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Mohit mishra (mukt)
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  • India
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Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"आदरणीय विजय सर,तहे दिल से आभार"
Aug 9
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"आदरणीय आरिफ जी आदाब,आपके स्नेह का अत्यंत शुक्रिया"
Aug 9
vijay nikore commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"रचना अच्छी लगी। हार्दिक बधाई, मोहित जी।"
Aug 8
Mohammed Arif commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"प्रिय मोहित जी आदाब,                   बेहतरीन अभिव्यक्ति । हार्दिक बधाई स्वीकार करेंं ।"
Aug 8
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"आदरणीय समर सर, हौसला बढ़ाने का हृदय से शुक्रिया"
Aug 8
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"जनाब मोहित मिश्रा जी आदाब,अच्छी कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 6
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)

प्रेम का स्वरूप क्या है?आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति ?असंभव सा है, इस प्रश्न का-निष्कर्षतः एक समुचित उत्तर। प्रकृति और पुरुष ब्रह्म,युग प्रेम के आदि प्रवर्तक,आकाश सा उन्मुक्त-स्वछंद पवन सा-धरा से भी गंभीर उनका प्यार,अभिव्यक्ति की अभिव्यंजना से दूर-एकात्म में ही लीन दोनों तत्व ,हो पृथक जिनका नहीं है अर्थ कोई,चिर-मौन में हैं साधते वे सत्व ,इसलिए मन को कभी आभास होता,स्वरबद्ध करने की जरूरत है नहीं-अपने हृदय के भाव के उद्गार को,क्यों भला अत्यावश्यक शब्द होंगे-किसी भी सच्चे समर्पित प्यार को ?है मगर…See More
Aug 5
Mohit mishra (mukt) commented on vijay nikore's blog post छ्टपटाह्ट
"बेहद भाव-पूर्ण रचना आदरणीय ,बधाई"
Aug 5
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post मेरे प्यार!
"आदरणीय सोमेस कुमार जी आपकी अमूल्य टिप्पणी के लिए अत्यंत शुक्रिया"
Aug 5
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post मेरे प्यार!
"परम्-आदरणीय समर सर , आपके स्नेह का अत्यंत आभार"
Aug 5
somesh kumar commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post मेरे प्यार!
"जो अबतक पढ़ा था-उस दर्द को आज पहचाना,बड़ा मुश्किल होता है-अंदर-अंदर घुटना, बाहर मुस्कुराना,पर हम इसलिए नहीं पिते आँसू-कि दुनिया के सामने रोने में शर्म आती है,बस कोई प्यार को मज़ाक़ बना देता जब,कशम से बर्दाश्त नहीं होता। Sari kavita ka bhav in…"
Jul 18
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post मेरे प्यार!
"जनाब मोहित जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Jul 18
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

मेरे प्यार!

उस रात रह गया, दिये की थरथराती लौ पर, काँपता सुबकता हमारा प्यार स्याह निशा की स्तब्धता- थी छा गयी तेरे मेरे दरम्यान, निगल लिया था अंधकार ने- हमारे कितने किरण-पुंज, अविरल अश्रु-प्रवाह के बीच, थे ब्याकुल तुम, विक्षिप्त मैं , और साँसों की ऊष्णता से, थी घुटती हवा हमारे आस-पास, वेदना-संतप्त मस्तिष्क में , गुंजित थे तुम्हारे भीगे-भीगे शब्द, जो डबडबाई आँखों समेत- मुँह मोड़ कर तुमने कहा था , “यह मिलन आख़िरी है।”तुम्हें भी पता था, कि हमारा कोई भी मिलन, अंतिम हो ही नहीं सकता, हम चीरकाल तक मिलते रहे, और…See More
Jul 18
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त
"अच्छी रचना हुई आदरणीय मोहित जी.."
Jul 5
Mohammed Arif commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त
"आदरणीय मोहित जी आदाब,                            अच्छी रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Jul 4
Sushil Sarna commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त
"आदरणीय मोहित जी सुंदर मनभावन रचना के लिए हार्दिक बधाई।"
Jul 4

Profile Information

Gender
Male
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allahabad
Native Place
allahabad univercity
Profession
student
About me
SIDHA SADA AUR SULJHA HUA

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At 10:14pm on November 28, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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Mohit mishra (mukt)'s Blog

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)

प्रेम का स्वरूप क्या है?

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति ?

असंभव सा है, इस प्रश्न का-

निष्कर्षतः एक समुचित उत्तर। 

प्रकृति और पुरुष ब्रह्म,

युग प्रेम के आदि प्रवर्तक,

आकाश सा उन्मुक्त-

स्वछंद पवन सा-

धरा से भी गंभीर उनका प्यार,

अभिव्यक्ति की अभिव्यंजना से दूर-

एकात्म में ही लीन दोनों तत्व ,

हो पृथक जिनका नहीं है अर्थ कोई,

चिर-मौन में हैं साधते वे सत्व ,

इसलिए मन को कभी आभास होता,

स्वरबद्ध करने की जरूरत है नहीं-

अपने…

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Posted on August 5, 2018 at 2:12pm — 6 Comments

मेरे प्यार!

उस रात रह गया,

दिये की थरथराती लौ पर,

काँपता सुबकता हमारा प्यार

स्याह निशा की स्तब्धता-

थी छा गयी तेरे मेरे दरम्यान,

निगल लिया था अंधकार ने-

हमारे कितने किरण-पुंज,

अविरल अश्रु-प्रवाह के बीच,

थे ब्याकुल तुम, विक्षिप्त मैं ,

और साँसों की ऊष्णता से,

थी घुटती हवा हमारे आस-पास,

वेदना-संतप्त मस्तिष्क में ,

गुंजित थे तुम्हारे भीगे-भीगे शब्द,

जो डबडबाई आँखों समेत-

मुँह मोड़ कर तुमने कहा था ,

“यह मिलन आख़िरी…

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Posted on July 17, 2018 at 11:00pm — 4 Comments

अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त

कह रही है दिल की धड़कन, कुछ दिनों से दूर हो तुम,

आह सांसों की, तड़प की, अब मिटा दो पास आओ.

यह अकेलापन मुझे अब काटने को दौड़ता है ,

तन्हा पल की इस चुभन को अब मिटा दो पास आओ.

आलिंगनों के द्वार तुमसे ,कह रहे हैं खोल बाहें,

फूल के श्रृंगार जैसे गोद मेरी तुम सजा दो ,

आंख के अरमान तुमसे कह रहे हैं इंगितों से ,

देख लो तिरछी नजर से औ जरा सा तुम लजा दो ,

होठ जो प्यासे हैं अबतक बोलते हैं सुन लो सजनी ,

तुम जरा सा होठ अपने मेरे होठों से…

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Posted on July 2, 2018 at 6:27pm — 4 Comments

हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

पुनः कुठाराघात सह रहीं,

माँ भारती कुछ वर्षों से ।

पीड़ादायी दंश दे रहे ,

नवल विषधर कुछ अरसे से।

फण पर फणधर के नर्तन को,

हलधर के भाई कम हैं।

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

संस्कृतियों की प्राचीन धरा पर,

देख राजनीति का अंधपतन।

सोच दुर्दशा आम जन-जन की ,

ब्याकुल-ब्यथित-द्रवित है मन।

मोहित अर्जुन को समझाने को ,

गीता की वाणी कम है।

हिमगिरि की ऑंखें नम है।

सूर्य भारत भू के…

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Posted on June 18, 2018 at 6:00pm — 10 Comments

 
 
 

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