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Rupam kumar -'मीत'
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Welcome, रुपम कुमार -'मीत'!

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें।  जनाब रवि भसीन जी की बातों का संज्ञान लें।"
1 hour ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"आद0 रूपम कुमार जी सादर अभिवादन ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है। बधाई स्वीकार कीजिये। आद0 रवि भसीन साहिब की बातों का संज्ञान लीजिएगा।"
4 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"हार्दिक बधाई आदरणीय रूपम कुमार 'मीत' जी।बेहतरीन गज़ल। लगता है उसकी आंख में थोड़ा मलाल हैजब जा रहा था दूर मुझे देखता गया[5]"
22 hours ago
सालिक गणवीर commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"प्रिय रूपम आदाब अच्छी ग़ज़ल हुई है, और बेहतरी के लिए गुणीजनों की इस्लाह पर अमल करो.सस्नेह."
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"आ. भाई रुपम कुमार जी, गजल का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई स्वीकारे । आ. भाई रवि जी के मसविरे से गजल और बेहतर होगी । सादर..."
yesterday
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"आदरणीय रवि साहब, सादर प्रणाम आपकी इस्लाह बहुत कमल की होती है, का का दोष समझ आया मुझे, पहला मिस्र वर्तमान काल में लिख कर दूसरा भूत काल में कर दिया यह सिर्फ एक जानने वाला ही कर सकता है,। इस शेर पर भी जरा रोशनी डालिये, सर् तुम किस जतन से रो रहे हो अब…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"आदरणीय रूपम कुमार 'मीत' भाई, ग़ज़ल का प्रयास बहुत अच्छा हुआ है। आपको कुछ सुझाव देना चाहता हूँ, अगर उचित लगें तो रखियेगा, और अगर पसंद न आएँ तो दरगुज़र कर दीजियेगा। पहले शे'र में "सदा" के स्थान पर "सदा के लिए" ज़ियादा…"
yesterday
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)

बह्र-221/2121/1221/212वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गयाआँखों से प्यार का मेरे मौसम चला गया[1]वो किस जतन से रो रहा है अब अज़ाब मेंइक रोज़ रात को मेरे ख़्वाबों में आ गया[2]उसके नज़र के पास मैं, रहता था और वोहद्द-ए नज़र से मुझको हटाता चला गया[3]उसको ख़बर थी मौत मेरी तीरगी से हैजलते हुए चराग़ तभी तो बुझा गया[4]लगता है उसकी आंख में थोड़ा मलाल हैजब जा रहा था दूर मुझे देखता गया[5]रूपम कुमार 'मीत'"मौलिक व अप्रकाशित"See More
Friday
Rupam kumar -'मीत' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post किसे आवाज़ दूँ (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"बंद है हर दर यहाँ तो हर गली वीरान हैज़िन्दगी मुझको कहाँ लाई किसे आवाज़ दूँ आदरणीय रवि साहब, आपको बधाई देता हूँ पूरी ग़ज़ल के लिए, क्या खूब कहा है आपने और इस शेर पर ख़ास तौर पर दाद देता हूँ।।"
Thursday
Chetan Prakash left a comment for Rupam kumar -'मीत'
"मित्र, आपका स्वागत है !"
Jul 3
Chetan Prakash and Rupam kumar -'मीत' are now friends
Jul 3
Rupam kumar -'मीत' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post वफ़ा के देवता को बेवफ़ा हम कैसे होने दें(११३ )
"साहब, गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, क़बूल कीजिए, हर शेर के लिए दाद और मुबारक बाद देता हूँ, वाह!! "
Jul 3
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"सर सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन क़ुबूल  किजीए। हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाए चोट सेहमने तो ओखली में रखा है जी सर अभी यह शेर हुआ आपका वाह!! क्या ही कहने वाह!!"
Jul 3
Rupam kumar -'मीत' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (क्या नसीब है)
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब, क्या ही  कहने वाह! बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है।"
Jul 3
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

