सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२
*
ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी
मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१।
*
भूले हैं सिर्फ  लोग  न  सच को निहारना
हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२।
*
आदत पड़ी हो झूठ की जब राजनीति को
दिखता है सच, जबान पे आता नहीं कभी।३।
*
बस्ती में सच की झूठ को मिलता है ठौर पर
सच को तो  झूठ  आस  भी देता नहीं कभी।४।
*
जनता को सत्य  कैसे  भला रास आएगा
सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं कभी।५।
*
तन्हा मिलेगा पथ में 'मुसाफिर' से बोल दे
सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी।६।
***
मौलिक/अप्रकाशित
- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Load Previous Comments
  • लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

    आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  • रवि भसीन 'शाहिद'

    आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। काफ़ी देर के बाद मिल रहे हैं। इस सुंदर प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें।

    /भूले हैं सिर्फ लोग न सच को निहारना/

    इस शेर के शिल्प में सुधार की गुंजाइश लग रही है। एक सुझाव:

    भूले नहीं हैं लोग ही सच को निहारना

    /सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं कभी/

    इस मिसरे के लिए सुझाव:

    सच्चा मिला है एक भी राजा नहीं कभी

    सादर

  • लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

    आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।