हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो हरि नाम लो।
यह नाम ही है सत्य मानव, भोर लो नित शाम लो।
करते रहो नित भक्ति प्रभु की, नित्य प्रभु आराधना।
तब बिन कहे हर एक होगी, पूर्ण मंगल कामना।।
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आ जाइये प्रभु की शरण में, मोक्ष का सुख पाइये।
नित गाइये प्रभु वन्दना नित, नाम हरि का ध्याइये।
संतोष धन उनको मिलेगा, जो जपेंगे नाम ये।
वह मुक्त होंगे कष्ट से सब, छोड़कर जग धाम ये।।
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जयकार शिव की कर रहे सब, पुण्य सावन मास में।
अर्चक चले कांवड़ उठाए, प्रभु दरस विश्वास में।
शृंगार करतीं नव लताएँ, पिय मिलन की आस में।
उपवास करतीं नारियाँ भी, प्रीति सुख उल्लास में।।
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अर्पित करें शिव को सुगन्धित, पुष्प फल जल द्रव्य भी।
अर्पित करें जन बिल्व के फल, पत्र भी शुचि हव्य भी।
नित पूजते अभिषेक करते, भक्त ले घृत गव्य भी।
नित मंदिरों में भीड़ होती, वस्त्र पहने नव्य भी।।
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~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’, उज्जैन
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
आदरणीय अशोक भाईजी,
श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत हरिगीतिका जैसे प्रवहमान छंद में शिव महिमा पढ़ने को मिली. मन धन्य हो गया.
जयकार शिव की कर रहे सब, पुण्य सावन मास में।
अर्चक चले कांवड़ उठाए, प्रभु दरस विश्वास में।
शृंगार करतीं नव लताएँ, पिय मिलन की आस में।
उपवास करतीं नारियाँ भी, प्रीति सुख उल्लास में।।
सावन की फुहार में नव लताओं का मोहक-विकास और इधर शिव-पूजन की प्रक्रिया का सुन्दर बखान मुग्ध कर रहा है.
संतोष धन उनको मिलेगा, जो जपेंगे नाम ये।
वह मुक्त होंगे कष्ट से सब, छोड़कर जग धाम ये ...
उपर्युक्त पंक्तियों का वैन्यासिक गठन तनिक और समय चाहता है.
इस छांदसिक रचना के लिए हार्दिक धन्यवाद तथा बधाइयाँ
शुभातिशुभ
Aug 3