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amod shrivastav (bindouri)
  • Male
  • फतेहपुर,उत्तर-प्रदेश
  • India
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"हार्दिक बधाई "
Apr 11
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"आद0 आमोद जी ग़ज़ल का बेहतरीन प्रयास। आप जो भी परिवर्तन करें, ब्लॉग पर जाकर रचना में कर लिया कीजिये। बधाई देता हूँ आपको। लगे रहिये। "
Apr 11
amod shrivastav (bindouri) commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"कुछ शेर एडिट के बाद एक तरफ़ा हो नहीं सकता कोई भी फैसला।। दर्द दोनों ओर देगा ये सफर ये रास्ता।। बीज अब वो ,फासले के आज कल बोने लगा ।फसल अब नफरत की वो भी चाहता है काटना।। अब रकाबत का असर आया है रिस्ते में मेरे।दूर तक अब दिख रहा है फासला ही फासला। लाख…"
Apr 9
amod shrivastav (bindouri) commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"शुक्रिया , आ समर दादा , आ शेख साहब, आ नीलेश भाई साहब, मोहम्मद आरिफ साहब .... आ समर दादा आप सही है , मैं नौकरी के कारण obo में गजल की जानकारी नहीं पड़ता , मेरे पास समय नहीं रहता बिलकुल भी , लिखने का कुछ ऐसा है कि जो समझ आया लिख लेता हूँ यह नशे की तरह…"
Apr 9
amod shrivastav (bindouri) commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"एक तरफ़ा हो नहीं सकता कोई भी फैसला।। दर्द दोनों ओर देगा ये सफर ये रास्ता।। बीज रिश्ता ,फासले के आज कल बोने लगा ।फसल अब नफरत की पैदा खेत में वो कर रहा।। अब रकाबत का असर आया है रिस्ते में मेरे।दरमियाँ अब दिख रहा है फासला ही फासला। लाख समझाया मगर उनको…"
Apr 9
Samar kabeer commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"दूसरे शैर के ऊला में 'रिस्ते' को "रिश्ते" कर लें । आख़री शैर में 'समाजिक' सही है या ग़लत मुझे नहीं मालूम,हिन्दी है न? वैसे ग़ज़ल में अच्छा सुधार किया है आपने,बधाई स्वीकार करें ।"
Apr 9
Samar kabeer commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"जनाब आमोद जी आदाब,ग़ज़ल अभी और समय चाहती है,आप ओबीओ पर रहते हुए उसका कोई लाभ नहीं ले रहे हैं । इस ग़ज़ल पर जनाब निलेश जी की बातों का संज्ञान लें,प्रस्तुति हेतु बधाई ।"
Apr 8
Sheikh Shahzad Usmani commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"बहुत बढ़िया पेशकश। हार्दिक बधाई आदरणीय आमोद श्रीवास्तव जी। पुरोधाओं के सुझावों पर अमल कीजिएगा।"
Apr 8
Nilesh Shevgaonkar commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"आ. आमोद जी,ग़ज़ल के लिए बधाई.ग़ज़ल अभी अपरिपक्व है, थोडा और चिन्तन करते तो और निखरती ...अब रकीबत का असर आया है रिस्ते में मेरे... सही शब्द है रक़ाबत  दरमियाँ अब दिख रहा है दूरियां और फासला।.. इस मिसरे में व्याकरण दोष है ... दूरियाँ बहुवचन,…"
Apr 8
Mohammed Arif commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल
"आदरणीय आमोद जी आदाब,                       ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है । ग़ज़ल अभी थोड़ा समय चाहती है ।बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजनों का इंतज़ार करें ।"
Apr 8
amod shrivastav (bindouri) posted a blog post

