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Mohit mishra (mukt)
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केशव commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post ऐसा न करना लौट कर तुम फिर चले आना
"वाह असाधारण रचना  बधाई स्वीकार हो मोहित जी "
May 27
Pradeep Devisharan Bhatt commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post ऐसा न करना लौट कर तुम फिर चले आना
"मोहित जी,उत्तम रचना हुई"
May 27
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

ऐसा न करना लौट कर तुम फिर चले आना

कभी गर ठान लो मन में,समर्पित हो ही जाना है।जगत कल्याण के हित में,जो अर्पित हो ही जाना है।तो बंधन मोह का चुन चुन के तुमको तोड़ना होगा..स्वजन की आँख में आँसू भी तुमको छोड़ना होगा ..सहज है स्वार्थ का जीवन, कठिन है त्याग कर जाना ।द्रवित होकर किसी के आँसुओं की धार से अविरल,कहीं ऐसा न करना लौटकर तुम फिर चले आना।तड़प कर तात ने तन को-विसर्जित कर दिया अपने।नयन में मर गए घुटकर,बिचारी माँ के भी सपने ।मगर जो लौट जाते राम तो वे राम न होते..अवध के भूप तो होते मगर भगवान न होते..लौटना मन की दुर्बलता, कर्म है…See More
May 27
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post रंगों का उपहार :- मोहित मुक्त
"जनाब मोहित जी आदाब,होली के पर्व पर अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें । आपको रंगोत्सव की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ।"
Mar 21
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post रंगों का उपहार :- मोहित मुक्त
"आ. भाई मोहित जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई । तो आइए,धर्म की दीवार तोड़,सौहार्द के इस पर्व में,हरे और लाल को मिलाकर,गले मिल लेते हैं। भारत ऐसी मिसालों का-सदा निर्माता रहा है।"
Mar 21
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

रंगों का उपहार :- मोहित मुक्त

प्रकाश के तंतुओं से निर्मित,हमें मिला है प्रकृति द्वारा,रंगीनियों का उपहार। और हम, उसी का धन्यवाद देते हैं,होली के त्यौहार में।रंगों का महापर्व, होली !सिर्फ उत्सव नहीं,अपितु यह तो है,दुनिया की प्राचीनतम -और महानतम सभ्यता का विचार तत्व।जीवन और प्रकाश से परे,जब शून्य था ब्रह्मांड,काले अँधेरे की शक्ल में-रंग तब भी विद्यमान थे।और फिर विधाता ने-प्रथम बार होली खेली। बिखेर दिए आसमान में-रंग-बिरंगे नक्षत्र,तथा सूरज को दे दिया-धरती पर रंग बाँटने का ठेका।नीले आसमान की छाया सा,उमड़ा नीला अथाह सागर,जीवन ने…See More
Mar 20
JAWAHAR LAL SINGH commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post वेदना का गीत:-मोहित मिश्रा
"बहुत ही सुन्दर गीत बना है, आदरणीय मोहित मिश्र जी. मेरी पसंद की पंक्तियाँ  उम्र भर आधार देकर है विरह का ऋण चुकाना, अब भी है प्रिय कर्म मेरा, याद कर आंसू बहाना।"
Feb 6
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post वेदना का गीत:-मोहित मिश्रा
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत बहुत शुक्रिया "
Feb 5
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post वेदना का गीत:-मोहित मिश्रा
"आदरणीय समर sir तारीफ़ का हृदय से आभार "
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post वेदना का गीत:-मोहित मिश्रा
"आ. भाई मोहित जी, सुंदर गीत हुआ है हार्दिक बधाई ।"
Feb 5
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post वेदना का गीत:-मोहित मिश्रा
"जनाब मोहित जी आदाब,अच्छा गीत लिखा आपने,बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 4
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

वेदना का गीत:-मोहित मिश्रा

चिर अखण्डित वेदना को कर समर्पित प्राण अपने-ध्वंस के अवशेष पर नित नेह का दीपक जलाना,अब भी है प्रिय कर्म मेरा, याद कर आंसू बहाना।मौन अधरों पर तरंगितहै व्यथा का पूर्ण सागर,शून्य पथ पर हेरती हैदृष्टि तुमको छल-छलाकर,है असम्भव आगमन इस तज्य मंदिर से हृदय में-पर प्रणय की पूजिता की याद में ख़ुद को भुलाना,अब भी है प्रिय कर्म मेरा, याद कर आंसू बहाना।श्वास में क्रंदन छुपाएचढ़ रहे  संताप-रथ पर,मोम के दुकूल पहनेबढ़ रहे अंगार-पथ पर,ज्ञात है दुष्चक्र नियति का नहीं है मेरे बस में-मेरे बस में बस सिसकना और तड़पकर…See More
Feb 3
Sheikh Shahzad Usmani commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post मानव पंछी संवाद (अतुकांत )
"वाह। ग़ज़ब। बेहतरीन व उम्दा सार्थक उद्देश्यपूर्ण सृजन के लिए हार्दिक बधाइयां आदरणीय मोहित मिश्रा 'मुक्त' साहिब।"
Oct 22, 2018
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

