For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-36 में स्वीकृत लघुकथाएं

(1).  आ० तेजवीर सिंह जी 
क़ुदरत की मार 

कल लगने वाली साप्ताहिक हाट के लिये,  भीकम अपने खेत की सब्जियों पर एक नज़र मार कर देख रहा था कि कौन कौन सी सब्जियाँ हाट में ले जाने के लिये तैयार हैं।
फिर उसने इधर उधर देख कर , चुपके से, अपने थैले से एक इंजेकशन लगाने वाली सिरिंज निकाली और  छोटी छोटी,  दो तीन इंच लंबी ,  अल्प विकसित लौकियों में एक एक बूंद दवा, सिरिंज द्वारा डालने लगा।
"यह क्या कर रहे हो भीकू"?
भीकम ने घबराहट में, चौंक कर, सिरिंज छुपाते हुये,  चारों ओर नजर दौड़ाई। कोई नहीं दिखाई दिया। वह असमंजस में कुछ देर गुमसुम बैठा रहा|
थोड़ी देर बाद फिर उसने डरते डरते दूसरी छोटी सी लौकी को हाथ में उठाया।
"तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया भीकू"?
"अरे भाई, कौन हो तुम? दिखाई क्यों नहीं दे रहे"? भीकम ने थोड़ी हिम्मत दिखाते हुये पूछा|
"कैसी बात कर रहे हो? मैं तो तुम्हारे सामने ही हूँ। जिस लौकी को तुम हाथ में लेकर दवा देने वाले हो, उसी को जन्म देने वाली बेल हूँ"।
"ओह, तो यह तुम हो, बोलो, क्या कहना चाह रही हो"? भीकम ने भय मुक्त होते हुये कहा।
"तुम मेरी इन छोटी छोटी, नाज़ुक लौकियों को यह दवा क्यों दे रहे हो"?
"इससे ये सब बहुत जल्दी बड़ी हो जाती हैं"?
"क्या तुम जानते हो कि इन लौकियों की सब्जी खाने वाले बच्चों पर इनका क्या कुप्रभाव पड़ता है"?
"मैंने तो ऐसा कुछ भी नहीं सुना"?
"ये हार्मोन के इंजेकशन हैं। ये केवल उन पशुओं से दूध निकालने के लिये प्रयोग किये जाते हैं, जिनका बच्चा जन्म लेते ही मर जाता है"।
"मगर कुप्रभाव से तुम्हारा क्या तात्पर्य है"?
"जिस तरह समय से पूर्व मेरी छोटी लौकियाँ रातों रात बड़ी हो जाती हैं, उसी प्रकार, इनकी सब्जी खाने से, छोटी बच्चियां भी समय से पूर्व परिपक्व हो जाती हैं"।
इतना सुनते ही भीकम का माथा चकराने लगा| उसके हाथ पैर काँपने लगे| उसके हाथ से इंजेकशन की सिरिंज छूट कर गिर गयी। उसे खड़ा रहना दुश्वार होगया। उसका शरीर निर्जीव सा हो गया। वह धम्म से सिर पकड़ कर बैठ गया।
उसकी पत्नी के रात को कहे हुए शब्द उसके मस्तिष्क पर हथौड़े की तरह बार बार चोट कर रहे थे,
"सुनो जी, अपनी कमली आठ साल की उम्र में ही महीने से होगयी"?
--------------------------
(2). आ० मोहम्मद आरिफ जी
विषैला

बहुत समय पहले की बात है। दो गहरे दोस्त थे साँप और बिच्छू । एक दिन दोनों ने आपस में ख़ूब मज़ाक और अठखेलियाँ की । मज़ाक ही मज़ाक में दोनों ने तय किया कि चलो आज अपना सारा विष किसी पात्र में निकालते हैं ।
देखें उसके बाद क्या होता है ? साँप बोला-" विष निकालने के लिए कोई पात्र चाहिए ।"
बिच्छू -" वो देखो , उस पेड़ के नीचे एक पुराने और सूखे नारियल की कटोरीनुमा खोल पड़ी है । वही ठीक रहेगी ।" साँप ने हामी भर दी । दोनों वहाँ पहुँचे । बारी-बारी से दोनों ने अपना विष खोल में उतार दिया । दोनों दूर जाकर परिणाम देखने लगे। अचानक उन्हें पत्तों के खड़खड़ाने की आवाज़ सुनाई दी ।
" देखो...देखो...देखो.... वह हमारा विष चुराकर भाग रहा है ।" बिच्छू ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा ।
" कौन है वह ?" साँप बोला ।
" अरे ! वही जाना पहचाना इस धरती का नीच हरामी इंसान ।" बिच्छू बोला ।
" मगर वह हमारे विष का क्या करेगा ?" साँप ने ज़ोर देकर पूछा ।
" कुछ नहीं वह सबको बाँटेगा । मतलब जगह-जगह विष घोलेगा । सदियों से यही करता आया है कमीना ।" बिच्छू क्रोध से बोला । और देखते ही देखते इंसान विष लेकर रफू चक्कर हो गया । विष रहित योद्धा निरीह दिख रहे थे ।
------------------
(3). आ०  नयना(आरती)कानिटकर जी 
"आर्तनाद"

अब मैं और अर्जुन आमने-सामने थे. इस संग्राम में हम दोनों ही बराबर थे.कई बार पार्थ के धनुष की प्रत्यंचा काटने के बावजूद भी वे प्रकाश की गति समान पलक झपकते ही पुन: प्रत्यंचा चढ़ा लेते . हम दोनों के बीच दैवीय अस्त्रों के प्रयोग से घमासान चल रहा था. मैनें जैसे ही उसके शिरच्छेदन के लिए नागास्त्र का प्रयोग किया श्री कृष्ण ने उसी समय रथ को थोड़ा भूमि में धँसा लिया और वह बच गया. यद्दपि युद्ध गतिरोध पूर्ण हो रहा था किंतु मैं भी तब उलझ गया जब मेरे रथ का पहिया धरती में धँस गया. मैने धनंजय से बार-बार अनुरोध किया कि नियमों का पालन करते हुए बाण चलाना बंद करे किंतु----
मेरा शरीर अर्जुन के बाणों से छिद्रित रहा था. मैं असहाय सा था. मेरा अंतिम समय निकट जान पड रहा था. बहुत कुछ मेरे आँखो के आगे चल चित्र सा चल रहा था कि कैसे गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र की शिक्षा इसलिए नही दी कि मैं क्षत्रिय नहीं था. परशुराम ने मुझे शिक्षा तो दी... मगर साथ ही श्राप से सब हर लिया. अपने अज्ञात माता-पिता के लिए मेरा हृदय हाहाकार करता , मैं शून्य से लड़ता,तड़पता अनगिनत प्रश्न करता रहा किंतु सब मौन.जब माता कुंती से अपने जीवन का इतिहास सुना तो मेरा हृदय विक्षिप्त सा हो गया.एक तथाकथित दिव्य पिता की संतान को कितना अपमान सहना पडा. मेरे पिता सदैव मुझे अपनी आँखो के सामने अपमानित,आहत पीड़ित देखते भी मौन रहे.
द्रौपदी स्वंयवर मे भी मेरे युद्ध कौशल, शरीर सौष्ठव को देखकर उसके आँखो मे आयी चमक को मैं आज तक नहीं भुला पाया.मेरे धनुष पर प्रत्यंचा चढाते ही घटोत्कच द्वारा सुतपुत्र कहकर मुझे अयोग्य ठहराया गया. द्रौपदी मुझे वर ना पाई . इसमें उसकी क्या ग़लती थी फिर भी अपमान के ताप में जलता मैं द्युतक्रिडा के वक्त उसे वैश्या कह गया और वही से महाभारत के युद्ध का बिगुल बज उठा.
सच को स्वीकार्य करुं तो हर बार मुझे छला मेरे आत्मभिमानी सहचरों ने मेरे पिता ने, गुरु द्रोण ने, परशुराम ने ,घटोत्कच ने और यहाँ तक कि पितामह ने भी जो सत्य के ज्ञाता होने पर भी दुर्योधन के साथ मेरी मित्रता पर आँखें मूंदे हुए थे.
"हे माते! मैं आज समझ रहा हूँ कि जब एक अभिमानी पुरूष ही पुरूष को छलने की कुटिल चाले चलता रहा तब आप एक कुँवारी माँ बनकर कैसे मुझे स्वीकार कर पाती. आपको वर के रुप में मुझे सौंपना भी एक छल का ही तो हिस्सा था वर्ना क्या वे इसका परिणाम जानते ना थे.
पितृसत्ता के साये में भाई द्वारा रोक देने पर द्रौपदी भी मुझे कैसे वरण करती. उसे वैश्या कहने का प्रतिफल ही ये महायुद्ध हैं.
" हे द्रौपदी! तुम वाचाल नहीं हो!. अपने पंच पतियों को ललकारने के लिए तुम्हारे हिम्मत के आगे आज में नतमस्तक हूँ.
मेरे सहित कुंती, द्रौपदी सभी दंभी पुरूषसत्ता के छल की शिकार हुई हैं.
"हे सर्वशक्तिमान ! मुझे क्षमा करना अगले जन्म मे मुझे माता कुंती के उदर--------एक स्त्री के साथ छल कि सजा......" तभी पार्थ के दैविय अस्त्र से शिरच्छेदन....
------------------------
(4). आ० सुनील वर्मा जी
वापसी

