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dandpani nahak
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dandpani nahak left a comment for Mohammed Arif
"जनाब मोहम्मद आरिफ़ जी आदाब शुक्रगुज़ार हूँ की आपको मेरी ग़ज़ल पसंद आई और गुणी जनों की राय जानने को बेक़रार भी हूँ आशा है गुणीजन मेरी गलतियों को बताएं ताकि मैं आगे सुधर कर सकूँ! आपका बहुत शुक्रिया"
Thursday
Mohammed Arif commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल: तकते रहो बस आसमान की तरफ
"आदरणीय दंडपाणी जी आदाब,                        बहुत  ही कटाक्षपूर्ण ग़ज़ल । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।"
Thursday
dandpani nahak posted a blog post

ग़ज़ल: तकते रहो बस आसमान की तरफ

2212/2212/2212फ़रमान सरकारी यह किसान की तरफ तकते रहो बस आसमान की तरफ बुल्लेट ट्रेन बहुत नफ़ा देगा तुम्हें पटरी जब गुज़र जाय खलिहान की तरफ हम आपकी दुगुनी करेंगे आय को नदियाँ मुड़ेंगी जब सब मकान की तरफ दो ही रस्ते अब बच रहे आखीर में उन के रहें साथ या हिंदुस्तान की तरफ माना सियासत में सबकुछ है जायज़ कुछ तो फ़र्ज़ होता है इनसान की तरफ दण्डपाणि नाहकमौलिक एवम् अप्रकाशितSee More
Thursday
dandpani nahak left a comment for Tasdiq Ahmed Khan
"आदरणीय तस्दीक अहमद खान साहब आदाब मैं बहुत आभारी हूँ कि आपने मेरी ग़ज़ल पढ़ी शुक्रिया मुझमें अभी बहुत कमी है मैं जानता हूँ लेकिन आप जैसे गुणीजनों के सानिध्य में कुछ सीख पाउँगा ऐसी आशा करता हूँ आपका बहुत बहुत आभार और शुक्रिया"
Jan 10
dandpani nahak left a comment for munish tanha
"आदरणीय मुनीश तन्हा जी बहुत बहुत शुक्रिया"
Jan 10
dandpani nahak left a comment for मोहन बेगोवाल
"आदरणीय मोहन जी बहुत बहुत शुक्रिया"
Jan 10
dandpani nahak left a comment for Afroz 'sahr'
"आदरणीय अफरोज जी आदाब बहुत शुक्रिया आपने मेरी रचना पढ़ी मुझे अभी बहुत सीखना है आशा है आप मेरी इसी तरह मदद करेंगे"
Jan 10
dandpani nahak left a comment for Samar kabeer
"आदरणीय समर कबीर जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया"
Jan 10
dandpani nahak left a comment for लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"शुक्रिया लक्ष्मण जी"
Jan 10
dandpani nahak left a comment for rajesh kumari
"आदरणीया राजेश कुमारी जी नमस्कार मुझे बेहद ख़ुशी है की आपने मेरी पहली रचना पढ़ी मुझे अभी बहुत सीखना है आशा है आप भविष्य में भी मेरी गलतियों की ओर इंगित करती रहेंगी आपका बहुत बहुत आभार एवम् शुक्रिया"
Jan 10
dandpani nahak left a comment for Amit Kumar "Amit"
"शीमान अमित कुमार जी नमस्कार शुक्रिया आपका"
Jan 10
dandpani nahak left a comment for Ravi Shukla
"आदरणीय रवि शुक्ला जी प्रणाम प्रथम तो मैं देरी से आपका आभार व्यक्त करते हुए शर्मिंदा हूँ और माफ़ी चाहता हूँ अपने मेरी पहली ही ग़ज़ल पढ़ी तथा इस पर अपने विचार व्यक्त किये मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ मेरी पहली ही ग़ज़ल में बहुत ख़ामियां है मुझे भरोषा है की आप…"
Jan 10
dandpani nahak left a comment for Mohammed Arif
"आदरणीय जनाब मोहम्मद आरिफ साहब आदाब ,नमस्कार ये मेरा परम सौभाग्य की मेरी पहली ही रचना हेतु आपने अपना बहुमूल्य समय निकाला,पढ़ा और सराहा .निश्चित ही मुझमें अभी बहुत कमियाँ हैं आशा करता हूँ आप जैसे गुणीजनों के सानिध्य में कुछ सीख सकूँगा बहुत बहुत…"
Jan 10
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-90
"बज़्म में तेरे चर्चा ये आम है हाँ मुझे उस बेवफा से काम है चार रोज़ की जिंदगी क्या कहें "इस के आगे बस खुदा का नाम है" क्या हुक्मरां क्या जनता क्या कौमें इस जहाँ में बस यही अंजाम है वो जहाँ आसमां और जमीं मिले मिलाना उस जगह ये पैगाम है लोग…"
Dec 22, 2017
dandpani nahak left a comment for dandpani nahak
"122 122 122 122 हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है चलो की…"
Dec 15, 2017
dandpani nahak is now a member of Open Books Online
Dec 9, 2017

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ग़ज़ल: तकते रहो बस आसमान की तरफ

2212/2212/2212

फ़रमान सरकारी यह किसान की तरफ
तकते रहो बस आसमान की तरफ

बुल्लेट ट्रेन बहुत नफ़ा देगा तुम्हें
पटरी जब गुज़र जाय खलिहान की तरफ

हम आपकी दुगुनी करेंगे आय को
नदियाँ मुड़ेंगी जब सब मकान की तरफ

दो ही रस्ते अब बच रहे आखीर में
उन के रहें साथ या हिंदुस्तान की तरफ

माना सियासत में सबकुछ है जायज़
कुछ तो फ़र्ज़ होता है इनसान की तरफ

दण्डपाणि नाहक
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on January 18, 2018 at 1:00am — 1 Comment

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At 8:06pm on December 15, 2017, dandpani nahak said…
122 122 122 122
हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं

जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बनें हैं

दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक अप्रकाशित
 
 
 

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"भाव पक्ष पर आपसे मिली सराहना के लिये हार्दिक आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी। आपके मार्गदर्शन व शिव…"
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