सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार पर जब-जब जहाँ कहीं फूल खिले याद तुझे किया था हमने ... कहती थी न ... "क्या... तुम्हारे मन के द्वार तक मेरे दिल की दस्तक नहीं पहुंची ?" दस्तक पहुँची पहुँची हर बार भाग कर साँकल खोली कोई था न द्वार पर चिरकाल से जाने-पहचाने अकेलेपन के सिवा हाँ, इस दर्दीले अकेलेपन के सिवा कुछ और न था लौट आया मैं खाली हाथ न, न, न मुठ्ठी में लिखा नाम तो तुम्हारा ही था केवल तुम्हारा जो कभी मिटने न दिया उसे मिटाता भी कैसे तुम्हारे आने की उसको अनन्त इन्तज़ार जो रही हर बारिश के बाद तुम्हारे भीगे आँचल की आस लिए कब से... अब तक इस बार जो मैं साँकल खोलूँ तो आना द्वार पर तुम ही होना -------- ( यह कविता कवियत्रि प्रिया शर्मा जी की रचना से प्रेरित) (मौलिक व अप्रकाशित)

  • सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

     

    निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा पूरी तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर जी. 

    कथ्य को सार्थक विन्यास मिला है. 

     

    इस बार जो मैं साँकल खोलूँ
    तो आना
    द्वार पर तुम ही होना .. इस पंक्ति ने एकबारगी झकझोर दिया.. 

    कि, न होने के बावजूद होने की उत्कट अपेक्षा किसी क्षीण होते प्रतीक्षारत की लगातार तनती हुई साँसों के बने रहने का जिद हुआ करती है. 

    हार्दिक बधाई, आदरणीय ..