कमरे को बंद करके बैठे बेटे का दरवाज़ा दूसरी थपथपाहट पर भी नही खुला तो नमिता ने चिंतित होकर पति की तरफ देखा।
पति ने एक और कोशिश करने को कहा तो वह दरवा़जे को थपथपाते हुए दोबारा बोली 'गुड्डू, बेटा कम से कम कमरे की सफाई तो करने दे।'
कुछ देर की शांति के बाद दरवाज़ा खुला जिसके हत्थे को पकड़े हुए लड़का वहीं खड़ा रहा।
'अंदर अकेला बैठा क्या कर रहा है? बाहर टीवी देख ले।' कहते हुए नमिता पास रखी झाड़ू उठाकर उसके कमरे में दाख़िल हुई।
'नही मैं यहीं ठीक हूँ। आप जल्दी से कर लीजिए जो आपको करना है।' प्रत्युत्तर में उसने सवाल को अनसुना करते हुए जवाब दिया।
तभी नमिता ने अपने पति की तरफ घूमते हुए कहा 'सुनिये आज आप ऑफिस नही जा रहे हैं न..?'
पति के चेहरे पर अपने सवाल को न समझ पाने का भाव पढ़कर उसने अपनी भवें ऊँची की। ईशारों से परिस्थिति को समझते हुए पति ने सहमति जतायी 'हाँ, आज तो घर पर ही हूँ। बोलो क्या काम है?'
'सफाई तो बाद में भी होती रहेगी। चलिये न, आज 'लूडो' खेलते हैं कितने दिन हो गये।' नमिता ने झाड़ू को एक तरफ रखा और कमरे में रखे एक बॉक्स को उठाते हुए कहा।
अब तक लड़के का पिता भी कमरे में आ गया था।
'आईडिया तो अच्छा है। चलों फिर यहीं खेलते हैं।' कहकर पिता ने उस बॉक्स से एक बोर्ड निकालकर लड़के के बेड पर बिछा लिया।
'अररे, आप दोनों बाहर खेल लो न।' लड़का झुंझलाया।
'नहीं, आज तेरे कमरे में ही खेलते हैं। तू भी आ जा।' पिता ने कहते हुए बोर्ड पर गोटियाँ जमायी।
'नही आप ही खेलिये।' कहकर लड़का वही पास रखी कुर्सी पर बैठ गया।
पति पत्नी खेलते हुए एक स्तर आगे पहुँचे तो पिता ने पासे के साथ साथ गर्व भरे बोल उछाले 'देखना तुम मुझे हरा नही पाओगी।'
नमिता ने कनखियों से बेटे की तरफ देखते हुए कहा 'सही कह रहे हो आप। मेरी तो किस्मत ही खराब है। कभी सही नम्बर नही आते। आपको कोई हरा सकता है तो वह एक अकेला गुड्डू है।'
रोमांचक स्तर पर पहुँच चुके खेल को देखकर गुड्डू कब दूर से पास आकर खेल में शामिल हो गया उसे पता ही नही चला।
अपनी माँ के स्थान पर खेल रहे लड़के ने जल्द ही परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर लिया था। धीरे धीरे कमरे में बिखरी उदासी खिलखिलाहट में बदलने लगी।
पति पत्नी ने एक दूसरे की तरफ देखा। परीक्षा में मिली असफलता के कारण अपना आत्मविश्वास खो चुके उनके बेटे की जिंदगी में वापसी हो रही थी।
उसकी नजरें बोर्ड में गड़ी देख पिता ने नमिता की तरफ एक आँख दबाते हुए कहा 'भइई तुम्हारा बेटा जीतने जा रहा है। कुछ मीठा बनता है के नही..'
अपनी गीली कोरों को साफ करके एक मुस्कराहट के साथ वहाँ से उठते हुए नमिता बोली 'हाँ..हाँ क्यूँ नही, आप दोनों खेलो। मैं चाय बनाकर लाती हूँ।'
-------------------------
(5).  आ० शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी 
"युद्ध कर" :

उसने रसोई और बेडरूम से हासिल दोनों चिट्ठियों के टुकड़े-टुकड़े किये और बैठ गया जवाबी चिट्ठी लिखने के लिए। दोनों बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। वह बेडरूम में लेटी हुई थी। थका हुआ तो वह भी था, लेकिन दूसरी वाली ताज़ा चिट्ठी में तो हद पार कर उसकी बीवी ने अपनी सासू-अम्मी और देवर-देवरानी के बारे में ऊट-पटांग इल़्ज़ाम लगा कर उन्हें और अपने शौहर को अपनी ख़ुदक़ुशी के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था, जो उसने अभी तक की ही नहीं थी! आधा ख़त लिख कर वह‌ उसे पढ़ने लगा :

"मेरी लैला 'नाज़ो',

अच्छा है कि तुम अपनी भड़ास यूं निकाल देती हो। तुम मुझसे परेशान हो, मेरी अम्मी और अपने देवर- देवरानी को क्यूं लपेट रही हो? ऐसी बेवक़ूफियां क्यों? तुम्हारा मुझसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा होना किस काम का? ठीक है, हमारे ख़्यालात और तौर-तरीक़े बेमेल हैं। शादी के पहले हम यह महसूस नहीं कर पाये। मरे जा रहे थे एक दूसरे के लिए! तुमने यह भी नहीं सोचा कि मैं कम पढ़ा-लिखा अॉटो चलाने वाला ग़रीब हूं! मेरा क्या कसूर। तुम्हारी तीनों छोटी बहनों की ख़ातिर तुम्हारे अब्बू ने तुम्हारी शादी मुझसे कर दी! हम समझे कि उन्हें हमारा प्यार कबूल है! हमने सोचा कि तुम मुझे इज़्ज़त दोगी, प्यार करती रहोगी। क्या पता था कि नौकरी करते हुए रईस सहेलियों और टीवी धारावाहिकों के असर से तुम यूं मुझ पर हावी होने लगोगी। तुमने मुझे कई बार तलाक़ के लिए उकसाया, बहस के हालात पैदा किए। लेकिन मैं चुप ही रहा। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि हमारे बीच तलाक़ जैसे हालात बनने लगे हैं। मुझे मेरे प्यार पर भरोसा बना रहा। ..... लेकिन मैं तलाक़ नहीं दूंगा, यह तुम अच्छी तरह समझ लो! बच्चे बड़े हो रहे हैं!"
इतना ख़त पढ़ कर उसने बेडरूम पर नज़रें दौड़ाईं। खुर्राटों के सुपरिचित सुर सुनाई दे रहे थे।‌ रोज़ की तरह थक गई होगी। यह सोच कर अपनी थकान भूल उसने देखा कि बीवी के बगल में दोनों बच्चे सो चुके थे। वह ख़त आगे लिखने लगा :


"मैं तुम्हें तलाक़ क्यों दूं। क्या कमी है तुम में? मेरी पसंद की हो! लड़ाई-झगड़े और बहस तो सब में होती है, रईसों में भी! कई बेमेल रिश्ते हो जाते हैं मुहब्बत या मज़बूरी के नाम पर! तुमने कितनी बार मेरी बेइज़्ज़ती कितने लोगों के सामने की! मैंने भी तुम्हारी की! तुमने हमारे मायके वालों को बुरा-भला कहा, तो मैंने तुम्हारे! बात बराबर! फिर तलाक़ या ख़ुदक़ुशी जैसे इरादे क्यों? मुझ में और तुम में सिर्फ यही फ़र्क है नाज़ो कि मैं अपनी औक़ात में रहकर ज़मीं पर रहता हूं! दिन-रात मेहनत कर के पैसे कमाता हूं ! लेकिन मुझसे ज़्यादा पढ़े-लिखे होने के सबब से और सरकारी नौकरी करने की वज़ह से कम मेहनत में ज़्यादा पैसे कमा कर, ग़लत सहेलियों के साथ तुम हवा में उड़ने लगी हो, अपनी व मेरी औक़ात से बाहर जा रही हो! ख़ुदा गवाह है कि मैंने न सिर्फ़ तुम्हें अपने बजट में ख़ुश रखने की कोशिश की है, बल्कि वक्त-व-वक़्त तुम्हें समझाता रहा हूं कि बच्चों पर ध्यान दो, बच्चे अब बड़े हो रहे हैं! तुम मेरी ज़रूरतें पूरी कर सकती हो, लेकिन करती नहीं हो! मैं तुम्हारी ज़रूरतें पूरी कर सकता हूं, लेकिन तुम्हें पता नहीं कौन सी हवा लग गई है? ... और ये इस तरह की चिट्ठियां रसोई में और बिस्तर के नीचे छिपाना कहां से सीखा तुमने? सहेलियों से या टीवी चैनलों के धारावाहिकों और फ़िल्मों से? मुंहफट बहस करने की तरह? तुम्हें मालूम है कि मैं और मेरी अम्मीजान चुपचाप यह सब बर्दाश्त कर रहे हैं, क्योंकि तुम हमारी सहारा भी हो! लव-मैरिज है हमारी, कोई मज़ाक नहीं! तुमने ख़त में अपने जमा पैसे सिर्फ बच्चों के नाम करने की बात लिखी? मैं इतना बुरा हूं, मुझ पर भरोसा इतना कम? कब से? मैंने तो कहीं कोई भी कमी नहीं छोड़ी! तुम भी मेरा पूरा ख़्याल रखती ही हो!न मुझमें कोई ऐब है, न ही तुम में!"
इसके बाद उसने ख़त के अंत में लिखा - " मुझे पता है कि कुछ दिनों में फिर सब ठीक हो जाएगा। अधिकतर लोगों की ऐसी ही ज़िन्दगी कटा करती है!"