मानव पंछी संवाद (अतुकांत )

अचानक से,आकर मुझसे,इठलाता सा पंछी बोला।ईश्वर से मानव ने तो,उत्तम ज्ञान-दान था मोला।ऊपर हो तुम सब जीवों में,एक अकेली जात अनोखी,ऐसी क्या मजबूरी तुमको-ओट रहे होंठों की शोख़ी?और सताकर कमज़ोरों को-अंग तुम्हारा खिल जाता है,अ: तुम्हें क्या मिल जाता है?मैंने कहा:-कहो-खगगर्व से, किघर तुम्हारा-चल रहा है,छोटी सी-जगह में, पर-झगड़े का,टकराव का,ठौर नहीं है उसमें।डाली से दूर,ढलता सूरज,तरावट देता है-थकावट नहीं! क्योंकि-दम्भ नहीं है तुममेंधन-धर्म-सामर्थ्य का।नहीं तो देखो,प्रगतिशील मानव,फ़रेब का पुतला-बना बैठा…See More
Oct 22, 2018
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

मानव पंछी संवाद (अतुकांत )

अचानक से,आकर मुझसे,इठलाता सा पंछी बोला।ईश्वर से मानव ने तो,उत्तम ज्ञान-दान था मोला।ऊपर हो तुम सब जीवों में,एक अकेली जात अनोखी,ऐसी क्या मजबूरी तुमको-ओट रहे होंठों की शोख़ी?और सताकर कमज़ोरों को-अंग तुम्हारा खिल जाता है,अ: तुम्हें क्या मिल जाता है?मैंने कहा:-कहो-खगगर्व से, किघर तुम्हारा-चल रहा है,छोटी सी-जगह में, पर-झगड़े का,टकराव का,ठौर नहीं है उसमें।डाली से दूर,ढलता सूरज,तरावट देता है-थकावट नहीं! क्योंकि-दम्भ नहीं है तुममेंधन-धर्म-सामर्थ्य का।नहीं तो देखो,प्रगतिशील मानव,फ़रेब का पुतला-बना बैठा…See More
Oct 20, 2018
Mohit mishra (mukt) commented on V.M.''vrishty'''s blog post कविता का जीवन
"प्रिय वृष्टि, ख़ूबसूरत और प्रभावशाली रचना के लिए बधाई"
Oct 11, 2018

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SIDHA SADA AUR SULJHA HUA

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At 10:14pm on November 28, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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Mohit mishra (mukt)'s Blog

ऐसा न करना लौट कर तुम फिर चले आना

कभी गर ठान लो मन में,

समर्पित हो ही जाना है।

जगत कल्याण के हित में,

जो अर्पित हो ही जाना है।

तो बंधन मोह का चुन चुन के तुमको तोड़ना होगा..

स्वजन की आँख में आँसू भी तुमको छोड़ना होगा ..

सहज है स्वार्थ का जीवन, कठिन है त्याग कर जाना ।

द्रवित होकर किसी के आँसुओं की धार से अविरल,

कहीं ऐसा न करना लौटकर तुम फिर चले आना।

तड़प कर तात ने तन को-

विसर्जित कर दिया अपने।

नयन में मर गए घुटकर,

बिचारी माँ के भी सपने ।

मगर जो लौट…

Continue

Posted on May 26, 2019 at 8:32am — 2 Comments

रंगों का उपहार :- मोहित मुक्त

प्रकाश के तंतुओं से निर्मित,

हमें मिला है प्रकृति द्वारा,

रंगीनियों का उपहार। 

और हम, उसी का धन्यवाद देते हैं,

होली के त्यौहार में।

रंगों का महापर्व, होली !

सिर्फ उत्सव नहीं,

अपितु यह तो है,

दुनिया की प्राचीनतम -

और महानतम सभ्यता का विचार तत्व।

जीवन और प्रकाश से परे,

जब शून्य था ब्रह्मांड,

काले अँधेरे की शक्ल में-

रंग तब भी विद्यमान थे।

और फिर विधाता…

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Posted on March 20, 2019 at 6:01pm — 2 Comments

वेदना का गीत:-मोहित मिश्रा

चिर अखण्डित वेदना को कर समर्पित प्राण अपने-

ध्वंस के अवशेष पर नित नेह का दीपक जलाना,

अब भी है प्रिय कर्म मेरा, याद कर…

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Posted on February 3, 2019 at 7:23am — 5 Comments

मानव पंछी संवाद (अतुकांत )

चानक से,

कर मुझसे,

ठलाता सा पंछी बोला।

श्वर से मानव ने तो,

त्तम ज्ञान-दान था मोला।

पर हो तुम सब जीवों में,

क अकेली जात अनोखी,

सी क्या मजबूरी तुमको-

ट रहे होंठों की शोख़ी?

र सताकर कमज़ोरों को-

अंग तुम्हारा खिल जाता…

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Posted on October 22, 2018 at 8:30am — 1 Comment

 
 
 

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