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Mohit mishra (mukt)
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Mohit mishra (mukt) posted a blog post

मानव पंछी संवाद (अतुकांत )

अचानक से,आकर मुझसे,इठलाता सा पंछी बोला।ईश्वर से मानव ने तो,उत्तम ज्ञान-दान था मोला।ऊपर हो तुम सब जीवों में,एक अकेली जात अनोखी,ऐसी क्या मजबूरी तुमको-ओट रहे होंठों की शोख़ी?और सताकर कमज़ोरों को-अंग तुम्हारा खिल जाता है,अ: तुम्हें क्या मिल जाता है?मैंने कहा:-कहो-खगगर्व से, किघर तुम्हारा-चल रहा है,छोटी सी-जगह में, पर-झगड़े का,टकराव का,ठौर नहीं है उसमें।डाली से दूर,ढलता सूरज,तरावट देता है-थकावट नहीं! क्योंकि-दम्भ नहीं है तुममेंधन-धर्म-सामर्थ्य का।नहीं तो देखो,प्रगतिशील मानव,फ़रेब का पुतला-बना बैठा…See More
yesterday
Mohit mishra (mukt) commented on V.M.''vrishty'''s blog post कविता का जीवन
"प्रिय वृष्टि, ख़ूबसूरत और प्रभावशाली रचना के लिए बधाई"
Oct 11
Mohit mishra (mukt) and V.M.''vrishty'' are now friends
Oct 11
V.M.''vrishty'' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post मेरे प्यार!
"मोहित जी! बहुत ही हृदयस्पर्शी प्रस्तुति। जान पड़ता है कि ये महज़ एक कविता नहीं,, स्वानुभव है आपका। पीड़ा की गहराई साफ झलक रही। "
Oct 10
V.M.''vrishty'' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"मित्र मोहित जी! आत्मकेन्द्रण या अभिव्यक्ति,,,इस माध्यम से प्रेम की गहराइयों को बहुत ही सुंदर पंक्तियों में पिरोया है आपने। बहुत बहुत बधाई!"
Oct 10
Mohit mishra (mukt) commented on V.M.''vrishty'''s blog post शहीदों के नाम....
"बहुत ख़ूब ........बेमिसाल "
Oct 10
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post श्री अटल-मृत्यु संवाद:- कविता
"जनाब मोहित मिश्रा जी आदाब,अच्छी कविता हुई,बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 18
Sheikh Shahzad Usmani commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post श्री अटल-मृत्यु संवाद:- कविता
"श्रद्धांजलि स्वरूप समसामयिक बढ़िया सृजन। इस मंच के काव्य-विधा/छंद संबंधित आलेख व आयोजनों के अध्ययन कर आप इसे बढ़िया छंदबद्ध भी कर सकते हैं। हार्दिक बधाइयां आदरणीय  मोहित मिश्र 'मुक्त' साहिब।"
Aug 18
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

श्री अटल-मृत्यु संवाद:- कविता

कहा मौत ने श्री अटल से, वक़्त आ गया जाने का,स्वर्ग से आदेश मुझे है, आपको वहाँ लिवाने का।पर साधारण नर नहीं ,वह युगपुरूष की काया थी,गर है जीवन माया तो, वह एक उत्तम माया थी,थे कलयुग के भीष्म सरीखे दृढ़, अटल-विश्वासी ,जिनको पाकर धन्य हुए थे, हम सब भारतवासी ।हुआ दूसरी बार युगों में, पुनः अलौकिक तथ्य घटित,किया प्रतीक्षा नर-काया की स्वर्ग-यान वह रत्नजड़ित,बोले अटल, अटल मृत्यु से, एक दिवस तो रुकना होगा,आज स्वर्ग के नियमों को धरती के आगे झुकना होगा।क्योंकि है स्वाधीन दिवस, है राष्ट्र ख़ुशी से मतवाला,इसे…See More
Aug 17
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"आदरणीय विजय सर,तहे दिल से आभार"
Aug 9
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"आदरणीय आरिफ जी आदाब,आपके स्नेह का अत्यंत शुक्रिया"
Aug 9
vijay nikore commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"रचना अच्छी लगी। हार्दिक बधाई, मोहित जी।"
Aug 8
Mohammed Arif commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"प्रिय मोहित जी आदाब,                   बेहतरीन अभिव्यक्ति । हार्दिक बधाई स्वीकार करेंं ।"
Aug 8
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"आदरणीय समर सर, हौसला बढ़ाने का हृदय से शुक्रिया"
Aug 8
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)
"जनाब मोहित मिश्रा जी आदाब,अच्छी कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 6
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)

