by Sushil Sarna
Mar 20
दोहा सप्तक. . . . विरह शृंगार
दृगजल से लोचन भरे, व्यथित हृदय उद्गार ।बाट जोहते दिन कटा, रैन लगे अंगार ।।
तन में धड़कन प्रेम की, नैनन बरसे नीर ।बैरी मन को दे गया, अनबोली वह पीर ।।
जग क्या जाने प्रेम के, कितने गहरे घाव ।अंतस की हर पीर को, जीवित करते स्राव ।।
विरही मन में मीत की, हरदम आती याद ।हर करवट पर मीत से, मन करता संवाद ।।
बैठ अनमनी द्वार पर, विरहन देखे राह ।मन में उठती हूक सी , पिया मिलन की चाह ।
नैन पिया की याद में, हरदम रहते मौन ।आखिर अधरों की हँसी , लूट ले गया कौन ।।
मौन हुई अब चूड़ियाँ, मौन हुआ शृंगार ।मौन विरह के पाँव में, पायल की झंकार ।।
सुशील सरना / 20-3-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
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दोहा सप्तक. . . . विरह शृंगार
by Sushil Sarna
Mar 20
दोहा सप्तक. . . . विरह शृंगार
दृगजल से लोचन भरे, व्यथित हृदय उद्गार ।
बाट जोहते दिन कटा, रैन लगे अंगार ।।
तन में धड़कन प्रेम की, नैनन बरसे नीर ।
बैरी मन को दे गया, अनबोली वह पीर ।।
जग क्या जाने प्रेम के, कितने गहरे घाव ।
अंतस की हर पीर को, जीवित करते स्राव ।।
विरही मन में मीत की, हरदम आती याद ।
हर करवट पर मीत से, मन करता संवाद ।।
बैठ अनमनी द्वार पर, विरहन देखे राह ।
मन में उठती हूक सी , पिया मिलन की चाह ।
नैन पिया की याद में, हरदम रहते मौन ।
आखिर अधरों की हँसी , लूट ले गया कौन ।।
मौन हुई अब चूड़ियाँ, मौन हुआ शृंगार ।
मौन विरह के पाँव में, पायल की झंकार ।।
सुशील सरना / 20-3-25
मौलिक एवं अप्रकाशित