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"आदरणीय दिगंबर नासवा साहब बहुत बहुत शुक्रिया"
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"आदरणीय रवि जी बहुत बहुत शुक्रिया"
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dandpani nahak left a comment for Md. anis sheikh
"बहुत शुक्रिया आदरणीय"
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Samar kabeer left a comment for dandpani nahak
"प्रयासरत रहें ।"
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dandpani nahak left a comment for Samar kabeer
"बहुत शुक्रिया आदरणीय आपकी कृपा है"
Jan 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-103
"ऐसी ख़बर वो फिर से न आएँ मुझे न दो यारो दया करो ये सज़ाएँ मुझे न दो बातूनी हो गया है बहुत झूठ सच है चुप कहता है वो यही कि सदाएँ मुझे न दो कर कर के इंतिज़ार बहुत थक चुका हूँ मैं ऐसे में ज़िन्दगी की दुआएँ मुझे न दो इस बार जो गया न कभी लौट…"
Jan 26
Samar kabeer left a comment for dandpani nahak
"जनाब नाहक़ साहिब आदाब, कृपया ये ग़ज़ल मुझे वाट्सऐप कर दें, मेरा नम्बर है 09753845522"
Jan 25
dandpani nahak left a comment for Samar kabeer
"आदरणीय जनाब समर कबीर साहब प्रणाम तरही मुशायरा 103 के लिए प्रयास किया है इत्तिला की फिर से वो न आएँ मुझे न दो मैं जा चुका हूँ अब तो सदाएँ मुझे न दो खामोश सच है,झूठ हुआ बातुनी बहुत उस पे चुप रहने की अदाएँ मुझे न दो मैं थक चुका हूँ उस का इन्तजार कर…"
Jan 25
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"खामखाँ उन की सियासत का निशाना बन गया खुदकशी का भी मिरे जब से अफसाना बन गया याद मुझको कर कभी तो बिसमिल्ला के साथ में पेट तेरा ही भरने को मैं दिवाना बन गया कुछ रिन्द की थी दुआ कुछ जाहिद की भी इल्तिजा यूँ नहीं इस जीस्त में दोस्त मयखाना बन गया इस तरह…"
Dec 29, 2018

Profile Information

Gender
Male
City State
arang
Native Place
arang
Profession
service

Dandpani nahak's Blog

जब क़सम हिंदुस्तान की है

जब क़सम हिंदुस्तान की है
फिक्र फिर किसे जान की है

फ़लक है समूचा तिरंगा
यही बात तो शान की है

ज़माने हुए थी सचाई
तस्वीरें ही पहचान की है

मुद्दतों से तो हम न सुधरे
घडी आज इम्तहान की है

शिखर पर मुल्क हो हमारा
ये ख्वाहिश ही नादान की है

दण्डपाणि नाहक

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on August 15, 2018 at 10:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल : 2122 2122 2122

एक दुजे के अब हबीब नहीं रहे हैं
लोकतंत्र औ हम करीब नहीं रहे हैं

फसल की वाज़िब मिले क़ीमत ऐसी तो
हम किसानों के नसीब नहीं रहें हैं

खत्म करके सब गरीबों को मुल्क से
घोषणा कर दो गरीब नहीं रहे हैं

हर ज़ुल्म हमने सहे हैं मगर फिर भी
यूँ कभी भी बेतर्तीब नहीं रहें हैं

मंदिर मस्जिद एक साथ न हो कभी भी
इस क़द्र तंग तहज़ीब नहीं रहे हैं


दण्डपाणि नाहक
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on March 21, 2018 at 8:00pm — 5 Comments

कविता जीवन का समकोण त्रिभुज

जीवन का समकोण त्रिभुज
अनिश्चितताओं के दो न्यून कोणों से
कुछ नहीं ज्यादा
बड़ी मश्शक्कत के बाद भी
योग एक सरल रेखा
बहुत संभावनाओं के बावजूद
जिन्दा रहने की संभाव्यता
आधा-आधा
हाँ, दुःख और सुख का
पूर्ण वर्ग
जरूर बीजगणित का सूत्र है
क्या मृत्यु ही जीवन का
एकमात्र सत्य है

दण्डपाणि नाहक

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on March 5, 2018 at 7:32pm — 3 Comments

ग़ज़ल 122 122 122 122

हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं


निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं


जिन्होंने कभी लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बतायें उन्ही के धड़े हैं


तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं


हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिये ही नहीं हम बनें हैं


दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on February 5, 2018 at 5:01pm — 1 Comment

Comment Wall (4 comments)

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At 11:31pm on January 26, 2019, Samar kabeer said…

प्रयासरत रहें ।

At 10:27am on January 25, 2019, Samar kabeer said…

जनाब नाहक़ साहिब आदाब,

कृपया ये ग़ज़ल मुझे वाट्सऐप कर दें, मेरा नम्बर है 09753845522

At 8:07am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

At 8:06pm on December 15, 2017, dandpani nahak said…
122 122 122 122
हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं

जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बनें हैं

दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक अप्रकाशित
 
 
 

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