आख़िर में अपने दस्तख़त कर उसने ख़त बिस्तर के नीचे दबा दिया। फिर पलंग पर लेट कर अपने ही हाथों अपना सिर दबाता हुआ अपने जिस्म की मालिश सी करके वह भी औंधा सो गया।
--------------------------
(6).  आ० कनक हरलालका जी 
सतीत्व
.
इधर सुबह किचन में चाय का पानी खौल रहा था, उधर ड्राइंग रूम में रवि कल रात की पार्टी के बाद से गुस्से में खौल रहा था। बेसब्री से इंतजार कर रहा था रेखा चाय लेकर आए तो कप में गिरती गरम गरम चाय की तरह अपना क्रोध भी रेखा पर गिरा सके।
कल रात अपने बॉस की बाहों में डांस करती अपनी अति आधुनिक पत्नी का व्यवहार उसके खौलते गुस्से के नीचे लगी आग थी।
रेखा आज के जमाने की मॉडर्न लड़की थी। छोटे छोटे कटे बॉबकट बाल, ब्राइट मेकअप से हमेशा सजा संवरा चेहरा, मिडी से लेकर मिनी तक सभी पोशाक जो वह पहनती थी उसके सौन्दर्य में चार चांद लगा देती थी। नाभी दर्शना साड़ी भी पहनती थी तो लो कट ब्लाउज के साथ।
सभी से बिंदास भेंट, अनौपचारिक हंसी के साथ खुली बातचीत खुला व्यक्तित्व...।
तो फिर ...?
कल रात का व्यवहार...?
कल रात पार्टी में उसकी निगाहें केवल डांस करती रेखा और बॉस पर ही थी । बॉस काफी खुश लग रहे थे।
तभी रेखा ने ....!!
"तुम मेरी उन्नति की दुश्मन क्यों बन गई हो? देखा नहीं वह नाराज होकर पार्टी छोड़ कर चला गया ।"
"तो मैं क्या करूं !"
"इतनी बुरी तरह उसका हाथ झिड़क दिया। जरा सा तुम्हारी कमर पर हाथ ही तो रखा था।"
"उसके हाथ मुझे कई जगह छू रहे थे।"
"सबके साथ तो नाचती हो। डांस में तो वह सब होता ही है।"
"पर स्पर्श स्पर्श में अन्तर होता है रवि । वह सही छुवन नहीं थी।"
"बड़ी सती सावित्री बन रही हो। सबसे तो बिंदास मिलती हो।कपड़े तो बड़े मॉर्डन पहनती हो ।आधा बदन तो दिखता ही रहता है।"
"सतीत्व कपड़ो में नहीं, मन और विश्वास में होता है रवि तुम नहीं समझ पाओगे। लो, चाय पी लो, ठंडी हो गई है।"
---------------------
(7).  आ० डॉ टी आर सुकुल जी 
त्रिपुंडधारी

पंडित दीनानाथ शास्त्री अपने क्षेत्र में कर्मकांडीय पुरोहित के रूप में देवताओं की तरह पूजे जाते थे क्योंकि दूर दूर के अनेक विद्वान पंडितों को शास्त्रार्थ में भी वह परास्त कर चुके थे। विवाह के अनेक वर्ष बाद उत्पन्न एकमेव पुत्र के लिए वह अपनी ही तरह उद्भट विद्वान बनाना चाहते थे इसलिए स्कूली शिक्षा के साथ साथ घर पर संस्कृत पढ़ने पर अधिक जोर देते। शास्त्री जी अपनी त्रिकाल संध्या के बाद प्रतिदिन कहा करते,
‘‘ सियावर रामचंद्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय, बृन्दावन विहारीलाल की जय, उमापति महादेव की जय, काशी विश्वनाथ की जय, उज्जयनी के महाकाल की जय, रामेश्वरम् की जय, जगन्नाथजी की जय, वैष्णव देवी की जय, सिद्धविनायक की जय ... ’’
आदि, जब तक नाम याद आते गये तब तक उच्चारण करते जाते, फिर कहते ..
‘‘ करोड़ों देवताओं में से सबके नामों को नहीं ले पा रहा हॅूं सो कृपा कर वे नाराज न होवें, उनकी भी जय।’’
एक दिन, संध्या करने के बाद शास्त्री जी ज्योंही पूजा स्थल से निकले कि पुत्र ने कहा,
‘‘ पिताजी, रामरक्षास्त्रोत के एक श्लोक,
.... माता रामो मत्पिता रामचंद्रः, स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्रः
सर्वस्व मे रामचन्द्रो दयालु, नान्यं जाने नैव जाने न जाने। ....
में से अंतिम पद , नान्यं जाने नैव जाने न जाने, को समझने में कठिनाई जा रही है ’’
शास्त्री जी तुरन्त बोले, ‘‘ इसका अर्थ है, हे राम ! मैं तुम्हारे सिवा न तो किसी को जानता हूँ , और न ही जानना चाहता हॅूं।’’
‘‘ तो, राम भक्त होते हुए आप रोज संध्या करने के बाद उनसे असत्य क्यों बोलते हैं ?’’
पसीने से स्नान करते हुए शास्त्री जी के मस्तक पर लगा त्रिपुंड कह उठा,
‘‘ तूने मुझे पराजित कर दिया वत्स
-------------------------
(8). आ० मनन कुमार सिंह जी 
मंगेतर
.
लड़की मंदिर से निकली।काले रंग के सलवार सूट में उसका गौर वर्ण सौंदर्य बिखेर रहा था।उसने हमेशा की तरह मंदिर के द्वार से सटे वट वृक्ष के नीचे बैठे युवक पर नजर डाली।युवक पहले से ही उसे बाहर आते देख रहा था।फिर लड़की मुस्कुराई।युवक की आकांक्षा जनित दृष्टि उल्लास की रोशनी से जगमगा उठी।लड़की आगे निकल चुकी थी।युवक मानो स्वप्न लोक में खो गया हो।उसने सोचा,चलो आज मुस्कुराई है।कल मुँह खोल भी सकती है।आखिर कितने दिनों तक झिझक के वश में रहेगी।कली को चटखना ही था।फूल को महकना ही होगा।यह तो प्रकृति का पुरातन नियम है।फूल-भौंरा,जल-पिपासु,नर-नारी...परस्पर आबद्ध होने के लिए बने हैं।आकर्षण के नियम के शाश्वत उदाहरण हैं।कोई फल डाल से टूटे तो धरती पर आता है,आसमान में नहीं जाता।लंबे अरसे के मौन दृष्टिपात के बाद आज देवी मुस्कुराई है,कल वाणी का वर भी दे सकती है।परसों फल(सु) भी मिल सकता है।युवक यह सब सोचने में मग्न था।फिर किसीकी खनखनाती आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ। 'अरे रुक तो सुरीली',कोई कह रहा था।
युवक ने आँखें खोली।सामने से गुजरता दूसरा नवयुवक उसे(पहले को) इंगित कर कहा रहा था-
'सुरीली नाम है उसका।अपनी मंगेतर है।'
'एँ?' युवक इतना ही कह पाया। दूसरा युवक विजेतावाली मुस्कान बिखेरते हुए निकल गया।
पहला युवक दोनों मुस्कानों के बीच झूल गया।
-----------------------
(9). आ०  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी 
पथ प्रदर्शक

दीपक बाबू घर जाने के लिए ऑटो में बैठे थे। उनके बगल में एक 17-18 साल का लड़का भी बैठा था। उन्होंने लड़के से पूछा -"कहाँ जा रहे हो?"
"मुम्बई"  लड़के ने जवाब दिया।
दीपक बाबू को मुम्बई सुनकर थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि उसके पास कोई सामान नहीं था। लड़के की बोली और हाव-भाव से ऐसा लग रहा था वह पहली बार शहर आया हो। दीपक बाबू ने उत्सुकतावश कुछ और पूछना उचित समझा।
"मम्मी-पापा को बताकर जा रहे हो या ऐसे ही?"
"अंकल जी सच बताऊँ तो मैं बिना बताए ही मुंबई जा रहा हूँ। ट्रेन में बैठकर घर फोन कर दूंगा"
"क्यों?"
"अंकल जी इस साल मैं बारहवीं में था। जहाँ पर एडमिशन लिया था, उन लोगों ने नकल कराने की जिम्मेदारी ली थी पर शासन की कड़ाई के चलते नकल नहीं हो पाई। अब मेरा फेल होना पक्का है।"
"तुम अगर मेहनत से पढ़ते तो ऐसी नौबत ही न आती। नकल के भरोसे क्या एग्जाम पास किया जाता है?"
"अंकल पढ़ाई बहुत मेहनत का काम है जो मेरे बस की बात नहीं। मैं ख़ुद से पढ़कर पास नहीं हो पाउँगा।"
"तो दूसरे काम में मेहनत नहीं है क्या? और तुमसे किसने कहा कि पढ़ाई तुम्हारे बस की नहीं? खैर यह सब छोड़ो। मेरी एक बात मानोगे?"
"घर वापस जाने को मत बोलियेगा। शेष सब बात मानूँगा।"
"मेरे साथ मेरे घर चलो। वहाँ तुमको कुछ दिखाना है। देखकर फिर चले जाना।"
"आप मुझे रोकेंगे नहीं न?"
"विश्वास करो मुझपर। मैं न तो तुम्हें रोकूंगा और न ही समझाऊंगा। स्टेशन के बगल में ही घर है मेरा।"
लड़का कुछ झिझक के साथ दीपक बाबू के घर चला गया। दीपक बाबू उसे अंदर वाले कमरे में ले गए जहाँ पर एक लड़का पैरों में कलम दबाये लिख रहा था।
उन्होंने लड़के की तरफ इशारा करते हुए कहा- "यह मेरा बेटा है जो तुम्हारी तरह ही 12वीं में है। एक दुर्घटना में इसके दोनों हाथ पंजों तक काटने पड़े थे। हाथ कटने के बाद इसने पैरों को ही हाथ बना लिया है।"
लड़के को जैसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। वह आश्चर्यचकित होते हुए बोला- "पैर से लिखना तो बहुत कठिन है। इन्होंने इसके लिए बहुत अभ्यास किया होगा।" ।
"हाँ बेशक! पर हौसला हो तो कुछ भी असम्भव नहीं।" दीपक बाबू समझाते हुए बोले।
"सच में अंकल जी। आज जो देख रहा हूँ वह अकल्पनीय है। इनके जज्बे को सलाम करता हूँ। मान गया मैं।"
दीपक बाबू तंज कसते हुए बोले- "पर क्या करोगे, कुछ लोग हाथ पैर होने के बावजूद अपाहिज़ बने रहते हैं।"
"बस-बस अंकल जी, अब कुछ न कहिए। मैं सब समझ गया। मेरी आँखें खोलने के लिए आपका धन्यवाद। अब मैं अपने घर जाऊँगा।"
लड़के की आंखों में आत्मविश्वास स्पष्ट दिखाई दे रहा था। दीपक बाबू मन ही मन खुश थे। उन्हें 40 साल पहले का दीपक याद आ गया जो स्टेशन से घर इसी तरह वापस आया था।
------------------------
(10). आ० अजय गुप्ता जी 
विजेता
******

