दोहे -रिश्ता

सब को लगता व्यर्थ है, अर्थ बिना संसार।
रिश्तों तक को बेचता, इस कारण बाजार।।
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वह रिश्ते ही सच  कहूँ, पाते  लम्बी आयु
जहाँ परखते हैं नहीं, दीपक को बन वायु।।
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तोड़ो मत विश्वास की, कभी भूल से डोर
यह टूटा तो हो  गया, हर रिश्ता कमजोर।।
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करे दम्भ लंकेश सा, कुल का पूर्ण विनाश।
ढके दम्भ की धूल ही, रिश्तों का आकाश।।
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रिश्तों में  सब  ढूँढते, केवल स्वार्थ जुगाड़।
शेष बची है अब कहाँ, अपनेपन की आड़।।
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सुख में सब वाचाल हैं, दुख में बेढब मौन
कौन पराया आज  है, बोलो अपना कौन।।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

  • Sushil Sarna

    आदरणीय लक्ष्मण धामी जी रिश्तों पर आधारित आपकी दोहावली बहुत सुंदर और सार्थक बन पड़ी है ।हार्दिक बधाई स्वीकार करें सर।