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ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी
मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१।
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भूले हैं सिर्फ लोग न सच को निहारना
हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२।
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आदत पड़ी हो झूठ की जब राजनीति को
दिखता है सच, जबान पे आता नहीं कभी।३।
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बस्ती में सच की झूठ को मिलता है ठौर पर
सच को तो झूठ आस भी देता नहीं कभी।४।
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जनता को सत्य कैसे भला रास आएगा
सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं कभी।५।
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तन्हा मिलेगा पथ में 'मुसाफिर' से बोल दे
सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी।६।
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मौलिक/अप्रकाशित
- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।
Jan 10
रवि भसीन 'शाहिद'
आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। काफ़ी देर के बाद मिल रहे हैं। इस सुंदर प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें।
/भूले हैं सिर्फ लोग न सच को निहारना/
इस शेर के शिल्प में सुधार की गुंजाइश लग रही है। एक सुझाव:
भूले नहीं हैं लोग ही सच को निहारना
/सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं कभी/
इस मिसरे के लिए सुझाव:
सच्चा मिला है एक भी राजा नहीं कभी
सादर
Jan 26
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।
on Saturday