मतदान हो चुका था। मतगणना चल रही थी। मणि शांत बैठी पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को अपने मस्तिष्क में दोबारा घटते हुए देख रही थी।
शहर की प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था के अध्यक्ष पद के चुनाव का नोटिफिकेशन केंद्रीय समिति भेज चुकी थी। मणिकर्णिका जिसे सब मणि बुलाते थे, काफी  समय से इस संस्था की सक्रीय सदस्य थी। अपने अनुभव, सदस्यों के आग्रह, रचनाशीलता और आगे बढ़ने के जुझारू व्यक्तित्व के चलते उसने नामांकन भी भर दिया।
"मतगणना का नतीजा आने वाला है।" उसके पास बैठे शर्मा जी ने कहा। मणि ने अनसुना सा किया और फिर पिछली यादों में खो गई।
एक खेमे को इसमें अपनी शक्ति और प्रतिष्ठा दांव पर नज़र आ रही थी। पुराने अधिकारियों और अध्यक्षों ने सर्वसम्मति बनाने का प्रयास किया। किन्तु मणि अपना नाम प्रस्तावित करने वालों के मान के लिए अड़ी थी, अड़ी रही।
अंततः बेनतीजा रही सभाओं के बाद मतदान का निर्णय हुआ। आज सुबह मतदान से पूर्व दोनों उम्मीदवारों को अपनी बात कहने का अवसर मिला। दोनों ने अपने-अपने अनुभव, कार्यक्षमता, उपलब्धियों तथा योजनाओं का प्रारूप दिया। किन्तु अपने प्रतिद्वंदी माणक जी के अंतिम शब्द उसे खास तौर पर याद आ रहे थे― "क्या हमारे कस्बे के रहवासी इस मानसिक स्तर पर हैं कि हम एक महिला के पीछे-पीछे चलें और वो हमारा उपहास न करें।"
अचानक चुनाव पर्यवेक्षक की आवाज़ आई, "मतगणना का नतीजा आ चुका है। माणक की 72 मत प्राप्त करके मणिकर्णिका जी से 62 मत से विजयी रहे हैं।"
मणि ने पूरी सभा पर एक दृष्टि डाली और सबका आभार करती हुई मुस्कुराकर सभागार से निकल गई। अन्य सदस्य उसके "पीछे-पीछे" सभागार से निकलने लगे।
------------------------------
(11). आ० जानकी वाही जी 

यारबाश

.

"जब वह बहती हवाओं के साथ अपना कोई गीत गुनगुनाता तो लड़कियाँ तो छोड़ो लड़के भी उसकी घुंघराली जुल्फों के दीवाने हो जाते।"
सामने वाले की उत्सुक निगाहें उसकी ऒर उठ गईं।मानों कह रही हों " फिर क्या हुआ?"
"उसकी बड़ी-बड़ी नीली आँखोँ के जादुई आकर्षण में न जाने कितने गोता खा जाते।
जितना खूबसूरत बाहर से था उतना ही अंदर से।उसके स्फटिक से निर्मल मन की तो न ही कहो, आधी रात को भी किसी दोस्त को उसकी ज़रूरत होती तो बन्दा हाज़िर। यारों का यार था वह।"
" हूँ... उ... 'था ?..." अजनबी बोला- 
उसे समझ नहीं आया वह क्यों अजनबियों के सामने अपना रोना लेकर बैठ जाता है। लगा।बियर का सुरूर उस पर भी हावी हो रहा था।
" ना... ना... था, का मतलब ये नहीं कि वह अब इस स्वार्थी दुनिया से दूर चला गया।यहीं है वह।क्या हुआ जो वक़्त के थपेड़ों ने उसे जर्जर कर दिया।वह आज भी किसी मुसीबतज़बां के लिए लड़खड़ाता हुआ हाज़िर हो जाता है।"
सामने वाले की आँखें संकुचित होते देख लम्बा घूँट लेकर बोला-
ना...ना...वह, शराब को तो खांटी जवानी में भी हाथ नहीं लगता था ।सोच रहे हो ये पहेलियां क्यों बुझा रहा हूँ।"
कुछ पल दोनों तरफ गहरी खामोशी छाई रही फिर हाथों के मग को घुमाते हुए अपनी नज़रों से सामने वाले को बींधते हुए फुसफुसाया
" अरे भाई , ये जिंदगी ही एक पहेली है।कभी हँसाती है कभी रुलाती है।मैं आज जो शान से एक बड़े पद पर बैठ कर एशोआराम की जिंदगी गुज़ार रहा हूँ।उसको सीढ़ी की तरह ही यूज़ करके पाया मैंने ये सब।"
अजनबी की खोई नज़रें उसपर गड़ गई।
"अरे भाई, बस खोया- खोया रहता है और जिंदगी का हिसाब-किताब लगाता रहता है।क्या खोया और क्या पाया।शायद सोचता होगा जिंदगी भी क्या निकली ,निल बट्टा सन्नाटा?"
" ओह!तो दिमाग से गया वह?"
ना...ना... पागल भी नहीं है वह, ...बहुत जीनियस था या कहो कुछ ज्यादा ही था तभी न हम कमअकलों की दुनिया में जिंदगी के रिश्ते निभाने के फेर में फेल हो गया।"
"आपकी बातें उलझी हुई हैं।"अजनबी ने पहली बार पूरा वाक्य बोला।
"तुम्हें लगता है मुझे चढ़ गई? नहीं अजनबी, दोस्त से बेवफ़ाई का कांटा जब कभी ज्यादा टीसने लगता है तो बस यहाँ आ जाता हूँ मन का बोझ हल्का करने।तुम जैसे किसी अजनबी के सामने कबूल कर दर्द हल्का कर लेता हूँ।
"तो?"
"नहीं ,नहीं वह हारा हुआ आदमी भी नहीं है। वह तो योद्धा है ।क्योंकि वह तो दूसरों के लिए जिया। "
"जिसने जिंदगी में कुछ न पाया ?वह भी क्या योद्धा?"सुरूर ,अजनबी पर भी चढ़ने लगा।
" मेरा ये पद, ये कॉलेज की सबसे सुंदर लड़की,जो आज मेरी पत्नी है।और भी बहुत कुछ।जिस बूते आज मेरी पहचान है। ये उस यार की पीठ पर पर भौंके छूरे की बदौलत ही है।मुझसे बेहतर कौन उसे पहचानेगा।पर मैं योद्धा नहीं।असली योद्धा तो मेरा यार है वह असली यारबाश था।"
हाथ से नाक और आँख पोछी और खिड़की के काँच से बाहर आती-जाती भीड़ को देखने लगा।
---------------------------
(12). आ० कल्पना भट्ट जी 
भ्रमित जीत 

बहुत दिनों बाद अपने घर गया था लाखन| चारों तरफ उसने देखा, घर में उसकी बूढी अंधी दादी के अलावा कोई न दिखा, वह अंदर बाहर, पड़ोस में भी देख आया, "आखिर सब कहाँ गए? " उसने अपने दादी से पूछा|
"अभी अभी आया है, पहले कुछ खा ले, देख तो रसोई के डिब्बे में रोटियां पड़ी होंगी, खा ले पहले|"
रसोई में रोटी खाते हुए भी उसको कुछ अनहोनी का एहसास हो रहा था, जैसे तैसे उसने रोटी निगली और हाथ धो कर फिर अपनी दादी के पास चला गया, उसने फिर वही प्रश्न दोहराया| 
" तू अब तक कहाँ था लाखन, इस बार तो" बहुत समय लगा दिया, घर लौटने में| कहाँ रहा बेटा? "
लाखन ने अपना बैग खोला और उसमें से उसने कुछ नोट निकाले और अपने दादी के हाथ में रखते हुए बोला, "दादी! तेरा पोता पैसा कमाने गया था| शहर में कुछ बड़ा काम मिल गया था, अब आपका पोता एक बड़ा आदमी बन गया है दादी..|"
"अच्छा! ऐसा क्या काम करता है बेटा तू?" 
"दादी, मैं .... वो ...... वो.........|" 
"क्या वो ... वो लगा रखी है, कुछ बोलता क्यों नहीं| तू क्या सोचता है मुझे पता नहीं कि तू एक आतंकवादी गिरोह में शामिल हो गया है| मुझे सब पता है, वो है न तेरा दोस्त, सुखिया! वह पिछले हफ्ते मिला था उसने सब कुछ बता दिया है| "
'सुखिया! अरे उसको कैसे पता चला.... अरे हाँ, उसने एक दिन मुझे बम के साथ देख लिया था, पर दादी घर के लोग कहाँ गए, माँ, बाऊजी, शन्नो और भूरी सब कहाँ है दादी.....?" 
"क्या करेगा जानकार.. पर पूछ ही रहा है तो सुन... एक और  लाखन आया था अपने गाँव में और उसने भी तेरी तरह एक बम गिराया था, और उसमें ..........|"
"क्या................ ! तो क्या और लोग भी ............"
"हाँ, गाँव के बहुत लोग मारे गए.... पर मैं बदनसीब अब भी जिंदा हूँ , सुन तो पैसे तो लाया है बहुत सारे, पर क्या एक बम रखा है तेरे पास , गर है तो एक और फैंक दे, मैं भी .....|"
लाखन कभी अपनी दादी को, कभी अपनी बैग में पड़े नोटों को, और घर की दिवार पर टंगे आईने में खुद को देख रहा था..... उसके चेहरे पर घृणा दिख रही थी| 
-------------------------
(13). आ० विरेंद्र वीर मेहता जी 

स्वीकारोक्ति - कल और आज

.

