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सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on dandpani nahak's blog post जब क़सम हिंदुस्तान की है
"दंडपाणि नाहक जी सादर अभिवादन। यह ग़ज़लनुमा कविता की शिल्प बता सकते हैं क्या?? क्योकि मुझे इसका शिल्प समझ मे नहीं आया। भाव के लिए बधाई देता हूँ। सादर"
6 hours ago
dandpani nahak posted a blog post

जब क़सम हिंदुस्तान की है

जब क़सम हिंदुस्तान की है फिक्र फिर किसे जान की है फ़लक है समूचा तिरंगा यही बात तो शान की है ज़माने हुए थी सचाई तस्वीरें ही पहचान की है मुद्दतों से तो हम न सुधरे घडी आज इम्तहान की है शिखर पर मुल्क हो हमारा ये ख्वाहिश ही नादान की है दण्डपाणि नाहक मौलिक एवम् अप्रकाशितSee More
10 hours ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"कुण्डलिया पानी कि ये निर्दोषिता,मन सबका ललचाय उस पर निश्छल बचपना,बिल्कुल रहा न जाय बिल्कुल रहा न जाय,किन्तु नल है सरकारी कभी हो जाय बन्द, कभी मारे पिचकारी बरस सत्तर बीत गए,बीत गयी जी जवानी अब भी नहीं मिलते, हैं सबको साफ़ पानी दण्डपाणि…"
Jul 21
dandpani nahak joined Admin's group
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चित्र से काव्य तक

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोंत्सव" में भाग लेने हेतु सदस्य इस समूह को ज्वाइन कर ले |See More
Jul 21
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-96
"ना छुट्टियाँ न गाँव, नानी है अब कहाँ बात वो पुरानी है हादसे है जहमुरियत भी है और उस पर भी हुक्मरानी है हाय उन नीमबाज़ आँखों में रात है,नींद है,कहानी है अब वो दीवार न रही चौथी बाकि कुछ जख्म है निशानी है उनको हक़ कहें इमानदारी पे जिनको तज़र्बा ए…"
Jun 27
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-96
"तेरी गैरत की झील सूख गई मेरी आँखों में अब भी पानी है वाह !क्या बात है! आदरणीय समर कबीर साहब बहुत बधाई"
Jun 27
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"यूँ हमेशा दूसरों के दिल में न बुरा देखो देखना ही है तो अक्स खुद का अपना देखो टपकती याद टुटा दिल गुमसुम नींदे पर अब भी कहते हो फिर से एक सपना देखो एक तुम ही तो नहीं हो गगन से उतरे हुए 'हो मय्यसर तो कभी घूम के दुनिया देखो' देख लो की तरह…"
May 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"आ. दण्डपाणि जी, हार्दिक बधाई ।"
Mar 25
surender insan commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"आद. दण्डपाणि जी सादर नमन।वाह अच्छा प्रयास है आपका बधाई। मोहतरम समर साहब की सलाह पर गौर करे। स्थापित शायरों का कलाम पढ़े। भाषा का ख्याल रखते हुए वाक्य रचना करे। यही पटल पे बहुत से लेख है ग़ज़ल की बाबत उन्हें पढ़े। यक़ीनन आप और अच्छा कहेंगे। सादर जी।"
Mar 23
dandpani nahak left a comment for Nilesh Shevgaonkar
"आदरणीय नीलेश सर प्रणाम बहुत शुक्रिया"
Mar 22
dandpani nahak left a comment for Mohammed Arif
"आदरणीय आरिफ़ मोहम्मद साहब प्रणाम बहुत शुक्रिया आपकी सलाह पर तुरंत अमल होगा"
Mar 22
dandpani nahak left a comment for Samar kabeer
"आदरणीय समर कबीर महोदय प्रणाम आपका आदेश सर माथे पर आपका बहुत बहुत शुक्रिया"
Mar 22
Nilesh Shevgaonkar commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"अच्छा प्रयास है आ. दण्डपाणी जी बहर यानी लय का अभ्यास/ अध्ययन कीजिये सादर "
Mar 22
Mohammed Arif commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"आदरणीय दंडपाणि जी आदाब,                         ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह का तत्काल प्रभाव से संज्ञान लें । प्रयास हेतु हार्दिक बधाई ।"
Mar 22
Samar kabeer commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"जनाब दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब,  बह्र के साथ ग़ज़ल के शिल्प और व्याकरण पर अभी बहुत मिहनत की ज़रूरत है,इसके लिए पुराने शायरों का कलाम पढ़ें और ओबीओ पटल पर मौजूद ग़ज़लों और आलेखों का अध्यन करें । इस प्रयास हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
Mar 22
dandpani nahak posted a blog post

