आधार छंद-मनहरण घनाक्षरी
सुख हो या दुख चाहें रहते सहज और, जग की कठिनता से जो न घबराते हैं।
स्थिति हो विषम भी तो घरें धीर निज हिय , राह अपने लिए जो स्वयँ ही बनाते हैं।।
रण ही है जीवन का नाम दूजा मान कर, कार्य में निरत पग पीछे न हटाते हैं।
जग में मनुज वे ही सदा ही सभी के लिए, कर्मवीरता के प्रतिमान बन जाते हैं।।1।।
रहें नहीं भाग्य के भरोसे पछताएँ नहीं, पथ की विषमताओं को जो पहचाने हैं।
हों नहीं निराश न ही कोशिशों से मुख मोड़ें, किसी हार से जो कभी हार नहीं माने हैं।
त्रुटियों को खोजें निज सूझ बूझ से जो फिर, नूतन उमंग संग बढ़ने की ठाने हैं।
उनके लिए तो काँटे पथ के भी शस्त्र बनें, लक्ष्य साधना में करें योग सभी जाने हैं।।2।।
सुनें जो सभी की और गुनें निज मन में भी, अपने विवेक से जो करे हर काम हैं।
टालें नहीं कल के लिए जो कभी कार्य और, कार्य के लिए ही प्रतिबद्ध आठों याम हैं।।
समय का मोल जानें यों ही न गँवाएँ इसे, लक्ष्य के जो पथ पर चले अविराम हैं।
ऐसे कर्मवीरों ने ही ऊँचे आसमान पर, स्वर्ण अक्षरों से लिखवाए निज नाम हैं।।3।।
रचनाकार-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.
मनहरण घनाक्षरी में निबद्ध आपकी तीनों रचनाएँ पठनीय बन पड़ी हैं.
रचनाओं में कई ऐसे हिन्दी शब्दों को स्थान मिला है, जो आज सामान्य प्रचलन में नहीं हैं. यह एक सुखद प्रयास है.
अभिव्यक्तियों के लिए हार्दिक बधाई
1 hour ago