"तुमने हताशा में अपने बचाव के लिये ब्रह्मास्त्र प्रयोग करके संसार को संकट में डाल दिया। इस पर मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं अश्वत्थामा! लेकिन मैं आश्चर्यचकित हूँ कि एक महान ज्ञानी पिता के पुत्र होते हुए भी तुमने, सोये हुए पाँडव पुत्रों की हत्या जैसा घृणित कार्य किया। तुम जैसे योद्धा के हृद्धय में ये विचार पनपा कैसे?" श्री कृष्ण की तीक्ष्ण दृष्टि अश्वत्थामा पर टिकी हुयी थी।
पाँडव पुत्रों की ह्त्या के बाद 'ब्रह्मास्त्र' के दांव में भी पराजित होने के बाद अपराधी बना अश्वत्थामा पांडवों और श्री कृष्ण के सम्मुख नजरें झुकाये खड़ा था।
"हे माधव, कुरू वंश के योद्धाओं और कई बंधु-बांधवों की मृत्यु के बाद मैंने पांचों पांडवों के वध की प्रतिज्ञा ली थी लेकिन...." अश्वत्थामा सिर झुकाये कहने लगा। "ये कैसे संभव हो, नहीं समझ पा रहा था कि अनायास उस शाम मैंने देखा कि एक उल्लू ने रात्रि में अपने प्रतिद्वन्दी कौवों पर आक्रमण कर उन्हें मार गिराया। बस यहीं से मेरे हृद्धय में विचार पनपा वासुदेव पुत्र। लेकिन ये मेरा दुर्भाग्य था कि सोते हुए पांडव-पुत्रों को पाँच पांडव समझ मैंनें अनजाने में उनका सिर काट दिया।"
"हे अर्जुन! भले ही द्रोपदी ने इसके अपराधों को क्षमा कर दिया हैं लेकिन..." श्री कृष्ण ने सारा व्रतांत सुनने के बाद कहा। "असावधान, सोये हुए व्याक्ति और स्त्री तथा बालको को मारना धर्मानुसार वर्जित हैं और अश्वत्थामा, इस धर्मविरुद्ध आचरण करने हेतु पूर्ण रूप से सजा का अधिकारी हैं। अतः इस स्थिति में इसकी सजा का निर्णय मैं तुम्हारे विवेक पर छोड़ता हूँ।"
"जैसी आज्ञा वासुदेव पुत्र!" कहते हुये अर्जुन ने आगे बढ़ अपनी तलवार से अश्वत्थामा के केश काटते हुये उसके मस्तक से मणि निकाल कर उसे श्रीहीन कर दिया। और तत्काल ही श्री कृष्ण ने भी, "तुम्हारें लिये इतनी ही सजा काफी नहीं अश्वत्थामा!" कहते हुये उसे हजारों वर्षों तक भटकते रहने का श्राप भी दे दिया।
"हे कृष्ण!" युद्ध में हारा हुआ योद्धा सदा दोषी ही होता हैं वर्ना इस महायुद्ध में पूर्ण रूप से निर्दोष और निष्पापी तो कोई भी योद्धा नहीं था और ये बात आने वाली पीढ़ियाँ भी कहेंगी।" सजा को सुनने के बाद अश्वत्थामा मुस्करा दिया। "रही बात आपके श्राप की वासुदेव पुत्र, तो मैं तो अपना अपराध स्वीकार कर श्राप का दंश लिये हजारों वर्षों तक भटकता ही रहूंगा लेकिन आने वाले युगों में तो मानव अपने कन्धों पर अपने अपराधों का बोझ लेकर भटकते हुए भी अपने अपराधों को स्वीकार नहीं करेगा कृष्ण... स्वीकार नहीं करेगा।
-----------------------
(14). आ० महेंद्र कुमार जी 
विष बेल 

‘‘अरे कोई इस पिलिया का मुँह बन्द कराओ!’’

उच्च अधिकारी ने उस बच्ची को एक हाथ से उठा कर लाशों के ढेर पर फेंकते हुए कहा। फ़ौरन ही एक सैनिक ने बच्ची को वहाँ से उठा कर उस कुँए में डाल दिया जहाँ पहले से ही अनगिनत बच्चों की लाशें तैर रही थीं। वह इन शिविरों में अकेले ही हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारने वाला एक वीर सैनिक था।
बच्ची के ख़ामोश होते ही सभी सैनिक समवेत स्वर में बोल उठे ‘‘हम जल्द ही इस धरती को स्वर्ग बना देंगे।’’
‘‘मुक्त करो इन कीड़ों को।’’ उस अधिकारी ने शिविर में खड़े हुए लोगों की तरफ़ इशारा किया और अपनी कुर्सी पर बैठ गया।
श्रम योग्य पुरुषों को अलग करने के बाद लोगों के सर से बाल उतारने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी थी। आगे बढ़कर जैसे ही उस वीर सैनिक ने एक महिला के बाल उतारने की कोशिश की तो वह चौंक गया। वह उसकी प्रेमिका थी। ‘तुम? तो तुम इसलिए मुझे छोड़कर चले गये थे?’ महिला ने आँखों ही आँखों में उससे सवाल पूछा।
वह प्रेमी जो अक्सर अपनी प्रेमिका से कहा करता था, ‘‘मुझे बस दो ही चीज़ें पसन्द हैं, एक तुम्हारी आँखों में डूबना और दूसरा तुम्हारी ज़ुल्फ़ों से खेलना।’’ थोड़ी देर तक वहीं जड़वत खड़ा रहा। फिर उसने अपना उस्तरा निकाला और वही किया जो वह करता आया था।
लोगों को गैस चैम्बर की तरफ़ ले जाने की बारी आ चुकी थी। गैस चैम्बर के दरवाज़े पर पहुँच कर उसने आख़िरी बार अपनी प्रेमिका की आँखों में देखा। झील सूख चुकी थी। उसने प्रेमिका का हाथ पकड़ा और उसे गैस चैम्बर के अन्दर भेज दिया।
इससे पहले कि दरवाज़ा पूरी तरह बन्द होता उस महिला ने अपने प्रेमी से कहा, ‘‘जिस रोती हुई बच्ची को तुमने कुँए में अपने हाथों से फेंका है वह तुम्हारी बेटी थी जिसे तुम मेरी कोख में ही छोड़कर चले आये थे।’’ इतना सुनते ही वह धड़ाम से ज़मीन पर गिर गया।
ज़हरीली गैस चैम्बर के अन्दर भरने लगी। ज़मीन पर बैठे-बैठे ही वह अपनी प्रेमिका को तड़पते और मरते हुए देखता रहा। फिर उसने अपनी पिस्टल निकाली और ख़ुद को गोली मार ली।
-------------------------
(15). आ० राजेश कुमारी जी 
अंतिम जंग 

“इसकी आँखे छोटी थी,बीनाई भी कमजोर थी  फिर भी जमीं से फ़लक तक देख लेता था| छड़ी लेकर चलता थाफिर भी घर, मुहल्ला, गाँव, शहरसे लेकर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों को लांघता हुआसात समन्दर पार तक की खबर ले आता था| सियासत के गलियारों में खूब उत्पात मचाया इसने| सारी दुनिया इसकी इस छोटी सी कलम में समाई हुई थी| हर जंग यह योद्धा इसी हथियार से लड़ता था| किन्तु आज जिंदगी की जंग हार गया |सब कुछ खामोश है| देखो इसका अंगूठा और उँगलियाँ झुके हुए हैं एक दूसरे की तरफ, लगता है ये अपने जीवन की अंतिम लड़ाई को भी लिख कर गया है इस फिजाँ में|"
'हाँ' मैं पढ़ सकती हूँ क्योंकि में भी उसी जंग का एक अदना सिपाही हूँ”
कहते-कहते भव्या ने दो फूल उनके चरणों में समर्पित किये|
पत्रकार  “धन्यवाद” कहकर  आगे बढ़ गया|    
-----------------------
(16). आ० बरखा शुक्ला जी 
‘हारी हुई बाज़ी ‘
.
मोहनलाल ने ज्यों ही बेटे से बात करके मोबाइल रखा पत्नी रीमा ने पूछा “कब आ रहा है राहुल ।”
“वो शायद न आ पाए ।” मोहनलाल बोले ।
“क्यों ,ये क्या बात हुई भला इकलौती छोटी बहन की शादी में नहीं आ रहा ।” पत्नी बोली ।
“हाँ कह रहा था कोई ज़रूरी प्रोजेक्ट है , और अमेरिका से बार २ आना संभव भी नहीं है ।”मोहनलाल ने बताया।
“वाह ,जैसे ये अकेले ही जॉब कर रहे है अमेरिका में , दूसरे भी समय २ पर अपने देश आते है न । “पत्नी बोली ।
“कह रहा था रुपए कहे तो और भिजवा देता हूँ ।”मोहनलाल बोले ।
“हमें नहीं चाहिए रुपए ,गुड़िया सुनेगी भाई नहीं आ रहा है तो रो रो कर परेशान कर देगी ।” पत्नी बोली ।
“ग़लती उसकी कहाँ है , मैंने ही तो प्रतिस्पर्धा की इस अंधी दौड़ में उसे बचपन से ही झोंक दिया था ।”मोहनलाल बोले ।
“आप ऐसा क्यों बोल रहे है । “पत्नी बोली ।
“शुरू से ही उसे परिवार की किसी शादी में नहीं जाने देता था , बस स्कूल ,कोचिंग , कॉलेज इसी में उसको लगाए रखा।” मोहनलाल बोले ।
“हाँ सच ही कह रहे हो उसे कभी परिवार में , रिश्तेदारों से घुलने मिलने ही नहीं दिया ,मैं तो दोनो बहन भाई के बीच की नोक -झोंक के लिए तरस ही गयी ।”पत्नी बोली ।
“तभी तो बहन की शादी उसके लिए मायने ही नहीं रखती ।बेटे का कैरियर बना कर उसे तो ज़िंदगी की बाज़ी जीता दी , पर इस दौड़ में ख़ुद बेटे को हार गया ।”मोहनलाल रुँधे गले से बोले ।
-------------------------------

