by Sushil Sarna
Jan 9
कुंडलिया. . . .
किसने समझा आज तक, मुफलिस का संसार ।आँखें उसकी वेदना, नित्य करें साकार ।।नित्य करें साकार , दर्द यह कहा न जाता ।उसे भूख का दंश , सदा ही बड़ा सताता ।।पत्थर पर ही पीठ , टिकाई हरदम इसने ।भूखी काली रात , भाग्य में लिख दी किसने ।।
सुशील सरना / 9-1-26
मौलिक एवं अप्रकाशित
आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, निर्धन की पीड़ा पर सार्थक कुण्डलिया छंद रचा है आपने.हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर
Jan 25
आदरणीय अशोक जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी
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Ashok Kumar Raktale
आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, निर्धन की पीड़ा पर सार्थक कुण्डलिया छंद रचा है आपने.हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर
Jan 25
Sushil Sarna
आदरणीय अशोक जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी
Jan 25