प्रेम का स्वरूप क्या है?आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति ?असंभव सा है, इस प्रश्न का-निष्कर्षतः एक समुचित उत्तर। प्रकृति और पुरुष ब्रह्म,युग प्रेम के आदि प्रवर्तक,आकाश सा उन्मुक्त-स्वछंद पवन सा-धरा से भी गंभीर उनका प्यार,अभिव्यक्ति की अभिव्यंजना से दूर-एकात्म में ही लीन दोनों तत्व ,हो पृथक जिनका नहीं है अर्थ कोई,चिर-मौन में हैं साधते वे सत्व ,इसलिए मन को कभी आभास होता,स्वरबद्ध करने की जरूरत है नहीं-अपने हृदय के भाव के उद्गार को,क्यों भला अत्यावश्यक शब्द होंगे-किसी भी सच्चे समर्पित प्यार को ?है मगर…See More
Aug 5

Profile Information

Gender
Male
City State
allahabad
Native Place
allahabad univercity
Profession
student
About me
SIDHA SADA AUR SULJHA HUA

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At 10:14pm on November 28, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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ओबीओ पर प्रतिमाह आयोजित होने वाले लाइव महोत्सवछंदोत्सवतरही मुशायरा व  लघुकथा गोष्ठी में आप सहभागिता निभाएंगे तो हमें ख़ुशी होगी. इस सन्देश को पढने के लिए आपका धन्यवाद.

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श्री अटल-मृत्यु संवाद:- कविता

कहा मौत ने श्री अटल से, वक़्त गया जाने का,

स्वर्ग से आदेश मुझे है, आपको वहाँ लिवाने का।

पर साधारण नर नहीं…

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Posted on August 16, 2018 at 10:00pm — 2 Comments

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)

प्रेम का स्वरूप क्या है?

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति ?

असंभव सा है, इस प्रश्न का-

निष्कर्षतः एक समुचित उत्तर। 

प्रकृति और पुरुष ब्रह्म,

युग प्रेम के आदि प्रवर्तक,

आकाश सा उन्मुक्त-

स्वछंद पवन सा-

धरा से भी गंभीर उनका प्यार,

अभिव्यक्ति की अभिव्यंजना से दूर-

एकात्म में ही लीन दोनों तत्व ,

हो पृथक जिनका नहीं है अर्थ कोई,

चिर-मौन में हैं साधते वे सत्व ,

इसलिए मन को कभी आभास होता,

स्वरबद्ध करने की जरूरत है नहीं-

अपने…

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Posted on August 5, 2018 at 2:12pm — 7 Comments

मेरे प्यार!

उस रात रह गया,

दिये की थरथराती लौ पर,

काँपता सुबकता हमारा प्यार

स्याह निशा की स्तब्धता-

थी छा गयी तेरे मेरे दरम्यान,

निगल लिया था अंधकार ने-

हमारे कितने किरण-पुंज,

अविरल अश्रु-प्रवाह के बीच,

थे ब्याकुल तुम, विक्षिप्त मैं ,

और साँसों की ऊष्णता से,

थी घुटती हवा हमारे आस-पास,

वेदना-संतप्त मस्तिष्क में ,

गुंजित थे तुम्हारे भीगे-भीगे शब्द,

जो डबडबाई आँखों समेत-

मुँह मोड़ कर तुमने कहा था ,

“यह मिलन आख़िरी…

Continue

Posted on July 17, 2018 at 11:00pm — 5 Comments

अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त

कह रही है दिल की धड़कन, कुछ दिनों से दूर हो तुम,

आह सांसों की, तड़प की, अब मिटा दो पास आओ.

यह अकेलापन मुझे अब काटने को दौड़ता है ,

तन्हा पल की इस चुभन को अब मिटा दो पास आओ.

आलिंगनों के द्वार तुमसे ,कह रहे हैं खोल बाहें,

फूल के श्रृंगार जैसे गोद मेरी तुम सजा दो ,

आंख के अरमान तुमसे कह रहे हैं इंगितों से ,

देख लो तिरछी नजर से औ जरा सा तुम लजा दो ,

होठ जो प्यासे हैं अबतक बोलते हैं सुन लो सजनी ,

तुम जरा सा होठ अपने मेरे होठों से…

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Posted on July 2, 2018 at 6:27pm — 4 Comments

 
 
 

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