(17). आ० सीमा सिंह जी 

लकीरें

"अरे सुनती हो गज़ब हो गया!" अचानक से पति का हड़बड़ाया हुआ स्वर सुन सुभद्रा बेसन सने हाथों से ही आँगन में निकल आई।
"क्या हुआ?" पति के चेहरे की उड़ती हवाइयाँ देख सुभद्रा भी घबरा गई।
"वो मिथिला बुआ के दोनों बेटों का एक्सीडेंट हो गया।कार के परखच्चे उड़ गए गाड़ी में सवार कोई भी नहीं बच सका।" पति बोलते बोलते पसीने से  तरबतर हो गए। सुभद्रा ने हाथ का सहारा देकर उनको कुर्सी पर बैठाया और लपक कर पानी की बोलत ले आई।
"आप पानी पियो जी, बहुत बुरा हो गया ये तो" आँगन के नल पर हाथ धोती हुई सुभद्रा ने दुखी स्वर में कहा और रगड़कर हाथ पर सूखकर चिपक गए बेसन को छुड़ाने लगी।
"मैंने दफ्तर की गाड़ी को बोल दिया है तुम भी चलोगी?"
पति के प्रश्न से एक उचटती नज़र उनके चेहरे पर डालती हुई सुभद्रा ने अपने हाथ निचोड़ते हुए असमंजस में सिर हिलाया एक दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए कहा,"ये समय गिले शिकवों का नहीं है जी चलती हूँ।"
एक नज़र आईने में डाल अपने खिचड़ी बालों को सहला कर ठीक कर,रबड़ की चप्पल बदलती हुई सुभद्रा की आँखों के आगे एक के बाद एक चेहरा घूमने लगा, उम्र दराज़ किन्तु रौबीले व्यकित्व एवं गठीले बदन वाली बुआ जी, किसी हॉलीवुड अभिनेता की याद दिलाते बुआ जी के दोनों बेटे जो उम्र के दो साल के अंतर के बाद भी जुड़वाँ से लगते,उनकी पत्नियाँ बड़ी बहू जो सुघड़ गृहणी का उदाहरण और छोटी किसी मॉडल जैसी, छूते मैली हो जाए। छोटे बेटे की नन्ही बिटिया जिसका अभी दो माह पहले ही जन्मदिन बीता था। इन सबके साथ  एक और चेहरा भी यादों में घूम गया माया,सुभद्रा के  अपने मामा की बेटी जो बच्चों के जन्म के समय उसकी सहायता के लिए आई थी और हॉलीवुड स्टार सरीखे व्यक्तित्व के मोहपाश में बंध गई।बाहर गाड़ी का हार्न बजा तो पति-पत्नी दोनों बाहर निकल गाड़ी में सवार हो लिए।सुभद्रा फिर विचारों के सागर में डूबने उतराने लगी।जब माया और बुआ जी के बेटे ने सुभद्रा से सहायता मांगी तब सुभद्रा के पैरों तले धरती खिसक गई बुआ जी के व्यकित्व से स्वयं सुभद्रा भी खौफ खाती थी।अपने रिश्ते को लेकर दोनों की गम्भीरता देख कर ही तो सुभद्रा बुआजी के आगे बात पहुँचा सकी थी।पर बुआ जी ने अपनी ज्योतिषीय गणना कर तुरन्त रिश्ता नकार दिया था,’यह कहते हुए कि लड़की के हाथ में वैधव्य योग है वह जानते हुए ये रिश्ता हर्गिज नही कर सकती।’
बात वहीं ख़त्म हो गई थी। पर मन में गांठ पड़ गई माया दुबारा कभी उनके शहर नहीं आई।
मोड़ पर गाड़ी मुड़ी तो सुभद्रा के विचारों की श्रृंखला भी मुड़ गई।
फूफाजी के देहांत के समय भी बुआ जी तनिक भी विचलित न दिखीं। कितने सहज भाव से कहा था,”मेरे हाथ की रेखाओं में इनसे विछोह लिखा था। मुझे पता था।”
चींssss  की आवाज़ के साथ गाड़ी बुआ जी के हवेलीनुमा घर के दरवाज़े पर रुक गई।
पति के पीछे पीछे सुभद्रा भी घर के अंदर पहुँच गई, जहाँ सामने सफेद लिबास में दोनों बहुएँ साक्षात मातम की मूरत बनी हुई थी और उनके पीछे बैठी थी हारे हुए जुआरी जैसी बुआजी। 
-------------------------
18. आ० प्रतिभा पाण्डेय जी 
‘थाप’
.
‘सुख महल’ कहती थीं ये चारों अपने इस छोटे से आशियाने को | निशि, सुषमा, रज्जो और घर की मुखिया सुखनी दीदी | ढोली सुरेश भी अक्सर यहीं रहता था |
“ आज तो गजब लग रही हो दीदी !” होंठों पर लाली लगाती सुखनी को देख सुरेश मुस्कुराया |
“तो ! मेरी बहन की मेंहदी है वहाँ गाँव में और मैं यहाँ ऐसे ही सूखी बैठी रहूँ !” सुखनी ने आँखें तरेरते हुए सुरेश को नकली गुस्सा दिखाया |
“ ओहो हाँ ! निशि बता रही थी |’’
“ पहले हम शगुन गायेंगे और फिर सब बाहर खाना खाने जायेंगे|” सुखनी की आवाज़ में बच्चों जैसा उत्साह था |
“निशि बता रही थी आपने शादी में गाँव जाने के लिए  परसों का टिकट भी करवा लिया है |” सुरेश सुखनी को आँखों आँखों में टटोल रहा था |
“ हाँ बहुत मन है उन सबसे एक बार मिलने का| परसों छोटी से फोन पर भी बात हुई थी |” सुरेश से आँखें चुराती सुखनी शीशे में अपनी लाली ठीक करने लगी |
“ क्यों अपने आप को धोखा दे रही हो दीदी | इतने सालों में बिना सामने आये पैसे भेजती रहीं, बहनों को पढ़ाया ,बाप का कर्ज उतारा | बस इतना ही बनता है आपका | “ सुरेश की आवाज गहरी थी|
“ ठीक कह रहा है ये दीदी | हमारा कौनसा परिवार ? शर्मिंदगी हैं हम|” पीछे आ खड़ी निशि की आवाज  भर्रा गई थी |
“ ख़ुशी के मौके पर क्या बिसूर रहे हो दोनों | चल बैठ और शुरू कर शगुन के गाने |” सुखनी ने ढोलक निशि की तरफ खिसका दी |
“ दीदी नाराज मत होना| खुद को रोक नहीं पाया ये सब कहने से|”  घिर आई आँखों  को पोंछने लगा सुरेश |
“ मुझको भी पता है रे | हम किन्नरों का कौनसा परिवार ? पर कभी कभी सोचने में अच्छा लगता है बस्स | टिकट लाती हूँ  केंसल मार के आजा |” सुरेश की पीठ में धौल जमाते सुखनी अपनी आवाज का गीलापन छिपा नहीं पाई|
“ बन्नोंSS तेरी मेंहंदी ..|”  ढोलक की थाप पर निशि की मर्दानी आवाज सुख महल में गूँज रही थी |
----------------------------
(19). आ० मुजफ्फर इकबाल सिद्दीकी 
" उम्मीद की किरण "
.
" अब कैसे हो ब्रिगेडियर,त्रिलोचन सिंह ? "
आईसीयू में एडमिट हार्ट अटैक से पीड़ित ब्रिगेडियर से कार्डियोलोजिस्ट डॉ अशोक वर्मा ने पूँछा ?
डॉ, मुझे आभास होने लगा है कि ज़िन्दगी बख्सने वाली ये मेडिकल मशीनों की जलती बुझती हरी रौशनियाँ , अब मेरी ज़िन्दगी को ग्रीन सिग्नल देने से तो रही।
मैं ज़िन्दगी भर जंग के मैदानों की खाक छानता रहा लेकिन मैं ने अपने आप को कभी पराजित सा महसूस नहीं होने दिया । कई बार तो मौत से आमने - सामने मुक़ाबला था। लेकिन तुम्हारे इस आईसीयू यूनिट में जैसे मेरा दम घुट रहा है।
मुझे मेरी मौत के कदमों की आहट साफ़ सुनाई दे रही है। लगता है अब वक्त आ गया है ।
खैर क्या लेकर आया था और क्या लेकर जाना है ? लेकिन ऐसे मरने से तो बेहतर था कि मैं किसी जंग के मुहाज़ पर मारा जाता और मेरा शरीर देश के काम आता । एक फौजी के लिए इससे बड़ी ख़ुशक़िस्मती क्या होगी कि वो शहादत का जाम हँसते हँसते पी जाए ?
तुम्हारी ये डॉक्टरों की फौज भी अब मुझे बचा नहीं सकती।
" ज़िन्दगी देने और लेना तो सिर्फ ऊपर वाले के हाथ में है । हम तो सिर्फ डॉक्टर हैं । वैसे डॉक्टरों की फौज का कौशल अभी आपने देखा कहाँ है ?" ब्रिगेडियर। 
कल ऑपरेशन थिएटर में देखियेगा , इनका हुनर। आप तो नीम बेहोशी की हालत में होंगे और ये डॉक्टर ... ... ... आपकीं ज़िंदगी के लम्हों में इज़ाफ़ा करने की कोशिश में । हम डॉक्टरों की भी रोज़ किसी न किसी की ज़िन्दगी से जंग होती है। 
आप तो एक ही अटैक से घबरा गए। कल आपका दिल उसी तरह मज़बूत होना चाहिए जैसा जंग के मैदानों में होता आया है , ब्रिगेडियर। 
हम आपकी ओपन हर्ट सर्जरी करेंगे। सारे ब्लॉकेज बाई पास हो जाएँगे ।
आपके दिल तक जाने वाले सारे रास्ते साफ हो जाएंगे ।
फिर कोई भी दस्तक देने आ सकता है , आपके दिल पर । होशियार रहियेगा।
डॉक्टर ने यूँ ही चुटकी भरे अन्दाज़ में कहा। 
और ब्रिगेडियर त्रिलोचन सिंह के चेहरे पर एक उम्मीद की किरण ने मुस्कुराहट ला दी।
--------------

