चित्र से काव्य तक

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'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !

सादर अभिवादन !!

  

’चित्र से काव्य तक छन्दोत्सव का यह एक सौ छिहत्तरवाँ योजन है।

 .   

 

छंद का नाम  -  चौपाई छंद  

आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ - 

21 फरवरी’ 26 दिन शनिवार से

22 फरवरी 26 दिन रविवार तक

केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.  

चौपाई छंद के मूलभूत नियमों के लिए यहाँ क्लिक करें

जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के  भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.

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आयोजन सम्बन्धी नोट 


फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -

21 फरवरी’ 26 दिन शनिवार से 22 फरवरी 26 दिन रविवार तक रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं। 

अति आवश्यक सूचना :

  1. रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
  2. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
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  5. आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति संवेदनशीलता आपेक्षित है.
  6. इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.
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मंच संचालक
सौरभ पाण्डेय
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम 

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    Ashok Kumar Raktale

    चौपाई

    *

    बन्द शटर हैं  खुला न ताला।। दृश्य सुबह का दिखे निराला।।  

    रूप  मनोहर   सुन्दर  छोरी।। मोची   ढिग  आ  बैठी  गोरी।।

     

    हरदिन सुबह न  कोई आता।। मोची कोई काम न पाता।।

    किन्तु आज दिन ऐसा आया।। मोची ने भी अवसर पाया।।

     

    सुबह-सुबह है चप्पल टूटी।। गोरी  की  है  किस्मत फूटी।।

    बैठी वह चप्पल सिलवाने।। आयी  मुश्किल  दूर  भगाने।।

     

    रूप चन्द्र ज्यों  पूरनमासी।। किन्तु नहीं यह भारतवासी।।

    किसी संत की लगती चेरी।। बात सत्य यदि  मानों मेरी।।

     

    अधरों अति सुन्दर स्मित फैली।। साथ लिए बैठी इक थैली।।

    एक   पाँव   है   चप्पल    धारी।। दूजे  सहती  ठण्डक  भारी।।

     

    सोच  रही   झटपट  मैं   जाऊँ।। मन्दिर जा ईश्वर को ध्याऊँ।।

    दिन चढ़ आता है यह सिर पर।। भली  करें  अब सारी  ईश्वर।।

    #

    ~ मौलिक/अप्रकाशित.

     

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      लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

      चौपाई

      ******

      करे मरम्मत चप्पल- जूते । चलता जीवन इसके बूते।।
      दोजून कभी खाता काके। और कभी हो जाते फाके।।
      *
      नहीं  भोर  में  अक्सर  कोई। आन  जगाता  किस्मत सोई।।
      बंद दुकानें खुली सड़क पर। जगा गयीं पर आज कड़क कर।।
      *
      भोर सुनहरी जो छितरायी। किस्मत मोची की मुसकायी।।
      कहकर चप्पल करो सिलाई। लक्ष्मी लेकर लक्ष्मी आयी।।
      *
      एक विदेशी बाला ग्राहक। आयी तो दी उसने बैठक।।
      देशी से बढ़  देगी  पाई। इसी  सोच  से रौनक छायी।।
      **
      मुसमुस  हँसती  बाला लेकिन। सोच  रही है मोची के बिन।।
      चप्पल उसकी सिली न जाती। बिन चप्पल के वह रह जाती।।
      *
      किन्तु चित्र का भाव समझकर। गयी लेखनी मेरी लिखकर।
      श्रम से  सजता  जीवन-पथ है। बढ़ता  आगे  घर का रथ है।
      *
      काम न कोई  छोटा  जानो। पूजा - पाठ  कर्म को मानो।।
      सेवा में सच्चा सुख आता । श्रम जीवन में दीप जलाता।।
      *
      ग्राहक में  भगवान  बसा है। सेवा से व्यापार सजा है।।
      मीठे बोल भाव रख सच्चा। संतोषी जीवन ही अच्छा।।
      *
      मौलिक/अप्रकाशित

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      अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

      चौपाई छंद ( संशोधित)

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      स्थान एक तीरथ लगता है। जमघट संतों का रहता है॥

      कितनी सुंदर है ये नारी।  फिसल ना जाए ब्रह्मचारी॥

      सौम्य विदेशी मोहक लगती। परी लोक की मूरत दिखती॥

      सौंदर्य रसिक कवि भी कहता।  दिखे सादगी में सुंदरता॥ 

      करे मरम्मत जूते चप्पल। काम नित्य का यही आजकल॥

      कटे फटे सब को सीता है। सदा अभावों में जीता है॥

       

      काम नकद का नहीं उधारी। कारण यही काम है जारी॥

      बहस नहीं करते नर नारी। धंधे में रखता ना यारी॥

       

      आस नहीं मैं करता जिनसे। इज्जत ज्यादा मिलती उनसे॥

      जब भी यहाँ विदेशी आते। बिन मांगे ज्यादा दे जाते॥

       

      बंद दुकान बना है डेरा। बाकी समय लगाता फेरा॥

      जब दुकान के मालिक आते। डेरा डंडा सब उठ जाते॥

       

      गुमटी शासन से मिल जाए। जीवन में खुशियाँ भर आए॥

      काम चलेगा बारह मासी। ना अभाव न होगी उदासी॥

       

      +++++++++++++++++++++

      मौलिक अप्रकाशित

       

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