चित्र से काव्य तक

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'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 174

आदरणीय काव्य-रसिको !

सादर अभिवादन !!

  

’चित्र से काव्य तक छन्दोत्सव का यह एक सौ चौहत्तरवाँ योजन है।

 .   

 

छंद का नाम  -  सरसी छंद  

आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ - 

20 दिसम्बर’ 25 दिन शनिवार से

21दिसम्बर 25 दिन रविवार तक

केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.  

सरसी छंद के मूलभूत नियमों के लिए यहाँ क्लिक करें

जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के  भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.

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आयोजन सम्बन्धी नोट 


फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -

20 दिसम्बर’ 25 दिन शनिवार से 21दिसम्बर 25 दिन रविवार तक रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं। 

अति आवश्यक सूचना :

  1. रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
  2. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
  3. सदस्यगण संशोधन हेतु अनुरोध  करें.
  4. अपने पोस्ट या अपनी टिप्पणी को सदस्य स्वयं ही किसी हालत में डिलिट न करें. 
  5. आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति संवेदनशीलता आपेक्षित है.
  6. इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.
  7. रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. 
  8. अनावश्यक रूप से रोमन फाण्ट का उपयोग  करें. रोमन फ़ॉण्ट में टिप्पणियाँ करना एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.
  9. रचनाओं को लेफ़्ट अलाइंड रखते हुए नॉन-बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें. अन्यथा आगे संकलन के क्रम में संग्रहकर्ता को बहुत ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

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मंच संचालक
सौरभ पाण्डेय
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम 

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    Ashok Kumar Raktale

       

    सरसी छंद

    *

    हाथों वोटर कार्ड लिए हैं, लम्बी लगा कतार।

    खड़े हुए  मतदाता सारे, चुनने  नव  सरकार।

    लेकिन मुख से गायब दिखती, सबके ही मुस्कान।

    ज्यों  करतूतें नेताओं की,  सभी गये हों जान।।

    *

    कड़ी  धूप  में  खड़े हुए सब, देने  अपना वोट।

    संविधान की ख़ातिर हो या, पाकर थोड़े नोट।

    मुश्किल है कह पाना सच भी, बदल गया है काल।

    चलें जीत की आस लिये सब, नेता नित नव चाल।।

    *

    अगर न समझे अगर न सँभले, तो  होगा नुक्सान।

    मतदाता  ही   होते  हैं  सब, लोकतंत्र  की  जान।

    लोकतंत्र  जो  नहीं  रहा तो, होगा  सब कुछ नष्ट।

    पायेंगे   परिवार   सभी  के, नये-नये  नित  कष्ट।।

    #

    मौलिक/ अप्रकाशित.

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      अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

      सरसी छंद    [ संशोधित  रचना ]

      +++++++++

      रोहिंग्या औ बांग्ला देशी, बदल रहे परिवेश।

      शत्रु बोध यदि नहीं हुआ तो, पछताएगा देश॥

      लाखों भूखे नंगे आये,  सह अपराधी तत्व।

      किन्तु पार्टियाँ वोट बढ़ाने, देती इन्हें महत्व॥

       

      घुस पैठ किये फिर बस जाते, भारत में सर्वत्र।

      जोड़ तोड़कर बनवा लेते, सारे परिचय पत्र।

      नगर किनारे बस जाते हैं, आतंकी निर्बाध।

      संत बने रहते हैं दिन में, रात करें अपराध॥

       

      ढूंढ ढूंढकर नकली सारे, भेजें सीमा पार।

      होगा तभी सुरक्षित भारत, औ सबका उद्धार॥

      नाम जुड़े वोटर सूची में, विवरण हो सब ठीक।

      सच्चे भारत वासी बनकर, रहो सदा निर्भीक॥

      ++++++++++++

      मौलिक अप्रकाशित

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