दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस

बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।
कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।

घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज ।
जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।।

जिसको देखो घूस का, अजब लगा है रोग ।
घूसखोर समझे नहीं, पाप पंक के भोग ।।

बिना घूस होता नहीं, कोई भी हो काम ।
छोटे आते जाल में, बड़े रहें गुमनाम ।।

बाँछें खिलतीं मेज पर, जब भी  आता काम ।
बाबू भरता घूस से, अपने घर गोदाम ।।

खुलेआम अब घूस का, होता है व्यापार ।
कैसी भी हो काम की, अड़चन काटे धार ।।

लग जाए जो घूस का, चस्का मुँह को यार ।
सपने में भी घूस फिर, उसे दिखे हर बार ।।

सुशील सरना / 18-2-26
मौलिक एवं अप्रकाशित