by Jaihind Raipuri
Mar 4
ग़ज़ल 2122 1212 22
वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है
कितने दुःख दर्द से भरा दिल है
ये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बाती
पास उनके जो सुनहरा दिल है
ताज इक सब के मन के अंदर भी
और ये शह्र आगरा दिल है
दिल लगी दिल्लगी नहीं होती
इक ग़ज़ब का मुहावरा दिल है
देखकर उनकी मदभरी आँखें
खो गया मेरा मदभरा दिल है
याद मुद्दत से वो नहीं है 'जय'
आज फिर क्यूँ भरा भरा दिल है
मौलिक एवं अप्रकाशित
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वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
by Jaihind Raipuri
Mar 4
ग़ज़ल 2122 1212 22
वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है
कितने दुःख दर्द से भरा दिल है
ये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बाती
पास उनके जो सुनहरा दिल है
ताज इक सब के मन के अंदर भी
और ये शह्र आगरा दिल है
दिल लगी दिल्लगी नहीं होती
इक ग़ज़ब का मुहावरा दिल है
देखकर उनकी मदभरी आँखें
खो गया मेरा मदभरा दिल है
याद मुद्दत से वो नहीं है 'जय'
आज फिर क्यूँ भरा भरा दिल है
मौलिक एवं अप्रकाशित