रोज़ देता हूँ बद-दुआ तुमको

2122/1212/22 (112)रोज़ देता हूँ बद-दुआ तुमकोग़म-ज़दा ही रखे ख़ुदा तुमको[1]जान-ए-जाँ मौसम-ए-ख़िज़ाँ में भीहमने रक्खा हरा भरा तुमको[2]बे-तरह चीख़ कर लिखा हमनेअपनी ग़ज़लों में बे-वफ़ा तुमको[3]सुर्ख़ आँखें गवाही देती हैकल की शब भी थी रत-जगा तुमको[4]हिज्र ने हमको बे-क़रार कियामिल गया फ़ासलों से क्या तुमको[5]बीच दरिया में हाथ छोड़ दियाडूब जाऊँगा इल्म था तुमको[6]अपनी मंज़िल की जब ख़बर है मुझेक्यूँ भरोसा नहीं मेरा तुमको[7]बाद मुद्दत सुकून पाया थाफिर से क्यूँ याद कर लिया तुमको[8]हमको मसरूफ़ ही मिले हो तुमकॉल जब भी सनम…See More
Jun 29
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post रोज़ देता हूँ बद-दुआ तुमको
"आदरणीय Rupam kumar -'मीत' साहिब, उस्ताद-ए-मुहतरम के सुझाए हुए मिस्रे को ध्यान से पढ़िए, उसके कई पहलू निकल रहे हैं, और ये शे'र में बहुत बड़ी ख़ूबी होती है। /मुझे तो सभी बोलते हैं कि लड़का भला भी नहीं तो बुरा भी नहीं…"
Jun 28

Profile Information

Gender
Male
City State
Motihari
Native Place
Bihar
Profession
Student
About me
मुझे तो सभी बोलते है कि लड़का भला भी नहीं तो बुरा भी नहीं है -'मीत'

Rupam kumar -'मीत''s Blog

वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)

बह्र-221/2121/1221/212

वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया

आँखों से प्यार का मेरे मौसम चला गया[1]

वो किस जतन से रो रहा है अब अज़ाब में

इक रोज़ रात को मेरे ख़्वाबों में आ गया[2]

उसके नज़र के पास मैं, रहता था और वो

हद्द-ए नज़र से मुझको हटाता चला गया[3]

उसको ख़बर थी मौत मेरी तीरगी से है

जलते हुए चराग़ तभी तो बुझा गया[4]

लगता है उसकी आंख में थोड़ा मलाल है

जब जा रहा था दूर मुझे देखता गया[5]

रूपम…

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Posted on July 10, 2020 at 10:00am — 7 Comments

रोज़ देता हूँ बद-दुआ तुमको

2122/1212/22 (112)

रोज़ देता हूँ बद-दुआ तुमको

ग़म-ज़दा ही रखे ख़ुदा तुमको[1]

जान-ए-जाँ मौसम-ए-ख़िज़ाँ में भी

हमने रक्खा हरा भरा तुमको[2]

बे-तरह चीख़ कर लिखा हमने

अपनी ग़ज़लों में बे-वफ़ा तुमको[3]

सुर्ख़ आँखें गवाही देती है

कल की शब भी थी रत-जगा तुमको[4]

हिज्र ने हमको बे-क़रार किया

मिल गया फ़ासलों से क्या तुमको[5]

बीच दरिया में हाथ छोड़ दिया

डूब जाऊँगा इल्म था तुमको[6]

अपनी मंज़िल…

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Posted on June 27, 2020 at 11:00am — 7 Comments

ग़म-ज़दा होंट मुस्कुराते हैं

2122 1212 22

.

ग़म-ज़दा होंट मुस्कुराते हैं

तेरा जब नाम गुनगुनाते हैं[1]

नींद वो दर है जिसके खुलने से

ख़्वाब आँखों में जगमगाते हैैं[2]

अब उदासी में है परिंदे क्यूँ?

लोग पेड़ों से घर बनाते हैं[3]

तेरे गालों पे बिखरी वो ख़ुशबू

अपने होंटों से हम चुराते हैं

अब तो होता है अपना यूँ मिलना

अब्र सावन में जैसे आते हैंं[5]

तेरी सूरत पे लिक्खा…

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Posted on June 7, 2020 at 10:30am — 21 Comments

ये ग़म ताज़ा नहीं करना है मुझको

१२२२/१२२२/१२२ 

ये ग़म ताज़ा नहीं करना है मुझको

वफ़ा का नाम अब डसता है मुझको[१]



मुझे वो बा-वफ़ा लगता नहीं है

मगर वो बे-वफ़ा कहता है मुझको[२]



मेरे पीछे जो तूने गुल खिलाए

तेरे चेहरे पे सब दिखता है मुझको[३]



नहीं है ग़मज़दा वो फिर भी उसने

भरम में आज तक रक्खा है मुझको[४]

मोहब्बत को उड़ाकर ख़ाक़ में वो,

सितमगर, बे-झिझक कहता है मुझको[५]

कलेजा चाक करके ख़ूँ किया है,

भला किश्तों में क्यूँ…

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Posted on June 1, 2020 at 5:00pm — 4 Comments

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At 5:49pm on July 3, 2020, Chetan Prakash said…

मित्र, आपका स्वागत है !

 
 
 

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