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dandpani nahak
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dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"दिल में जो उनके छुपी थी वो बुराई न गई इसलिये रस्म महब्बत की निभाई न गई सारे अहबाब थे पानी भी बहुत था लेकिन किसलिये आग मेरे घर की बुझाई न गई ये अलग बात कि वो भूल गया है लेकिन याद उसकी तो कभी हमसे भुलाई न गई लाख कोशिश की मगर जान गया जग सारा यार…"
12 hours ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय कृष मिश्रा जी नमस्कार बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक  बधाई स्वीकार करें ' धूप की छांव में लेटा हुआ गीला सा चाँद '  क्या धूप की छांव होगी                       …"
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है  हार्दिक बधाई स्वीकार करें "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय दिनेश कुमार विश्वकर्मा जी नमस्कार ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है बहुत बधाई "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय नादिर ख़ान साहब आदाब ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है  हार्दिक बधाई स्वीकार करें "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदणीय चेतन प्रकाश जी नमस्कार अच्छा प्रयास हुआ है "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक  बधाई स्वीकार करें "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय कृष मिश्रा जी नमस्कार बहुत बहुत शुक्रिया वक़्त निकाल कर ग़ज़ल तक आने और हौसला बढ़ाने का  कृपया इस शैर को यूँ पढ़ें  'बात तो जब है कि  अपने पे ठहाका भी लगे  ख़ुद तमाशा न बने क्या वो तमाशाई हो '   आदरणीय  बात…"
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब आदाब बहुत बहुत शुक्रिया आपका आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला बढ़ाया "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीया राजेश कुमारी दी प्रणाम बहुत बहुत शुक्रिया समय निकाल कर ग़ज़ल तक आने और  हौसला बढ़ाने का चौथे शैर का उला परम आदरणीय समर कबीर साहब कि इस्लाह के  अनुसार ही सहीह हो गया है आदरणीया "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह  'कुशक्षत्रप' जी नमस्कार बहुत बहुत धन्यवाद आपका हौसला बढ़ाने का  "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय दिनेश कुमार विश्वकर्मा जी नमस्कार बहुत शुक्रिया आप वक़्त निकाल कर ग़ज़ल तक आए और सराहा  कृपया   " बात तो जब है कि अपने पे ठहाका भी लगे                 ख़ुद तमाशा न बने क्या वो…"
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब आदाब बहुत बहुत शुक्रिया ज़नाब वक़्त निकाल कर  हौसला बढ़ाने का "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"परम आदरणीय समर कबीर साहब प्रणाम मिसरे को प्रश्न वाचक न बनाने की चाहत में मैने ऐसा किया किन्तु  गलती हो गयी बह्र चेक न कर सका मुआफ़ी चाहता हूँ  अब अगर आपके अनुसार ' ख़ुद तमाशा न बने क्या वो तमाशाई हो ' हो तो क्या सहीह होगा "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीया रचना भाटिया जी ख़ुद तमाशा न बने क्या वो तमाशाई हो है होना चाहिए आप सहीह है  परम आदरणीय समर कबीर साहब ने भी कहा है मैं इसलिये झिझक रहा था की इससे मिसरा प्रश्न वाचक हो गया क्या  यह दुरुस्त होगा "
Jan 23
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"बे मुरव्वत हो कि बे क़द्र या हरजाई हो जो भी हो तुम तो इलाज-ए-दिल-ए-तन्हाई हो जब भी दम निकले मेरा है ये गुज़ारिश मौला लब पे हक़ बात रहे आँखों में सच्चाई हो बात तो जब है कि अपने पे ठहाका भी लगे ख़ुद तमाशा न बने वो क्या तमाशाई हो ख़्वाब यारों मैं यही…"
Jan 23

Profile Information

Gender
Male
City State
arang
Native Place
arang
Profession
service

Dandpani nahak's Blog

ग़ज़ल 2122 1212 22

इश्क़ से ना हो राब्ता कोई
ज़िन्दगी है की हादसा कोई

वो पुराने ज़माने की बात है
अब नहीं करता है वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का है न फ़लसफ़ा कोई

यहाँ सब बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का है टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on September 27, 2020 at 6:02pm — 15 Comments

ग़ज़ल 2122 1212 22

इश्क़ हो या कि हादसा कोई
सब का होता है कायदा कोई

वो पुराने ज़माने कि बात हैं
अब नहीं करता हैं वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का हैं न फ़लसफ़ा कोई

सब यहाँ बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का हैं टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई


मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on April 9, 2020 at 2:17am

122 122 122 12 ग़ज़ल

कभी इस तरह से भी सोचा है क्या
भला ज़िन्दगी का भरोसा है क्या

यूँ रहता है जैसे यहाँ सदियों तक
रहेगा मगर ये तो धोका है क्या

नकाबों में दिल्ली है सरकारें दो
अजीबो गरीब ये तमाशा है क्या

अगर ना सियासत हो दिल्ली में तो
तभी कुछ किया जा भी सकता है क्या

दिवाली मनाई है दिल्ली ने भी
खुदा ने दिवाला निकाला है क्या

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on November 3, 2019 at 11:41pm — 1 Comment

इस दीवाली

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना तुम

बनकर प्रकाश अँधेरे में उतर जाना तुम



देखना कहीं कोई मासूम

बुझी फुलझड़ियों में गुमसुम

चिंगारी ढूंढ रहा हो तो

उसके पास जाना तुम



रौशन कर दुनिया उसको गले लगाना तुम

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना तुम



और देखना घर की झुर्रियाँ सभी

दूर कर के दिलों की दूरियाँ सभी

साथ मिलके सब अपनों के

एक एक कर जलाना मजबूरियाँ सभी



एकता में बल है कितना ये बताना तुम

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना… Continue

Posted on October 27, 2019 at 4:24pm — 8 Comments

Comment Wall (5 comments)

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At 6:03pm on March 29, 2020, सालिक गणवीर said…
आदरणीय नाहक जी
बहुत आभार है आपका. मैं कोशिश करूंगा कि भविष्य में और भी बेहतर लिख संकू.
At 10:32am on August 7, 2019, Samar kabeer said…

नाहक़ जी,प्रयासरत रहें ।

At 11:31pm on January 26, 2019, Samar kabeer said…

प्रयासरत रहें ।

At 10:27am on January 25, 2019, Samar kabeer said…

जनाब नाहक़ साहिब आदाब,

कृपया ये ग़ज़ल मुझे वाट्सऐप कर दें, मेरा नम्बर है 09753845522

At 8:06pm on December 15, 2017, dandpani nahak said…
122 122 122 122
हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं

जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बनें हैं

दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक अप्रकाशित
 
 
 

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