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dandpani nahak
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"आ. दण्डपाणि जी, हार्दिक बधाई ।"
Mar 25
surender insan commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"आद. दण्डपाणि जी सादर नमन।वाह अच्छा प्रयास है आपका बधाई। मोहतरम समर साहब की सलाह पर गौर करे। स्थापित शायरों का कलाम पढ़े। भाषा का ख्याल रखते हुए वाक्य रचना करे। यही पटल पे बहुत से लेख है ग़ज़ल की बाबत उन्हें पढ़े। यक़ीनन आप और अच्छा कहेंगे। सादर जी।"
Mar 23
dandpani nahak left a comment for Nilesh Shevgaonkar
"आदरणीय नीलेश सर प्रणाम बहुत शुक्रिया"
Mar 22
dandpani nahak left a comment for Mohammed Arif
"आदरणीय आरिफ़ मोहम्मद साहब प्रणाम बहुत शुक्रिया आपकी सलाह पर तुरंत अमल होगा"
Mar 22
dandpani nahak left a comment for Samar kabeer
"आदरणीय समर कबीर महोदय प्रणाम आपका आदेश सर माथे पर आपका बहुत बहुत शुक्रिया"
Mar 22
Nilesh Shevgaonkar commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"अच्छा प्रयास है आ. दण्डपाणी जी बहर यानी लय का अभ्यास/ अध्ययन कीजिये सादर "
Mar 22
Mohammed Arif commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"आदरणीय दंडपाणि जी आदाब,                         ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह का तत्काल प्रभाव से संज्ञान लें । प्रयास हेतु हार्दिक बधाई ।"
Mar 22
Samar kabeer commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल : 2122 2122 2122
"जनाब दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब,  बह्र के साथ ग़ज़ल के शिल्प और व्याकरण पर अभी बहुत मिहनत की ज़रूरत है,इसके लिए पुराने शायरों का कलाम पढ़ें और ओबीओ पटल पर मौजूद ग़ज़लों और आलेखों का अध्यन करें । इस प्रयास हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
Mar 22
dandpani nahak posted a blog post

ग़ज़ल : 2122 2122 2122

एक दुजे के अब हबीब नहीं रहे हैं लोकतंत्र औ हम करीब नहीं रहे हैं फसल की वाज़िब मिले क़ीमत ऐसी तो हम किसानों के नसीब नहीं रहें हैं खत्म करके सब गरीबों को मुल्क से घोषणा कर दो गरीब नहीं रहे हैं हर ज़ुल्म हमने सहे हैं मगर फिर भी यूँ कभी भी बेतर्तीब नहीं रहें हैं मंदिर मस्जिद एक साथ न हो कभी भी इस क़द्र तंग तहज़ीब नहीं रहे हैं दण्डपाणि नाहकमौलिक एवम् अप्रकाशितSee More
Mar 22
Samar kabeer and dandpani nahak are now friends
Mar 21
Samar kabeer commented on dandpani nahak's blog post कविता जीवन का समकोण त्रिभुज
"जनाब नाहक़ साहिब आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
Mar 6
dandpani nahak left a comment for Mohammed Arif
"आदरणीय आरिफ़ सर आपको कविता अच्छी लगी मेरा लिखना सार्थक हुआ बहुत शुक्रिया"
Mar 6
Harash Mahajan commented on dandpani nahak's blog post कविता जीवन का समकोण त्रिभुज
"आदरणीय दण्डपानी जी ज़िन्दगी की सच्चाई को दर्शाती एक अच्छी कविता ।"
Mar 6
Mohammed Arif commented on dandpani nahak's blog post कविता जीवन का समकोण त्रिभुज
"आदरणीय दण्डपाणि जी आदाब,                               गणितीय शब्दावली से भरपूर जीवन को परिभाषित करती अच्छी कविता । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Mar 6
dandpani nahak posted a blog post

कविता जीवन का समकोण त्रिभुज

जीवन का समकोण त्रिभुजअनिश्चितताओं के दो न्यून कोणों सेकुछ नहीं ज्यादाबड़ी मश्शक्कत के बाद भीयोग एक सरल रेखाबहुत संभावनाओं के बावजूदजिन्दा रहने की संभाव्यताआधा-आधाहाँ, दुःख और सुख कापूर्ण वर्गजरूर बीजगणित का सूत्र हैक्या मृत्यु ही जीवन काएकमात्र सत्य हैदण्डपाणि नाहकमौलिक एवम् अप्रकाशितSee More
Mar 5
dandpani nahak commented on Samar kabeer's blog post 'दिल में हमारे दर्द-ए- महब्बत रखा गया'
"वाह क्या बात है आदरणीय ! हर एक शय को हस्ब-ए-ज़रूरत रखा गया ! बहुत खूब"
Feb 25

Profile Information

Gender
Male
City State
arang
Native Place
arang
Profession
service

Dandpani nahak's Blog

ग़ज़ल : 2122 2122 2122

एक दुजे के अब हबीब नहीं रहे हैं
लोकतंत्र औ हम करीब नहीं रहे हैं

फसल की वाज़िब मिले क़ीमत ऐसी तो
हम किसानों के नसीब नहीं रहें हैं

खत्म करके सब गरीबों को मुल्क से
घोषणा कर दो गरीब नहीं रहे हैं

हर ज़ुल्म हमने सहे हैं मगर फिर भी
यूँ कभी भी बेतर्तीब नहीं रहें हैं

मंदिर मस्जिद एक साथ न हो कभी भी
इस क़द्र तंग तहज़ीब नहीं रहे हैं


दण्डपाणि नाहक
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on March 21, 2018 at 8:00pm — 5 Comments

कविता जीवन का समकोण त्रिभुज

जीवन का समकोण त्रिभुज
अनिश्चितताओं के दो न्यून कोणों से
कुछ नहीं ज्यादा
बड़ी मश्शक्कत के बाद भी
योग एक सरल रेखा
बहुत संभावनाओं के बावजूद
जिन्दा रहने की संभाव्यता
आधा-आधा
हाँ, दुःख और सुख का
पूर्ण वर्ग
जरूर बीजगणित का सूत्र है
क्या मृत्यु ही जीवन का
एकमात्र सत्य है

दण्डपाणि नाहक

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on March 5, 2018 at 7:32pm — 3 Comments

ग़ज़ल 122 122 122 122

हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं


निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं


जिन्होंने कभी लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बतायें उन्ही के धड़े हैं


तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं


हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिये ही नहीं हम बनें हैं


दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on February 5, 2018 at 5:01pm — 1 Comment

ग़ज़ल 2212 2212 212

हमको ज़िन्दगी से शिक् वा बहुत है
दीगर ये बात है की मिला बहुत है

एक ही कश्ती के ऊपर सवार हैं
दर्मियाँ हमारे फासला बहुत है

दिल जो ये मेरा कुन्दन हुआ है अब
मालूम क्या तुम्हे जला बहुत है

अच्छा चलो हो जाय हम होने को
अब इस में मगर ढकोसला बहुत है

जो हो मन्दिर मस्जिद से फुरसत
मेरे मुल्क में सच मसला बहुत है

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on February 3, 2018 at 2:41pm — 4 Comments

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At 8:06pm on December 15, 2017, dandpani nahak said…
122 122 122 122
हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं

जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बनें हैं

दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक अप्रकाशित
 
 
 

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