by Sushil Sarna
on Tuesday
दोहा पंचक. . . . . अधर
अधरों को अभिसार का, मत देना इल्जाम ।मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम ।।
उन्मादी आवेग में , कब कुछ रहता ध्यान ।अधरों की शैतानियाँ, कहते सुर्ख निशान ।।
अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल शाम । जज्बातों के वेग में, बंध हुए बदनाम ।।
अधर समागम जब हुआ, खूब हुआ संग्राम ।स्पर्शों के दौर में , बिखर गये सब जाम ।।
अधर दलों पर डोलता, जब दिल का ईमान ।बेशर्मी के पार सब, दिल करता सोपान ।।
सुशील सरना / 17-3-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
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दोहा पंचक. . . . .अधर
by Sushil Sarna
on Tuesday
दोहा पंचक. . . . . अधर
अधरों को अभिसार का, मत देना इल्जाम ।
मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम ।।
उन्मादी आवेग में , कब कुछ रहता ध्यान ।
अधरों की शैतानियाँ, कहते सुर्ख निशान ।।
अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल शाम ।
जज्बातों के वेग में, बंध हुए बदनाम ।।
अधर समागम जब हुआ, खूब हुआ संग्राम ।
स्पर्शों के दौर में , बिखर गये सब जाम ।।
अधर दलों पर डोलता, जब दिल का ईमान ।
बेशर्मी के पार सब, दिल करता सोपान ।।
सुशील सरना / 17-3-25
मौलिक एवं अप्रकाशित