दोहा
बरखा के बढ़ते क़दम, आये हैं अब पास।
दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।
चौपाई
वह फुहार वह साथ तुम्हारा। हरपल था सुरभित अति प्यारा।।
मन साजन यह कैसे भूले। साथ-साथ तुम हम थे झूले।।
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तुम थे झूले थाम कलाई। मैं साजन कितनी शरमाई।।
तुम जब-जब थे पींग बढ़ाते। हम इक दूजे में खो जाते।।
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झुकीं-झुकीं मेरी ये अँखियाँ। देख रहीं थीं हँस-हँस सखियाँ।।
पर साजन तुम रुके न माने। मिले मुझे सखियों से ताने।।
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भूल न पाई वह पल प्यारे। स्वप्न सरीखे हैं वह सारे।।
आने को है फिर अब सावन। लेकिन पास नहीं तुम साजन।।
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~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’, उज्जैन.
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।
Jul 18