क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल

बह्र:- 2122-2122-2122-212एक तरफ़ा हो नहीं सकता कोई भी फैसला।। दर्द दोनों ओर देगा ये सफर ये रास्ता।।अब रकीबत का असर आया है रिस्ते में मेरे।दरमियाँ अब दिख रहा है दूरियां और फासला।बीज रिश्ता ,फासले के आज कल बोने लगा ।अब फसल नफरत की पैदा खेत में वो कर रहा।।लाख समझाया मगर उनको समझ आया नहीं।दम मुहब्बत तोड़ देगी, गर नहीं होंगे फ़ना।।बस जरा सा मुस्कुराकर कर दिया हल मुश्किलें।फर्क अब पड़ता नहीं ,मैं बावफ़ा वो बेवफा।।मुझको मुझसे ज्यादा जाने, ज्यादा समझे कौन है।मां समझ जाती है मेरी ,आह क्या मेरा दर्द क्या…See More
Apr 8
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post अलग ये बात है लहजा जरा नहीं मिलता ..गजल
"बहुत खूब, हार्दिक बधाई ।"
Apr 4
Samar kabeer commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post अलग ये बात है लहजा जरा नहीं मिलता ..गजल
"जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । आप चूँकि सुझाये मिसरे नहीं अपनाते,इस लिए कुछ इशारे दे रहा हूँ । मतले के ऊला मिसरे की तरतीब यूँ करें:- 'बड़ा है शह्र ये अपना पता नहीं मिलता' दूसरे शैर में भाव स्पष्ट नहीं…"
Apr 2
TEJ VEER SINGH commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post अलग ये बात है लहजा जरा नहीं मिलता ..गजल
"हार्दिक बधाई आदरणीय अमोद जी। बेहतरीन गज़ल। मैं पढ़ लिया हूँ कुरां,गीता बाइबिल लेकिन ।किसी भी ग्रन्थ में , नफरत लिखा नहीं मिलता।।"
Apr 2
बसंत कुमार शर्मा commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post अलग ये बात है लहजा जरा नहीं मिलता ..गजल
"बहुत सुंदर गजल खी आपने , बहुत बहुत बधाई आपको "
Mar 31
Mohammed Arif commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post अलग ये बात है लहजा जरा नहीं मिलता ..गजल
"आदरणीय आमोद जी आदाब,                      बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल । हर शे'र उम्दा । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।"
Mar 31

Profile Information

Gender
Male
City State
fatehpur
Native Place
Bindour
Profession
writing ,& job
About me
मै--- बस-- साधारण इंसान हूँ -

मेरा परिचय

मै माध्यम वर्ग के कायस्थ परिवार से हूँ । निवास उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिला में बिन्दकी तहसील के अंतर्गत बिन्दौर ग्राम में है।किसी विधा की कोई खास जानकारी नही है। बस लिखता हूँ । जो दिल और दिमाक में आयालेखन मेरा बस एक सौख है । या कहु मेरी मानसिक बीमारी जो कागज पर उतर जाती है।मै खुद नही जनता मै ये भाव कैसे लिखता हु।लेकिन लिखता हु। और बस लिखता हूँ ....आप मेरे कविता ,लेख ,अतुकांत,आदि मेरे ब्लॉग"अहसास के कुछ पन्ने"पर पढ़ सकते है।....सादर नमन ...

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क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा ..गजल



बह्र:- 2122-2122-2122-212

एक तरफ़ा हो नहीं सकता कोई भी फैसला।।

दर्द दोनों ओर देगा ये सफर ये रास्ता।।

अब रकीबत का असर आया है रिस्ते में मेरे।

दरमियाँ अब दिख रहा है दूरियां और फासला।

बीज रिश्ता ,फासले के आज कल बोने लगा ।

अब फसल नफरत की पैदा खेत में वो कर रहा।।

लाख समझाया मगर उनको समझ आया नहीं।

दम मुहब्बत तोड़ देगी, गर नहीं होंगे फ़ना।।

बस जरा सा मुस्कुराकर कर दिया हल मुश्किलें।

फर्क अब पड़ता नहीं ,मैं…

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Posted on April 7, 2018 at 10:53pm — 10 Comments

