आदरणीय साहित्य प्रेमियो,
जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर नव-हस्ताक्षरों, के लिए अपनी कलम की धार को और भी तीक्ष्ण करने का अवसर प्रदान करता है. इसी क्रम में प्रस्तुत है :
"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
विषय : "आरंभ और अंत"
आयोजन 17 जनवरी 2026, दिन शनिवार से 18 जनवरी 2026, दिन रविवार की समाप्ति तक अर्थात कुल दो दिन.
ध्यान रहे : बात बेशक छोटी हो लेकिन 'घाव करे गंभीर’ करने वाली हो तो पद्य- समारोह का आनन्द बहुगुणा हो जाए. आयोजन के लिए दिये विषय को केन्द्रित करते हुए आप सभी अपनी मौलिक एवं अप्रकाशित रचना पद्य-साहित्य की किसी भी विधा में स्वयं द्वारा लाइव पोस्ट कर सकते हैं. साथ ही अन्य साथियों की रचना पर लाइव टिप्पणी भी कर सकते हैं.
उदाहरण स्वरुप पद्य-साहित्य की कुछ विधाओं का नाम सूचीबद्ध किये जा रहे हैं --
तुकांत कविता, अतुकांत आधुनिक कविता, हास्य कविता, गीत-नवगीत, ग़ज़ल, नज़्म, हाइकू, सॉनेट, व्यंग्य काव्य, मुक्तक, शास्त्रीय-छंद जैसे दोहा, चौपाई, कुंडलिया, कवित्त, सवैया, हरिगीतिका आदि.
अति आवश्यक सूचना :-
रचनाओं की संख्या पर कोई बन्धन नहीं है. किन्तु, एक से अधिक रचनाएँ प्रस्तुत करनी हों तो पद्य-साहित्य की अलग अलग विधाओं अथवा अलग अलग छंदों में रचनाएँ प्रस्तुत हों.
रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना अच्छी तरह से देवनागरी के फॉण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें.
रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे अपनी रचना पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं.
प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें.
नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
सदस्यगण बार-बार संशोधन हेतु अनुरोध न करें, बल्कि उनकी रचनाओं पर प्राप्त सुझावों को भली-भाँति अध्ययन कर संकलन आने के बाद संशोधन हेतु अनुरोध करें. सदस्यगण ध्यान रखें कि रचनाओं में किन्हीं दोषों या गलतियों पर सुझावों के अनुसार संशोधन कराने को किसी सुविधा की तरह लें, न कि किसी अधिकार की तरह.
आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है.
इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.
रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. अनावश्यक रूप से स्माइली अथवा रोमन फाण्ट का उपयोग न करें. रोमन फाण्ट में टिप्पणियाँ करना, एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.
फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो 17 जनवरी 2026, दिन शनिवार लगते ही खोल दिया जायेगा।
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महा-उत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...
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मंच संचालक
मिथिलेश वामनकर
(सदस्य टीम प्रबंधन)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम परिवार
Sushil Sarna
दोहा मुक्तक. . . . .
आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।
साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख ।
दिखता है आरम्भ पर, ओझल रहता अन्त -
वैसी मिलती जिंदगी, जैसे होते लेख ।
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आदि भाल पर अंत की, कथा लिखी बेअंत ।
अमिट गमन हर जीव का, क्या राजा क्या संत ।
संग खुशी के वेदना, सब जीवन के रंग –
नियत समय पर जीव को, मिलता अंत अनन्त ।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Jan 17
Sushil Sarna
दोहा पंचक . . . आरम्भ/अंत
अंत सदा आरम्भ का, देता कष्ट अनेक ।
हरती यही विडम्बना , जीवन भरा विवेक ।।
साँसों का आरम्भ है, जीवन का प्रारम्भ ।
अंत दिशा में जीव को, झोंके उसका दंभ ।।
कब होता आरम्भ से ,कभी अंत का भान ।
साँसों के अंजाम से , गाफिल क्यों इंसान ।।
सही दिशा आरम्भ को, देती नया प्रभात ।
जीवन की कठिनाइयाँ, फिर खाती हैं मात ।।
सदा सही आरम्भ को , मिले शिखर सम्मान ।
छुपा हुआ आरम्भ में, जीवन का उत्थान ।।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Jan 17
अजय गुप्ता 'अजेय
अंत या आरंभ
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ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संत
हो गया आरंभ जिसका, है अटल फिर अंत
अंततः है अंत होना, जो हुआ आरंभ
देखते हैं नित्य फिर भी, है हृदय में दंभ
प्रथम पग से पूर्व रखना, ध्यान में ही लक्ष्य
नष्ट होना ही नियत है, सृजन का गंतव्य
सृष्टि का भी अटल रहना, है प्रकृति विपरीत
मात्र परिवर्तन नियम है, कुछ न कालातीत
पंचभौतिक तत्त्व सारे, लौट जाते मूल
मूल से ही पुनः खिलते, हैं सृजन के फूल
चक्र यह आवागमन का, कब हुआ अवरुद्ध
जो इसे स्वीकार कर ले, है वही तो बुद्ध
शत्रुता शाश्वत नहीं है, और ना ही प्रीत
हार भी अंतिम नहीं है, और ना ही जीत
पुण्य भी हैं क्षीण होते, सकल कटते पाप
तम न रहता ना प्रकाश ही, शीत ना ही ताप
ज्ञान स्थाई कब हुआ है, कब हुआ अज्ञान
सभ्यता स्थाई हुई कब, और कब विज्ञान
प्रत्येक परिवर्तन लिवाता, इक नया आरंभ
अंत से लिपटा हुआ है, सदा पुनरारंभ
ऊर्जा होकर परिवर्तित, बदल रही बस रूप
करे आत्मा भी यही तो, बदले बस स्वरूप
सदा के लिए ये दोनों, होती कब विलीन
कुछ नहीं अंतर कहें जब, कृष्ण-आइन्स्टीन
#मौलिक एवं अप्रकाशित
प्रस्तुत रचना को रूपमाला छंद पर लिखा गया है। इस छंद के प्रयोग और विधान का जितना मुझे पता लग सका उसे अधिकतम निभाने का प्रयास किया है। फिर भी त्रुटियाँ रह जानी स्वाभाविक हैं। आप गुणीजनों की ओर से उचित मार्गदर्शन अपेक्षित है।
अग्रिम धन्यवाद सहित
रूपमाला छंद : (14,10) x 4; पदांत 21 से
(इसे मदन छंद भी कहते हैं। 2122 2122, 2122 21 सरल विन्यास का एक रूप )
जानकारी स्रोत: ओबीओ तथा अन्य ऑनलाइन मंच
Jan 17