिलता है। जैसे-जैसे सप्ताहांत निकट आया इस मालिक के व्यवहार में भी तल्खी आनी शुरु हो गई। आज तो हद ही हो गई। काम धीमा करने का आरोप लगा वह बेइंतहा गालियाँ दिए जा रहा था। सोचता हुआ वह काम छोड़ कर बैठ गया।  मालिक ने उसे नज़दीक आकर झंझोड़ा, “हे व्हाई आ यू सिटीं डॉग?”
अचानक तन्द्रा भंग हुई। उसने मालिक को झटक कर एक तरफ़ किया और अपना सामान पैक करने लगा। मालिक  थोड़ा शांत हो उसकी तरफ देख रहा था। वह सामान उठा फर्नीचर हॉउस से बाहर निकल आया। आँखें झर रही थी। खुद पर गुस्सा आ रहा था। परिजनों के आगे विदेश जाने की ज़िद की थी। बेबस पिता का चेहरा अब नजरों के आगे घूम रहा था।
माँ ने भी रुआँसी हो एक दिन कहा था, “ बेटा! तू एकला बच्चा बख्शा है राम ने। तू ही सात समंदर पार चला जावेगा तो हम किसका मुँह देख के जी लगाएंगे। यहीं कमा-खा लेना। दिन ओखे हों चाहे सोखे सब साथ तो रहेंगे।”
सामान लेकर ज्योंही आगे बढ़ा वही मालिक पीछे से चिल्लाया, “हे लिशन व्हेय आ यूँ गोईं?”
“तुम स्साले गौरे बन्दर...। मेहनत करके ही तो खाना है। अपने लोगों के लिए करूँगा। अपनों के साथ रहकर करूँगा।”
बड़बड़ाते हुए आँखें पोंछी और आगे बढ़ गया।
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ओ बी ओ लाइव लघुकथा गोष्ठी अंक- 33, के कुशल संचालन,संकलन और प्रकाशन हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय योगराज भाई जी।इस बार आपकी लघुकथा का इंतज़ार ही करते रहे।आशा पूर्ण नहीं हुयी।सादर।

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी आदाब,

                                        लघुकथा गोष्ठी अंक-33 के कुशल संचालन, समीक्षात्मक टिप्पणियों और हौसला अफज़ाई  के लिए बहुत-बहुत-बहुत हार्दिक बधाई । यह अंक अपने पिछले अंकों की तुलना में संख्यात्मक मान की निगाह से थोड़ा कमज़ोर रहा । मात्र तीन महिला लघुकथाकार लेखिकाओं ने भी रूचि नहीं दिखाई , पता नहीं क्यों ।आशा है आगामी अंक काफी धमाकेदार होगा और उसका शीर्षक भी अच्छा आएगा ।

मुहतरम जनाब योगराज साहिब , ओ बी ओ लघुकथा गोष्टी अंक-33 के त्वरित संकलन
और कामयाब निज़ामत के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ |

आद0 योगराज भाई जी सादर अभिवादन।लघुकथा गोष्ठी अंक 33 के कुशल सन्चालन और संकलन के लिए हार्दिक बधाई निवेदित हैं। सादर

लघुकथा गोष्ठी के सफल आयोजन व संपादन के लिये बधाईयां आद० योगराज प्रभाकर जी ।सभी कथाकारों को बधाईयां व शुभकामनायें ।

  एक और बेहतरीन बहुआयामी विषय पर लघुकथा गोष्ठी के सफल आयोजन पर आप सभी को तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद। मेरी रचना को संकलन में स्थान देने (क्रमांक-12 पर)  व हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया। इस बार मंच संचालक महोदय व आदरणीय रवि प्रभाकर जी की टिप्पणियां हासिल न हो सकीं। एक समग्र समालोचना/ मार्गदर्शन का निवेदन करना चाहता हूं। सादर।

सफल आयोजनों की श्रंखला में एक और कड़ी का इजाफा करता इस बार का आयोजन, और आयोजन से जुड़े सभी गुणीजन मित्रों सहित आदरणीय योगराज प्रभाकर जी को हार्दिक बधाई। संकलन में मेरी रचना को शामिल करने के लिये दिल से आभार आदरणीय। रचनाओं पर मिलने वाली मित्र जनों की टिप्पणियों के मद्देनजर एक सुझाव देना चाहूँगा। रचनाओं पर बधाई और वाह-वाही की टिप्पणियों के साथ यथा संभव हमे कोई सुझाव या कमी का उल्लेख भी करना चाहिये। वरिष्ठजनों के साथ सभी अन्य साथियों की ये सह प्रक्रिया निःसंदेह आयोजान को और मुखर बनाने में सफल होगी, ऐसा मेरा विश्वास है। आशा है इसे अन्थया नहीं लेंगे मित्र जन। एक बार फिर से सादर बधाई।

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