Views: 270

Reply to This

Replies to This Discussion

हार्दिक बधाई आदरणीय योगराज प्रभाकर भाई जी, ओ बी ओ लाइव लघुकथा गोष्ठी अंक - 36 के सफल आयोजन,शानदार संचालन और त्वरित संकलन हेतु हार्दिक बधाई।यह गोष्ठी मेरे लिये एक दृष्टिकोण से तो सुखद और उपलव्धि पूर्ण रही क्योंकि इस गोष्ठी का शुभारंभ मेरी लघुकथा से हुआ था एवम मेरी लघुकथा को पहली बार इतने गुणी जनों द्वारा सराहना मिली। लेकिन साथ ही मुझे अफसोस रहा कि इंटरनेट ने दोनों ही दिन (30/03/2018 व 31/03/2018) इतना परेशान किया कि मैं अन्य लघुकथाकारों की लघुकथाओं पर अपनी टिप्पणी भी सही तरीके से नहीं कर सका।31.03.2018 की रात को जल्दी जल्दी टिप्पणी पोस्ट करने की कोशिश की। आदरणीय सीमा जी की अंतिम लघुकथा थी।उसके लिये टिप्पणी लिख चुका था।जैसे हीपोस्ट करने का प्रयास किया।“रिप्लाईज क्लोसड” का संदेश आ गया।बहुत दुख हुआ, कि इतनी बेहतरीन लघुकथा पर एक बधाई संदेश भी नहीं दे सका।

विशेष अनुरोध - आदरणीय प्रधान संपादक महोदय जी से करवद्ध निवेदन है कि मुझे, मेरी लघुकथा का शीर्षक "कुदरत की मार" के स्थान पर "कुदरत से खिलवाड़" करने की अनुमति प्रदान की जाय। सादर।

लघुकथा गोष्ठी अंक 36 के सफल आयोजन, सुन्दर संचालन और त्वरित संकलन हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय योगराज प्रभाकर भाई जी और पूरी टीम को.. हालांकि इस बार के आयोजन में सभी लघुकथाए बेहतरीन थी लेकिन विशेस्तौर से मुझे आदरणीय तेज् वीर जी, सुनील कुमार जी, महेंदर कुमार जी और सीमा जी की रचनाओं ने बहुत प्रभावित किया....

ये आयोजन दो मायनों में बहुत महत्वपूर्ण होता है, एक इसके शीर्षक / विषय इतना उम्दा होते है कि लेखक को बड़ी ही गंभीरता से इसके लिए कथ्य तलाश करना पड़ता है. दुसरे आयोजन में प्रस्तुत रचनाओं पर आये कमेंट्स से सहज ही बहुत कुछ सीखने को मिलता है.... सादर आभार  ओ बी ओ  टीम को इस आयोजन को निरंतर चलाते रहने के लिए.... 

हार्दिक आभार आदरणीय वीर मेहता जी. वैसे इस सूची में आप अपनी लघुकथा का नाम लेना भूल गए. सादर.

आदरणीय मंच संचालक महोदय श्री योगराज प्रभाकर जी "ओपनबुक्सओनलाइनडॉटकॉम" की मासिक लघुकथा गोष्ठी -36- 'पराजित योद्धा' के शानदार सफल आयोजन और संकलन के लिए और ओबीओ के आठवें वर्ष-प्रवेश पर आपको, ओबीओ-परिवार और सभी सहभागी रचनाकारों को बहुत-बहुत मुबारकबाद और शुभकामनाएं। मेरी मिश्रित शैली की लघुकथा को संकलन में (5 वें क्रम में) स्थापित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया। प्राप्त टिप्पणियों और इस्लाह मुताबिक अपनी मिश्रित शैली की लघुकथा को क्रमशः पूरी तरह केवल पत्रात्मक शैली में तथा फिर केवल डायरी शैली में लिख कर परिमार्जित लघुकथाएं यहां प्रेषित कर रहा हूं अवलोकनार्थ। इनमें से जो/दोनों/तीनों उपयुक्त हों, कृपया उसे/उन्हें संकलन के क्रमांक 5 पर प्रतिस्थापित कर दीजिएगा। पात्र तथा कथ्य अनुसार, यदि इनमें भी कुछ कमियां रह गई हों, तो कृपया मार्गदर्शन प्रदान कीजियेगा :
______________________________________________
(पत्रात्मक शैली में परिमार्जन- प्रयास) :

'युद्ध कर' (लघुकथा) :

"मेरी लैला 'नाज़ो',
आज तुम्हारी दूसरी चिठ्ठी बिस्तर के नीचे मिली। अच्छा है कि तुम अपनी भड़ास यूं निकाल देती हो। तुम्हें लगता है कि तुम मुझसे परेशान हो, लेकिन मेरी अम्मी और अपने देवर- देवरानी को क्यूं लपेट रही हो? तलाक़ की राह या ख़ुदक़ुशी जैसी धमकी की बेवक़ूफियां क्यों? तुम्हारा मुझसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा होना किस काम का? ठीक है, हमारे ख़्यालात और तौर-तरीक़े बेमेल हैं। शादी के पहले हम यह महसूस नहीं कर पाये। मरे जा रहे थे एक दूसरे के लिए! तुमने यह भी नहीं सोचा कि मैं कम पढ़ा-लिखा अॉटो चलाने वाला ग़रीब हूं! मेरा क्या कसूर? तुम्हारी तीनों छोटी बहनों की ख़ातिर तुम्हारे अब्बू ने तुम्हारी शादी मुझसे कर दी! हम समझे कि उन्हें हमारा प्यार कबूल है! हमने सोचा कि तुम मुझे इज़्ज़त दोगी, प्यार करती रहोगी। क्या पता था कि नौकरी करते हुए रईस सहेलियों और टीवी धारावाहिकों के असर से तुम यूं मुझ पर हावी होने लगोगी। तुमने मुझे कई बार तलाक़ के लिए उकसाया; बहस के हालात पैदा किए। लेकिन मैं चुप ही रहा। .... मैं तलाक़ नहीं दूंगा, यह तुम अच्छी तरह समझ लो! बच्चे बड़े हो रहे हैं! तुम्हारे अब्बू भी अब न रहे!"
तुम्हें तलाक़ क्यों दूं। क्या कमी है तुम में? मेरी पसंद की हो! लड़ाई-झगड़े और बहस तो सब में होती हैं, रईसों में भी! कई बेमेल रिश्ते हो जाते हैं मुहब्बत या मज़बूरी के नाम पर! तुमने कितनी बार मेरी बेइज़्ज़ती कितने लोगों के सामने की! मैंने भी तुम्हारी की! तुमने हमारे मायके वालों को बुरा-भला कहा, तो मैंने तुम्हारे! बात बराबर! फिर तलाक़ या ख़ुदक़ुशी जैसे इरादे क्यों? मुझ में और तुम में सिर्फ यही फ़र्क है नाज़ो कि मैं अपनी औक़ात में रहकर ज़मीं पर रहता हूं! दिन-रात मेहनत कर के पैसे कमाता हूं ! लेकिन मुझसे ज़्यादा पढ़े-लिखे होने के सबब से और सरकारी नौकरी करने की वज़ह से, कम मेहनत में ज़्यादा पैसे कमा कर, ग़लत सहेलियों के साथ तुम हवा में उड़ने लगी हो! अपनी व मेरी औक़ात से बाहर जा रही हो! ख़ुदा गवाह है कि मैंने न सिर्फ़ तुम्हें अपने बजट में ख़ुश रखने की कोशिश की है, बल्कि वक्त-व-वक़्त तुम्हें समझाता रहा हूं कि बच्चों पर ध्यान दो, बच्चे अब बड़े हो रहे हैं! तुम मेरी ज़रूरतें पूरी कर सकती हो, लेकिन करती नहीं हो! मैं तुम्हारी ज़रूरतें पूरी कर सकता हूं, लेकिन तुम्हें पता नहीं कौन सी हवा लग गई है? ... और ये इस तरह की चिट्ठियां रसोई में और बिस्तर के नीचे छिपाना कहां से सीखा तुमने? सहेलियों से या टीवी चैनलों के धारावाहिकों और फ़िल्मों से? मुंहफट बहस करने की तरह? तुम्हें मालूम है कि मैं और मेरी अम्मीजान चुपचाप यह सब बर्दाश्त कर रहे हैं, क्योंकि तुम हमारी सहारा भी हो! लव-मैरिज है हमारी, कोई मज़ाक नहीं! तुमने ख़त में अपने जमा पैसे ख़ुदक़ुशी करने के बाद सिर्फ बच्चों के नाम करने की बात लिखी? मैं इतना बुरा हूं, मुझ पर भरोसा इतना कम? कब से? न मुझमें कोई ऐब है, न ही तुम में! फिर किस बात की अहसास-कमतरी तुम्हें तलाक़ या ख़ुदक़ुशी के लिए उकसाती है?
तुम्हें नहीं पता कि आज फिर मैं गज़रे लेकर किसी और मूड से घर आया था लेकिन तुम्हारे इस ख़त ने सिर दर्द ही दिया। ख़ैर, अपनी सेवा ख़ुद करना आता है मुझे! तुम यूं ही खुर्राटें भर के सोती रहो, मैं भी सो ही जाऊंगा!
हार गया हूं तुम्हें समझाते हुए, फिर भी एक उम्मीद है। शायद कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा। अधिकतर लोगों की ऐसी ही ज़िन्दगी कटा करती है!"


