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Mohit mishra (mukt)
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Mohit mishra (mukt) posted a blog post

ऐसा न करना लौट कर तुम फिर चले आना

कभी गर ठान लो मन में,समर्पित हो ही जाना है।जगत कल्याण के हित में,जो अर्पित हो ही जाना है।तो बंधन मोह का चुन चुन के तुमको तोड़ना होगा..स्वजन की आँख में आँसू भी तुमको छोड़ना होगा ..सहज है स्वार्थ का जीवन, कठिन है त्याग कर जाना ।द्रवित होकर किसी के आँसुओं की धार से अविरल,कहीं ऐसा न करना लौटकर तुम फिर चले आना।तड़प कर तात ने तन को-विसर्जित कर दिया अपने।नयन में मर गए घुटकर,बिचारी माँ के भी सपने ।मगर जो लौट जाते राम तो वे राम न होते..अवध के भूप तो होते मगर भगवान न होते..लौटना मन की दुर्बलता, कर्म है…See More
May 27

Profile Information

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Male
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allahabad
Native Place
allahabad univercity
Profession
student
About me
SIDHA SADA AUR SULJHA HUA

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At 10:14pm on November 28, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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Mohit mishra (mukt)'s Blog

ऐसा न करना लौट कर तुम फिर चले आना

कभी गर ठान लो मन में,

समर्पित हो ही जाना है।

जगत कल्याण के हित में,

जो अर्पित हो ही जाना है।

तो बंधन मोह का चुन चुन के तुमको तोड़ना होगा..

स्वजन की आँख में आँसू भी तुमको छोड़ना होगा ..

सहज है स्वार्थ का जीवन, कठिन है त्याग कर जाना ।

द्रवित होकर किसी के आँसुओं की धार से अविरल,

कहीं ऐसा न करना लौटकर तुम फिर चले आना।

तड़प कर तात ने तन को-

विसर्जित कर दिया अपने।

नयन में मर गए घुटकर,

बिचारी माँ के भी सपने ।

मगर जो लौट…

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Posted on May 26, 2019 at 8:32am — 2 Comments

रंगों का उपहार :- मोहित मुक्त

प्रकाश के तंतुओं से निर्मित,

हमें मिला है प्रकृति द्वारा,

रंगीनियों का उपहार। 

और हम, उसी का धन्यवाद देते हैं,

होली के त्यौहार में।

रंगों का महापर्व, होली !

सिर्फ उत्सव नहीं,

अपितु यह तो है,

दुनिया की प्राचीनतम -

और महानतम सभ्यता का विचार तत्व।

जीवन और प्रकाश से परे,

जब शून्य था ब्रह्मांड,

काले अँधेरे की शक्ल में-

रंग तब भी विद्यमान थे।

और फिर विधाता…

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Posted on March 20, 2019 at 6:01pm — 2 Comments

वेदना का गीत:-मोहित मिश्रा

चिर अखण्डित वेदना को कर समर्पित प्राण अपने-

ध्वंस के अवशेष पर नित नेह का दीपक जलाना,

अब भी है प्रिय कर्म मेरा, याद कर…

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Posted on February 3, 2019 at 7:23am — 5 Comments

मानव पंछी संवाद (अतुकांत )

चानक से,

कर मुझसे,

ठलाता सा पंछी बोला।

श्वर से मानव ने तो,

त्तम ज्ञान-दान था मोला।

पर हो तुम सब जीवों में,

क अकेली जात अनोखी,

सी क्या मजबूरी तुमको-

ट रहे होंठों की शोख़ी?

र सताकर कमज़ोरों को-

अंग तुम्हारा खिल जाता…

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Posted on October 22, 2018 at 8:30am — 1 Comment

 
 
 

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