ग़ज़ल : 2122 2122 2122

एक दुजे के अब हबीब नहीं रहे हैं लोकतंत्र औ हम करीब नहीं रहे हैं फसल की वाज़िब मिले क़ीमत ऐसी तो हम किसानों के नसीब नहीं रहें हैं खत्म करके सब गरीबों को मुल्क से घोषणा कर दो गरीब नहीं रहे हैं हर ज़ुल्म हमने सहे हैं मगर फिर भी यूँ कभी भी बेतर्तीब नहीं रहें हैं मंदिर मस्जिद एक साथ न हो कभी भी इस क़द्र तंग तहज़ीब नहीं रहे हैं दण्डपाणि नाहकमौलिक एवम् अप्रकाशितSee More
Mar 22

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Gender
Male
City State
arang
Native Place
arang
Profession
service

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जब क़सम हिंदुस्तान की है

जब क़सम हिंदुस्तान की है
फिक्र फिर किसे जान की है

फ़लक है समूचा तिरंगा
यही बात तो शान की है

ज़माने हुए थी सचाई
तस्वीरें ही पहचान की है

मुद्दतों से तो हम न सुधरे
घडी आज इम्तहान की है

शिखर पर मुल्क हो हमारा
ये ख्वाहिश ही नादान की है

दण्डपाणि नाहक

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on August 15, 2018 at 10:00pm — 1 Comment

ग़ज़ल : 2122 2122 2122

एक दुजे के अब हबीब नहीं रहे हैं
लोकतंत्र औ हम करीब नहीं रहे हैं

फसल की वाज़िब मिले क़ीमत ऐसी तो
हम किसानों के नसीब नहीं रहें हैं

खत्म करके सब गरीबों को मुल्क से
घोषणा कर दो गरीब नहीं रहे हैं

हर ज़ुल्म हमने सहे हैं मगर फिर भी
यूँ कभी भी बेतर्तीब नहीं रहें हैं

मंदिर मस्जिद एक साथ न हो कभी भी
इस क़द्र तंग तहज़ीब नहीं रहे हैं


दण्डपाणि नाहक
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on March 21, 2018 at 8:00pm — 5 Comments

कविता जीवन का समकोण त्रिभुज

जीवन का समकोण त्रिभुज
अनिश्चितताओं के दो न्यून कोणों से
कुछ नहीं ज्यादा
बड़ी मश्शक्कत के बाद भी
योग एक सरल रेखा
बहुत संभावनाओं के बावजूद
जिन्दा रहने की संभाव्यता
आधा-आधा
हाँ, दुःख और सुख का
पूर्ण वर्ग
जरूर बीजगणित का सूत्र है
क्या मृत्यु ही जीवन का
एकमात्र सत्य है

दण्डपाणि नाहक

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on March 5, 2018 at 7:32pm — 3 Comments

ग़ज़ल 122 122 122 122

हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं


निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं


जिन्होंने कभी लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बतायें उन्ही के धड़े हैं


तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं


हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिये ही नहीं हम बनें हैं


दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on February 5, 2018 at 5:01pm — 1 Comment

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At 8:06pm on December 15, 2017, dandpani nahak said…
122 122 122 122
हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं

जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बनें हैं

दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक अप्रकाशित
 
 
 

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