"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.
मनहरण घनाक्षरी में निबद्ध आपकी तीनों रचनाएँ पठनीय बन पड़ी हैं.
रचनाओं में कई ऐसे हिन्दी शब्दों को स्थान मिला…"
2122 1212 22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस कीहो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में मुझ से मुझ ही को दूर करने को आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में तुम ख़यालों में…See More
दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ । वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में …See More
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी
छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान
सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान
लइका अऊ सियान,तभ्भो सब मन शर्माथे
हिन्दी म जी गाथे, इंग्लिश म गोठियाथे
अपन भाखा उन्नति, का आने मन ह करही
आव जी…"
२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक ऐसा कवच मढ़ सके आदमी।२।*दूर नफ़रत का जंजाल करले अगरदो कदम तब कहीं बढ़ सके आदमी।३।*खींचने में लगे …See More
दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ । वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में …See More