"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-170

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,

जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर नव-हस्ताक्षरों, के लिए अपनी कलम की धार को और भी तीक्ष्ण करने का अवसर प्रदान करता है. इसी क्रम में प्रस्तुत है :

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-170

विषय : "जिंदगी की जंग"

आयोजन अवधि- 11 जनवरी 2025, दिन शनिवार से 12 जनवरी 2025, दिन रविवार की समाप्ति तक अर्थात कुल दो दिन.


ध्यान रहे : बात बेशक छोटी हो लेकिन 'घाव करे गंभीर’ करने वाली हो तो पद्य- समारोह का आनन्द बहुगुणा हो जाए. आयोजन के लिए दिये विषय को केन्द्रित करते हुए आप सभी अपनी मौलिक एवं अप्रकाशित रचना पद्य-साहित्य की किसी भी विधा में स्वयं द्वारा लाइव पोस्ट कर सकते हैं. साथ ही अन्य साथियों की रचना पर लाइव टिप्पणी भी कर सकते हैं.

उदाहरण स्वरुप पद्य-साहित्य की कुछ विधाओं का नाम सूचीबद्ध किये जा रहे हैं --

तुकांत कविता, अतुकांत आधुनिक कविता, हास्य कविता, गीत-नवगीत, ग़ज़ल, नज़्म, हाइकू, सॉनेट, व्यंग्य काव्य, मुक्तक, शास्त्रीय-छंद जैसे दोहा, चौपाई, कुंडलिया, कवित्त, सवैया, हरिगीतिका आदि.

अति आवश्यक सूचना :-

रचनाओं की संख्या पर कोई बन्धन नहीं है. किन्तु, एक से अधिक रचनाएँ प्रस्तुत करनी हों तो पद्य-साहित्य की अलग अलग विधाओं अथवा अलग अलग छंदों में रचनाएँ प्रस्तुत हों.
रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना अच्छी तरह से देवनागरी के फॉण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें.
रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे अपनी रचना पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं.
प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें.
नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
सदस्यगण बार-बार संशोधन हेतु अनुरोध न करें, बल्कि उनकी रचनाओं पर प्राप्त सुझावों को भली-भाँति अध्ययन कर संकलन आने के बाद संशोधन हेतु अनुरोध करें. सदस्यगण ध्यान रखें कि रचनाओं में किन्हीं दोषों या गलतियों पर सुझावों के अनुसार संशोधन कराने को किसी सुविधा की तरह लें, न कि किसी अधिकार की तरह.

आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है.

इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.

रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. अनावश्यक रूप से स्माइली अथवा रोमन फाण्ट का उपयोग न करें. रोमन फाण्ट में टिप्पणियाँ करना, एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो 11 जनवरी 2025, दिन शनिवार लगते ही खोल दिया जायेगा।

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मंच संचालक

ई. गणेश जी बाग़ी 
(संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक)
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    लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

    सादर अभिवादन।

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      लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

      दोहा अष्टक
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      हर पथ जब आसान हो, क्या जीवन संघर्ष।
      लड़-भिड़कर ही कष्ट से, मिलता है उत्कर्ष।।
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      सहनशील बन जीत ले, मत हो केवल क्रुद्ध।
      जीवन  इक  संग्राम  है, सत्य  कह गये बुद्ध।।
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      जीवन रण में बज रही, रणभेरी हर ओर।
      बचके जाये मन कहाँ, दिखे न कोई छोर।।
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      साथ नहीं जिसके चले, देखो दोपल राम।
      हार गया समझो वही, जीवन का संग्राम।।
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      लड़ना ही पड़ता सदा, जीवन का हर युद्ध।
      भाग गये यदि  एक  से, खड़ा  दूसरा शुद्ध।।
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      निर्धन कैसे खोल दे, अभिलाषा की खान।
      जीवन का संघर्ष बस, रोटी, वसन, मकान।।
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      चलता है जीवन समर, चक्रव्यूह के मध्य।
      कौरव जैसे  शत्रु  से, रहता कौन अवध्य।।
      *
      केवल चौसर खेल मत, जीवन रण में जीव।
      अगर चाहिए जय  उठा, गोवर्धन-गाण्डीव।।
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      मौलिक/अप्रकाशित

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      Sushil Sarna

      दोहा पंचक. . . .  जीवन  एक संघर्ष

      जब तक तन में श्वास है, करे जिंदगी जंग ।
      कदम - कदम पर  जंग के, दिखलाती वह रंग ।।

      दो रोटी को जिंदगी, करे सदा संघर्ष ।
      बने कभी यह वेदना, कभी बने यह हर्ष ।।

      करे संघर्ष जिंदगी, जीवन के हर द्वार ।
      रहे अबूझी ही सदा, इसकी मौन झंकार ।।

      चार घड़ी का हर्ष फिर, बीता नूतन वर्ष ।
      अविरल करती जिंदगी, जीने का संघर्ष ।।

      नित्य करे यह जिंदगी, एक नया संघर्ष ।
      इसका हर संघर्ष में, छुपा नया  उत्कर्ष ।।

      मौलिक एवं अप्रकाशित

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