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Mohit mishra (mukt)
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Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post सीता वनवास (प्रथम भाग):-1 (छंदमुक्त )
"बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय ब्रजेश जी"
Apr 15
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post सीता वनवास (प्रथम भाग):-1 (छंदमुक्त )
"उत्तम अद्भुत प्रस्तुति आदरणीय मोहित जी..सादर"
Apr 8
Mohit mishra (mukt) commented on Sushil Sarna's blog post रेगिस्तान में    ......
"आदरणीय सुशील जी, आपके अंदाज का क्या कहना ,सुंदर रचना, बधाई"
Apr 6
Mohit mishra (mukt) commented on Samar kabeer's blog post एक ताज़ा ग़ज़ल
"याद जब घर की सताए तो,रिहाई के लिये आसमाँ सर पे उठा लेते हैं ज़िनदाँ वाले . अपने मज़हब की किताबों से गुरेज़ां हैं सब गीता वाले हों "समर"या कि हों क़ुरआँ वाले आदरणीय समर सर, बेहतरीन रचना के लिए बधाई"
Apr 6
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post सीता वनवास (प्रथम भाग):-1 (छंदमुक्त )
"आदरणीय समर सर रचनावलोकन और उत्साहवर्धन का हृदय तल से आभार"
Apr 6
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post सीता वनवास (प्रथम भाग):-1 (छंदमुक्त )
"जनाब मोहित मुक्त जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
Apr 6
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

सीता वनवास (प्रथम भाग):-1 (छंदमुक्त )

लौटे राघव, जनपद भ्रमण कर, हतोत्साहित उदास ,स्कंध निचे, द्रवित हृदय, उद्वेलित मन, कम्पित श्वास,चिंतित मन, बार-बार करते हृदय कठोर,पर कानों में पुनः-पुनः गुञ्जित होता वहीं शोर,हाय निष्कपट प्रजा यह, पर बुद्धिहीन ,अंतः विषाद से हो उठा श्याम-मुख-मलिन,यह कैसा विकट शत्रु बन खड़ा राजधर्म ,प्रजा बेध रही ब्यंग-विशिख से राम मर्म ,और राम ! प्रत्युत्तर में विकल, ठगे से मौन ,सोच रहे मुझसे हतभागा है धरा पर कौन?हाय माता का ही नहीं रहा मुझपर विश्वास ,राजकुल में जन्म लिया और सहा वनवास ,पर यहीं निवर्तित नहीं हुई,…See More
Apr 6
Mohit mishra (mukt) commented on Mohammed Arif's blog post कविता- वो आँखें
"आदरणीय आरिफ जी आदाब ,अत्यंत गहराई से लेखनी चलाई अपने , सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें"
Mar 4
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post होली और यादें :-मोहित मुक्त
"आदरणीय विजय सर , प्रशंसा पात्र बनाने का अत्यंत धन्यवाद"
Mar 4
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post होली और यादें :-मोहित मुक्त
"आदरणीय नरेन्द्रशिस जी , रचना पर उपस्थिति का अत्यंत शुक्रिया"
Mar 4
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post होली और यादें :-मोहित मुक्त
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, रचनावलोकन का तहे दिल से शुक्रिया"
Mar 4
Mohit mishra (mukt) commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post होली के दोह - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"बेहतरीन दोहों के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय"
Mar 4
vijay nikore commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post होली और यादें :-मोहित मुक्त
"भाव सुंदर हैं, रचना अच्छी लगी ।इस प्रस्तुति पर आपको बधाई "
Mar 3
narendrasinh chauhan commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post होली और यादें :-मोहित मुक्त
"सुन्दर रचना"
Mar 3
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post होली और यादें :-मोहित मुक्त
"आ. भाई मोहित जी, इस मन मोहित करती रचना के लिए हार्दिक बधाई ।"
Mar 3
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post होली और यादें :-मोहित मुक्त
"आदरणीय समर सर , होली की हार्दिक बधाई । रचना को सम्मान देने का शुक्रिया  "
Mar 2

Profile Information

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Male
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allahabad
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allahabad univercity
Profession
student
About me
SIDHA SADA AUR SULJHA HUA

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At 10:14pm on November 28, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

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 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

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सीता वनवास (प्रथम भाग):-1 (छंदमुक्त )

लौटे राघव, जनपद भ्रमण कर, हतोत्साहित उदास ,

स्कंध निचे, द्रवित हृदय, उद्वेलित मन, कम्पित श्वास,

चिंतित मन, बार-बार करते हृदय कठोर,

पर कानों में पुनः-पुनः गुञ्जित होता वहीं शोर,

हाय निष्कपट प्रजा यह, पर बुद्धिहीन ,

अंतः विषाद से हो उठा श्याम-मुख-मलिन,

यह कैसा विकट शत्रु बन खड़ा राजधर्म ,

प्रजा बेध रही ब्यंग-विशिख से राम मर्म ,

और राम ! प्रत्युत्तर में विकल, ठगे से मौन ,

सोच रहे मुझसे हतभागा है धरा पर कौन?

हाय माता का ही नहीं…

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Posted on April 5, 2018 at 7:00am — 4 Comments

होली और यादें :-मोहित मुक्त

फिर से होली आ गयी है ,

यादें मन में छा गयीं हैं ,

यादों का है क्या ठिकाना ,

इनका तो है आना जाना।

पर वो होली और थी जब ,

घर की घर में साथ थे सब ,

माँ के हाथों की मिठाई ,

मानो अमृत में डुबाई।

पिताजी का प्यार देना,

स्नेह से यूँ निहार देना ,

उनकी आँखों का मैं तारा ,

उनके प्राणों का सहारा।

आज घर से दूर हूँ मैं ,

दूर क्या मजबूर हूँ मैं ,

रंग होली के मुझे अब,

चुभते हैं काँटों से सब।

फिर से…

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Posted on March 1, 2018 at 8:34am — 10 Comments

ये मत सोचो रुक जाऊंगा:-मोहित मुक्त

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

बेताब लहर के धक्कों से -

नौका चूर हो जाएगी,

नियति की वक्र नजर मुझपर -

माना की क्रूर हो जाएगी ,

तूफां हठ ठान भले ही ले-

कर ले चाहे लाख जतन ,

जीवन यज्ञ आहुति में -

हो जाये मेरा सर्वस्व हवन,

पर जबतक धड़कन जिन्दा है-

ये मत सोचो झुक जाऊंगा।

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

पग-पग पर शूल मिलें चाहे-

राहों में तप्त अंगारे हों।

पावों में छाले पड़ जाएं या-

रोम-रोम प्यास के मारे…

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Posted on February 6, 2018 at 3:31pm — 7 Comments

आवाहन(कविता ):-मोहित मुक्त

अंगार भर लो लोचनों में, श्वांस में फुंफकार हो ,

नस-नस अनल से पूर्ण हो , पुरुष्त्व का संचार हो।

विश्वास जन का खोकर भी सत्तासीन हो जाते हैं।

जो हर चुनावी परिवेश में नए प्रपंच रचाते हैं।

वैसे दागी लोग न जाने क्यों हमारे नायक हैं ?

क्या वे लोग ही हमपर शासन करने लायक हैं ?

जैसे मृगेंद्र के पुत्रों पर भेड़ियों का बर्चस्व हो।

जैसे गर्दभ-दौड़ में कोई हारता सा अश्व हो।

वैसे ही आज अयोग्य हाथों में हमारा देश है।

फिर भी सुप्त…

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Posted on January 6, 2018 at 9:30pm — 12 Comments

 
 
 

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