चित्र से काव्य तक

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'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178

आदरणीय काव्य-रसिको !

सादर अभिवादन !!

  

’चित्र से काव्य तक छन्दोत्सव का यह एक सौ अठहत्तरवाँ योजन है।

   

 

छंद का नाम  -  दोहा छंद   

आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ - 

18 अप्रैल’ 26 दिन शनिवार से

19 अप्रैल 26 दिन रविवार तक

केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.  

दोहा छंद के मूलभूत नियमों के लिए यहाँ क्लिक करें

जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के  भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.

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आयोजन सम्बन्धी नोट 


फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ :

18 अप्रैल’ 26 दिन शनिवार से

19 अप्रैल 26 दिन रविवार तक रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं। 

अति आवश्यक सूचना :

  1. रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
  2. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
  3. सदस्यगण संशोधन हेतु अनुरोध  करें.
  4. अपने पोस्ट या अपनी टिप्पणी को सदस्य स्वयं ही किसी हालत में डिलिट न करें. 
  5. आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति संवेदनशीलता आपेक्षित है.
  6. इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.
  7. रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. 
  8. अनावश्यक रूप से रोमन फाण्ट का उपयोग  करें. रोमन फ़ॉण्ट में टिप्पणियाँ करना एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.
  9. रचनाओं को लेफ़्ट अलाइंड रखते हुए नॉन-बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें. अन्यथा आगे संकलन के क्रम में संग्रहकर्ता को बहुत ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

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मंच संचालक
सौरभ पाण्डेय
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम 

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    pratibha pande

    दोहा छंद

    _______
    बाँध साइकिल लकड़ियाँ, जाता घर की ओर।
    ख़त्म हो गई गैस है,पेट मचाए शोर।।
    ___
    एजेंसी में गैस की,करता है यह काम।
    इसका भी चूल्हा हुआ,आज भरोसे राम।।
    --
    दीपक तल अंधेर है, यही चित्र का सार।
    आँगन गंगा धार पर,सहे प्यास की मार।।
    --
    पागलपन उस एक का, झेल रहे सब देश।
    कैसे होगा ख़त्म अब,पता नहीं यह क्लेश।।
    --
    बढ़ी गैस औ' तेल पर, जग की चिंता आज।
    फैला कर भ्रम सध रहा, कहीं सियासी काज।।
    ____
    मौलिक व अप्रकाशित 
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    Ashok Kumar Raktale

    दोहे

     

    चलती तब भी साइकिल, चले नहीं जब कार।

    हिन्दुस्तानी   हम   कभी, नहीं   मानते   हार।।

     

    संकट  आया  गैस  का, लाए  उपले  काठ।

    दो दिन चूल्हा फूँककर, हुए कहाँ कम ठाठ।।

     

    हॉकर  है वह गैस का, लगता तभी अजीब।

    सोचो तो वह जा रहा, लकड़ी लिए गरीब।।

     

    कहाँ गरीबों के लिए, साधन  हैं  उपलब्ध।

    वह तो जीते  उस तरह,  जैसा हो प्रारब्ध।।

     

    लड़ने  संकट  से  हमें, रहना   है   तैयार।

    गला काटने गैस फिर, बने नहीं हथियार।।

    #

    ~ मौलिक/अप्रकाशित.

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    Jaihind Raipuri

    किल्लत सारे देश में, नहीं गैस की यार

    नालियाँ बजबजा रही, हर घर औ हर द्वार

    गैस नहीं तो क्या हुआ, लोग नहीं मजबूर

    नफरती आग से भला, ईंधन क्या हुजूर

    पहली मार ग़रीब को, पड़ती है सरकार

    लकड़ी लेकर जा रहा, भारत अपने द्वार

    लकड़ी देखो ढ़ो रहा, साइकिल पर जवान

    भारत गैस नहीं मिला, न मिले का इम्कान

    झुलसे सपने आँख में, लिये पेट में आग

    भारत गैस जो न मिले, लकड़ी लेने भाग

    मौलिक एवं अप्रकाशित 

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