दोहा पंचक. . . . नवयुग
प्रीति दुर्ग में वासना, फैलाती दुर्गन्ध ।
चूनर उतरी लाज की, बंध हुए निर्बंध ।।
पानी सूखा आँख का, न्यून हुए परिधान ।
बेशर्मी हावी हुई, भूले देना मान ।।
सार्वजनिक अश्लीलता, फैली पैर पसार ।
पश्चिम की यह सभ्यता, लील रही संस्कार ।।
पश्चिम के परिधान का, फैला ऐसा रोग ।
नवयुग ने बस प्यार को, समझा केवल भोग ।।
अवनत जीवन के हुए, पावन सब प्रतिमान ।
भोग पिपासा आज के, नवयुग की पहचान ।।
सुशील सरना / 21-2-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
दोहा पंचक. . . . .नवयुग
by Sushil Sarna
Feb 21
दोहा पंचक. . . . नवयुग
प्रीति दुर्ग में वासना, फैलाती दुर्गन्ध ।
चूनर उतरी लाज की, बंध हुए निर्बंध ।।
पानी सूखा आँख का, न्यून हुए परिधान ।
बेशर्मी हावी हुई, भूले देना मान ।।
सार्वजनिक अश्लीलता, फैली पैर पसार ।
पश्चिम की यह सभ्यता, लील रही संस्कार ।।
पश्चिम के परिधान का, फैला ऐसा रोग ।
नवयुग ने बस प्यार को, समझा केवल भोग ।।
अवनत जीवन के हुए, पावन सब प्रतिमान ।
भोग पिपासा आज के, नवयुग की पहचान ।।
सुशील सरना / 21-2-25
मौलिक एवं अप्रकाशित