ग़ज़ल

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आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में

क्या से क्या हो गए महब्बत में

 

मैं ख़यालों में आ गया उस की

हो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में

 

मुझ से मुझ ही को दूर करने को 

आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में

 

तुम ख़यालों में आ जाते हो यूं

चीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में

 

चाट कर के अफीम मज़हब की

मरते हैं क्यूँ ग़रीब ग़फ़लत में

 

ए ग़रीबी है शुक्रिया तेरा

जो भी सीखा है सीखा ग़ुर्बत में

 

मौलिक एवं अप्रकाशित