अलग ये बात है लहजा जरा नहीं मिलता ..गजल

बह्र -1212-1122-1212-22



बड़ा शह्र है ये अपना पता नहीं मिलता।।

यहाँ बजूद भी हँसता हुआ नहीं मिलता।।

दरख़्त देख के लगता तो आज भी ऐसा ।

के ईदगाह में अब भी खुदा नहीं मिलता।।

समाज ढेरों किताबी वसूल गढ़ता है।

वसूल गढ़ता ,कभी रास्ता नहीं मिलता।।

मैं पढ़ लिया हूँ कुरां,गीता बाइबिल लेकिन ।

किसी भी ग्रन्थ में , नफरत लिखा नहीं मिलता।।

मुझे भी दर्द ओ तन्हाई से गिला है पर।

करें भी क्या कोई हमपर फ़िदा नहीं…

Continue

Posted on March 30, 2018 at 11:11am — 6 Comments

फिर मैं बचपन दोहराना चाहता हूँ

बह्र ,2122-2122-2122

फिर मैं बचपन दोहराना चाहता हूँ।।
ता -उमर मैं मुस्कुराना चाहता हूँ ।।

जिसमें पाटी कलम के संग दवाइत।
मैं वो फिर लम्हा पुराना चाहता हूँ ।।

कोयलों की कूह के संग कूह कर के ।
मौसमी इक गीत गाना चाहता हूँ ।।

टाटपट्टी ,चाक डस्टर, और कब्बडी।
दाखिला कक्षा में पाना चाहता हूँ।।

ए बी सी डी, का ख् गा और वर्ण आक्षर।
खिलखिलाकर गुनगुनाना चाहता हूँ ।।

आमोद बिन्दौरी / मौलिक /अप्रकाशित

Posted on March 24, 2018 at 11:23am — 5 Comments

आधा तेरा साथ और आधी जुदाई है ।

बह्र:-221-2121-2221-212

आधा है तेरा साथ ओर आधी जुदाई है।।

कुछ इस तरह चिरागे दिल की रौशनाई है ।।

चहरे में मुस्कुराहटें आई हैं लौट कर ।

जब जब भी मैंने याद की ओढ़ी रजाई है।।

विस्मित नहीं हुई अभी,अपनी हो आज भी।

रिश्ता जरूर बदला है अब तू पराई है।।

कितना भी पढ़ लो जिंदगी की इस किताब को ।

मासूस हो यही अभी,आधी पढाई है।।

नजरों से हूबहू अभी वो ही गुजर गया।

जिसकी है जुस्तजू मुझे, तन पे सिलाई है…

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Posted on March 22, 2018 at 7:10pm — 12 Comments

Comment Wall (9 comments)

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At 8:02am on September 13, 2016, Kalipad Prasad Mandal said…

आदरणीय श्रीवास्तव अमोद जी,  नए मित्र के रूप में आपका स्वागत है |

At 12:29pm on April 17, 2016, Sushil Sarna said…

आदरणीय  श्रीवास्तव अमोद विन्दोरी माह के सक्रिय सदस्य के रूप में चयनित होने पर आपको  बधाई। 

At 11:03pm on April 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

श्रीवास्तव आमोद विन्दोरी जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 8:19am on March 30, 2016, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आमोद जी , नये मित्र के  रूप में आपका स्वागत . शुभ कामनाएं . 

At 12:39pm on November 11, 2015, ASHISH KUMAAR TRIVEDI said…

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

At 10:49pm on August 18, 2015, amod shrivastav (bindouri) said…
धन्यवादसर
At 11:48pm on July 15, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

स्वागत अभिनन्दन 

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

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 ग़ज़ल की बातें 

 

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At 5:43am on July 13, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें
At 2:05am on July 12, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

स्वागत अभिनन्दन 

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