२१२/२१२/२१२/२१२ ** अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमी एक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१। * आदमीयत जहाँ खूब महफूज हो एक ऐसा कवच मढ़ सके आदमी।२। * दूर नफ़रत का जंजाल करले अगर दो कदम तब कहीं बढ़ सके आदमी।३। * खींचने में लगे पाँव अपने ही अब व्योम कैसे सहज चढ़ सके आदमी।४। * तब मनुज देवता हो गया जान लो लोक मन में अगर कढ़ सके आदमी।५। ** मौलिक/अप्रकाशित लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
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२१२/२१२/२१२/२१२
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अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमी
एक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।
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आदमीयत जहाँ खूब महफूज हो
एक ऐसा कवच मढ़ सके आदमी।२।
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दूर नफ़रत का जंजाल करले अगर
दो कदम तब कहीं बढ़ सके आदमी।३।
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खींचने में लगे पाँव अपने ही अब
व्योम कैसे सहज चढ़ सके आदमी।४।
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तब मनुज देवता हो गया जान लो
लोक मन में अगर कढ़ सके आदमी।५।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'