दोहा पंचक. . . . रिश्ते
मिलते हैं ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।
निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।
लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।
वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।
पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में संबंध ।
आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।
वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान ।
संबंधों को लीलती , धन की झूठी शान ।।
रिश्तों में माधुर्य का, वक्त गया है बीत ।
अब तो बस पहचान की ,निभा रहे हैं रीत ।।
सुशील सरना / 1-2-26
मौलिक एवं अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।
yesterday
Sushil Sarna
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय
yesterday