सिर्फ़ तुम्हारा,
आसिफ़

(मौलिक व अप्रकाशित)

____________________________________________


(डायरी शैली में परिमार्जन-प्रयास) :

'युद्ध कर' (लघुकथा) :

30 मार्च, 2018 (शनिवार)
[रात 11: 30 बजे]


मेरी लैला 'नाज़ो' की दूसरी चिठ्ठी आज अचानक बिस्तर के नीचे मिली। शायद मेरा इंतज़ार करती हुई वह खुर्राटें भरते हुए सो गई दोनों बच्चों के साथ। क्या करूं, आज कुछ ज़्यादा ही सवारियां मिल गईं!
ख़त लिख कर वह अपनी भड़ास यूं निकाल देती है। लगता है कि मुझसे बहुत परेशान हो चुकी है या फिर नये ज़माने के चलन से! लेकिन, मेरी अम्मी और अपने देवर- देवरानी को क्यूं लपेट रही है इस चिट्ठी में? ऐसी बेवक़ूफियां क्यों? उसका मुझसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा होना किस काम का? ठीक है, हमारे ख़्यालात और तौर-तरीक़े बेमेल हैं। शादी के पहले हम यह महसूस नहीं कर पाये। मरे जा रहे थे एक दूसरे के लिए! उसने यह भी नहीं सोचा कि मैं कम पढ़ा-लिखा अॉटो चलाने वाला ग़रीब हूं! आख़िर मेरा क्या कसूर? उसकी तीनों छोटी बहनों की ख़ातिर उसके अब्बू ने उसकी शादी मुझसे कर दी! हम समझे कि उन्हें हमारा प्यार कबूल है! हमने सोचा कि वह मुझे इज़्ज़त देगी, प्यार करती रहेगी। क्या पता था कि नौकरी करते हुए रईस सहेलियों और टीवी धारावाहिकों के असर से वह यूं मुझ पर हावी होने लगेगी। उसने मुझे कई बार तलाक़ के लिए उकसाया बहस के हालात पैदा करके। लेकिन मैं चुप ही रहा। ...मैं तलाक़ नहीं दूंगा! बच्चे बड़े हो रहे हैं! अब तो उसके अब्बू भी नहीं रहे!
मैं उसे तलाक़ क्यों दूं। क्या कमी है उस में? मेरी ही पसंद की है! लड़ाई-झगड़े और बहसें तो सब में होती हैं, रईसों में भी! कई बेमेल रिश्ते हो जाते हैं मुहब्बत या मज़बूरी के नाम पर! उस ने कितनी बार मेरी बेइज़्ज़ती कितने लोगों के सामने की! मैंने भी उसकी की! उसने हमारे मायके वालों को बुरा-भला कहा, तो मैंने उसके! बात बराबर! फिर तलाक़ या ख़ुदक़ुशी जैसे इरादे क्यों? मुझ में और उसमें सिर्फ़ यही फ़र्क है न कि मैं अपनी औक़ात में रहकर ज़मीं पर रहता हूं! दिन-रात मेहनत कर के पैसे कमाता हूं ! लेकिन मुझसे ज़्यादा पढ़े-लिखे होने के सबब से और सरकारी नौकरी करने की वज़ह से कम मेहनत में ज़्यादा पैसे कमा कर, ग़लत सहेलियों के साथ नाज़ो हवा में उड़ने लगी है, अपनी व मेरी औक़ात से बाहर जा रही है! ख़ुदा गवाह है कि मैंने न सिर्फ़ अपने बजट में उसे ख़ुश रखने की कोशिश की है, बल्कि वक्त-व-वक़्त उसे समझाता भी रहा हूं कि बच्चों पर ध्यान दो, बच्चे अब बड़े हो रहे हैं! वह मेरी ज़रूरतें पूरी कर सकती है, लेकिन करती नहीं है! मैं उसकी ज़रूरतें पूरी कर सकता हूं, लेकिन उसे पता नहीं कौन सी हवा लग गई है? ... और ये इस तरह की चिट्ठियां रसोई में और बिस्तर के नीचे छिपाना उन रईस सहेलियों से या टीवी चैनलों के धारावाहिकों और फ़िल्मों से ही तो सीखा उसने मुंहफट बहस करने की तरह? उसे मालूम है कि मैं और मेरी अम्मीजान चुपचाप यह सब बर्दाश्त कर रहे हैं, क्योंकि वह हमारा सहारा भी है! लव-मैरिज है हमारी, कोई मज़ाक नहीं! लेकिन इस ख़त में उसने ख़ुदक़ुशी करने के बाद अपने जमा पैसे सिर्फ बच्चों के नाम करने की बात लिखी? मैं इतना बुरा हूं, मुझ पर भरोसा इतना कम? कब से? न मुझमें कोई ऐब है, न ही उस में! फिर किस बात की अहसास-कमतरी उसे तलाक़ या ख़ुदक़ुशी के लिए उकसाती है, कुछ समझ में नहीं आता!
उसे नहीं पता कि आज फिर मैं गज़रे लेकर किसी और मूड से घर आया था लेकिन उसके इस ख़त ने सिर दर्द ही दिया। ख़ैर, अपनी ख़िदमात ख़ुद करना आता है मुझे! वह यूं ही खुर्राटें भर के सोती रहे, मैं भी सो ही जाऊंगा!
हार गया हूं उसे समझाते हुए, फिर भी एक उम्मीद है। शायद कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा। अधिकतर लोगों की ऐसी ही ज़िन्दगी कटा करती है!


हमेशा से उसका ही,
आसिफ़


(मौलिक व अप्रकाशित)

आदरणीय योगराज प्रभाकर सर, लघुकथा गोष्ठी अंक 36 के सफल आयोजन, कुशल संचालन और त्वरित संकलन हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. आपसे निवेदन है कि क्रमांक 14 पर अंकित लघुकथा "विष बेल" को निम्न लघुकथा से प्रतिस्थापित कर दें. सादर धन्यवाद.

विष बेल 

‘‘अरे कोई इस पिलिया का मुँह बन्द कराओ!’’ उच्च अधिकारी ने उस बच्ची को एक हाथ से उठा कर लाशों के ढेर पर फेंकते हुए कहा।
फ़ौरन ही एक सैनिक ने बच्ची को वहाँ से उठा कर उस कुँए में डाल दिया जहाँ पहले से ही अनगिनत बच्चों की लाशें तैर रही थीं। वह इन शिविरों में अकेले ही हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारने वाला एक वीर सैनिक था।
बच्ची के ख़ामोश होते ही सभी सैनिक समवेत स्वर में बोल उठे ‘‘हम जल्द ही इस धरती को स्वर्ग बना देंगे।’’
‘‘मुक्त करो इन कीड़ों को।’’ उस अधिकारी ने शिविर में खड़े हुए लोगों की तरफ़ इशारा किया और अपनी कुर्सी पर बैठ गया।
श्रम योग्य पुरुषों को अलग करने के बाद लोगों के सर से बाल उतारने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी थी। आगे बढ़कर जैसे ही उस वीर सैनिक ने एक महिला के बाल उतारने की कोशिश की तो वह चौंक गया। वह उसकी प्रेमिका थी। ‘तुम? तो तुम इसलिए मुझे छोड़कर चले गये थे?’ महिला ने आँखों ही आँखों में उससे सवाल पूछा।
वह प्रेमी जो अक्सर अपनी प्रेमिका से कहा करता था, ‘‘मुझे बस दो ही चीज़ें पसन्द हैं, एक तुम्हारी आँखों में डूबना और दूसरा तुम्हारी ज़ुल्फ़ों से खेलना।’’ थोड़ी देर तक वहीं जड़वत खड़ा रहा। फिर उसने अपना उस्तरा निकाला और वही किया जो वह करता आया था।
लोगों को गैस चैम्बर की तरफ़ ले जाने की बारी आ चुकी थी। गैस चैम्बर के दरवाज़े पर पहुँच कर उसने आख़िरी बार अपनी प्रेमिका की आँखों में देखा। झील सूख चुकी थी। उसने प्रेमिका का हाथ पकड़ा और उसे गैस चैम्बर के अन्दर भेज दिया।
इससे पहले कि दरवाज़ा पूरी तरह बन्द होता उस महिला ने अपने प्रेमी से कहा, ‘‘जिस रोती हुई बच्ची को तुमने कुँए में अपने हाथों से फेंका है वह तुम्हारी बेटी थी जिसे तुम मेरी कोख में ही छोड़कर चले आये थे।’’ इतना सुनते ही वह धड़ाम से ज़मीन पर गिर गया।
ज़हरीली गैस चैम्बर के अन्दर भरने लगी। ज़मीन पर बैठे-बैठे ही वह अपनी प्रेमिका को तड़पते और मरते हुए देखता रहा। फिर उसने अपनी पिस्टल निकाली और ख़ुद को गोली मार ली।

यथा निवेदित - तथा प्रतिस्थापित 

आदरणीय योगराज जी मेरी और  आरणीय मुज़्फ्फर जी की लघुकथा स॔कलन में नहीं हैं

दोनों रचनाएँ क्रमांक 18 व 19 पर प्रतिस्थापित कर दी हैं, ध्यानाकर्ष्ण हेतु हार्दिक आभार आ० प्रतिभा पाण्डेय जी.

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Gurpreet Singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
16 minutes ago
vijay nikore posted a blog post

प्रिय भाई डा० रामदरश मिश्र जी

आज १५ अगस्त... कई दिनों से प्रतीक्षा रही इस दिन की ... डा० रामदरश मिश्र जी का जन्म दिवस जो है । आज…See More
23 minutes ago
dandpani nahak posted a blog post

जब क़सम हिंदुस्तान की है

जब क़सम हिंदुस्तान की है फिक्र फिर किसे जान की है फ़लक है समूचा तिरंगा यही बात तो शान की है ज़माने…See More
25 minutes ago
Sheikh Shahzad Usmani posted a blog post

"आया ...आया ... गया!" (लघुकथा)

"लो! एक और गया! .. बह गया बेचारा!" "वो देखो! एक तो अब आ गया न!" आशावादी दृष्टिकोण वाले युवक ने तेज…See More
26 minutes ago
Mohammed Arif commented on Dr. Vijai Shanker's blog post टकराव — डॉo विजय शंकर
"आदरणीय विजय शंकर जी आदाब,                    …"
1 hour ago
Mohammed Arif commented on Sushil Sarna's blog post स्वतंत्रता दिवस पर ३ रचनाएं :
"आदरणीय सुशील सरना जी आदाब,                    …"
1 hour ago
Ajay Kumar Sharma commented on Ajay Kumar Sharma's blog post मन में ही हार, जीत मन में..
"आदरणीया नीलम जी एवं आदरणीया बबिता जी हार्दिक धन्यवाद..."
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"बेहतरीन गजल के लिए ढेरों हार्दिक बधाई ..."
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं
"आ. भाई बसंत जी, उम्दा गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Harihar Jha's blog post झूमता सावन
"आ. हरिहर जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई।"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की - रफ़्ता रफ़्ता अपनी मंज़िल से जुदा होते गए
"आ. भाई नीलेश जी, बेहतरीन गजल हुयी है , हार्दिक बधाई।"
3 hours ago
नादिर ख़ान commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"बड़ी उम्मीद थी उनसे वतन को शाद रक्खेंगे ।खबर क्या थी चमन में वो सितम आबाद रक्खेंगे ।। है पापी पेट…"
14 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service