मकर संक्रांति के अवसर पर
दोहा एकादश . . . . पतंग
आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।
बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।।
बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।
आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।
कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।
डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।
नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के रंग ।
जात- पात को भूलकर, अम्बर उड़े पतंग ।।
जैसे ही आकाश में, कोई कटे पतंग ।
उसे लूटने के लिए, आते कई दबंग ।।
किसी धर्म की है हरी, किसी धर्म की लाल ।
आसमान में खो गए, ऐसे सभी सवाल ।।
सुघड़ हाथ में डोर तो, छूती मेघ पतंग ।
गलत हाथ में जो गई, खंडित होते अंग ।।
आसमान में जब उड़े, सुन्दर सुघड़ पतंग ।
लेकर उड़ती साथ में, प्रेम सुवासित रंग ।।
छैल - छबीली सी उड़े, लचकें कोमल अंग ।
सीना ताने गर्व से, नभ में उड़े पतंग ।।
हिलमिल कैसे उड़ रहे, आसमान में रंग ।
मुश्किल है पहचानना , अपनी कहाँ पतंग ।।
सुशील सरना / 14-1-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
Ashok Kumar Raktale
आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, पतंग के माध्यम से आपने बहुत कुछ कह दिया है. बहुत सुन्दर और सार्थक इस दोहावली के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर
Jan 25
Sushil Sarna
आदरणीय अशोक जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी
Jan 25