चित्र से काव्य तक

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'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 161

आदरणीय काव्य-रसिको !

सादर अभिवादन !!

  

’चित्र से काव्य तक छन्दोत्सव का यह एक सौ एकसठवाँ योजन है।.   

 

छंद का नाम -  छंद मनहरण घनाक्षरी 

आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ - 

23 नवंबर’ 24 दिन शनिवार से

24 नवंबर’ 24 दिन रविवार तक

केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.  

मनहरण घनाक्षरी छंद के मूलभूत नियमों के लिए यहाँ क्लिक करें

जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के  भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.

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आयोजन सम्बन्धी नोट 

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -

23 नवंबर’ 24 दिन शनिवार से 24 नवंबर’ 24 दिन रविवार तक  रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं। 

अति आवश्यक सूचना :

  1. रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
  2. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
  3. सदस्यगण संशोधन हेतु अनुरोध  करें.
  4. अपने पोस्ट या अपनी टिप्पणी को सदस्य स्वयं ही किसी हालत में डिलिट न करें. 
  5. आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति संवेदनशीलता आपेक्षित है.
  6. इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.
  7. रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. 
  8. अनावश्यक रूप से रोमन फाण्ट का उपयोग  करें. रोमन फ़ॉण्ट में टिप्पणियाँ करना एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.
  9. रचनाओं को लेफ़्ट अलाइंड रखते हुए नॉन-बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें. अन्यथा आगे संकलन के क्रम में संग्रहकर्ता को बहुत ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

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मंच संचालक
सौरभ पाण्डेय
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम  

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    सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

    सभी सदस्यों से रचना-प्रस्तुति की अपेक्षा है.. 

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      लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'


      शीत लहर ही चहुँदिश दिखती, है हुई तपन अतीत यहाँ।
      यौवन  जैसी  ठिठुरन  लेकर, आन  पहुँची है शीत यहाँ।।
      मौसम बैरी  अजब हो  गया, ढकती  धुंध  हर रूप यहाँ।
      इस कारण ही नहीं मिल रही, जीव जहान को धूप यहाँ।।
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      छोड़ रहा शर शीत लहर के, जाड़ा अनौखे खूब यहाँ।
      नभ के उर तो  पीर  बसी  पर, आँसू  समेटे  दूब यहाँ।।
      हाड़ कँपाती ठंड कर  रही, बुरा निर्धन  का हाल बहुत।
      उनको पड़ता फर्क न कोई, हैं जिन्हें स्वेटर शॉल बहुत।।
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      शीत लहर सह फैल रही है, देखो मौत की बात यहाँ।
      दिन नारी  सा  घूँघट ओढ़े, थरथर  काँपती रात यहाँ।।
      चहुँदिश लगी लालसा धूप की, नहीं सुहाती छाँव यहाँ।
      ताप रहे हैं खूब  अलाव अब, भीतर  बाहर  गाँव यहाँ।।
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      झूम रहे हैं ओढ़े तुसार, गेहूँ सरसों के खेत बहुत।
      प्यास बुझाती  ओस से, देखो  बिखरी रेत बहुत।।
      साकल धरा ही अब लग रही, इक कुहरे की झील हमें।
      घट कर  सूरज  भी नभ  में  लगे, जैसे  हो  कंदील हमें।।
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      पारा गिरकर जमी नदियाँ हैं, हिम शिखरों की गोद बहुत।
      आते  हैं  हिमपात  में  करने, लोग  वहीं   आमोद  बहुत।।
      देखो हिम से  लकदक  हो गये, घाटी  और   पहाड़ बहुत।
      हर कामकाज अब ठप हो गया, दुनियाँ झोंके भाड़ बहुत।।
      *
      मौलिक/अप्रकाशित

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      Ashok Kumar Raktale

      मनहरण घनाक्षरी

       

      नन्हें-नन्हें बच्चों के न हाथों में किताब और, पीठ पर शाला वाले, झोले का न भार है।

      हो रहा विमर्श किसी बात  पर बच्चों में दो, दिखता  न  किन्तु  कहीं  होती तकरार है।

      सुलगा   अलाव   बैठे  सर्दियाँ  भगाने  दूर, दिन  छुट्टी  वाला  जैसे   आया  इतवार है।

      या कि यही जीवन है, नन्हें-नन्हें गोपालों का, समय गँवाना यूँ ही, नित्य थक-हार है।।  

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      ~ मौलिक/अप्रकाशित.

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