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Tasdiq Ahmed Khan's Blog – April 2018 Archive (4)

ग़ज़ल(मुहब्बत में धोका उठाने चले हैं ) -

(फ ऊलन -फ ऊलन-फ ऊलन-फ ऊलन )



मुहब्बत में धोका उठाने चले हैं।

हसीनों से वह दिल लगाने चले हैं।

सज़ा जुर्म की वह न दे पाए लेकिन

मेरा नाम लिख कर मिटाने चले हैं।

लगा कर त अस्सुब का आंखों पे चश्मा

वो दरसे मुहब्बत सिखाने चले हैं ।

अदावत भी जिनको निभाना न आया

वो हैरत है उल्फ़त निभाने चले हैं ।

बहुत नाम है ऐबगीरों में जिनका

हमें आइना वो दिखाने चले हैं ।

अचानक इनायत न उनकी हुई है

वो…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 29, 2018 at 12:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल (कीजियेगा हुस्न वालों से मुहब्बत देख कर )

(फ़ाइलातुन -फ़ाइलातुन -फ़ाइलातुन -फाइलुन )



कीजियेगा हुस्न वालों से मुहब्बत देख कर|

हो गए बर्बाद कितने लोग सूरत देख कर |



यूँ नहीं उसकी बुझी आँखों में आई है चमक

वह रुखे दिलबर पे आया है मुसर्रत देख कर|



बागबां आख़िर सितम ढाने से बाज़ आ ही गया

यकबयक फूलों की गुलशन में बग़ावत देख कर |



देखता है कौन यारो आजकल किरदार को

लोग रिश्ता जोड़ते हैं सिर्फ़ दौलत देख कर |



बे वफ़ाई के सिवा इन से तो कुछ मिलता नहीं

आज़माना हुस्न की चौखट पे…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 19, 2018 at 1:30pm — 8 Comments

नज़्म (इंसानियत का ख़ून )

(फ़ाइलातुन -फ़ाइलातुन -फ़ाइलातुन -फ़ाइलुन )



बन गया है आज का इंसान हैवां दोस्तो |

पाक औरत का रहेगा कैसे दामां दोस्तो |

पेश आया था कभी दिल्ली में जैसा वाक़्या |

हो गया कठुआ ,रसाना में भी वैसा हादसा |

जिसको सुन कर हो रहे हैं जानवर दुनिया के ख़्वार |

कर दिया इंसान ने इंसानियत को शर्म सार |

यह नहीं है ख़्वाब कोई है हक़ीक़त दोस्तो |

आसिफ़ा है वह लुटी है जिसकी इज़्ज़त दोस्तो |

उम्र उस मासूम की थी सिर्फ़ लोगों आठ साल |

मुफ़लिसी थी घर में लेकिन था नहीं कोई…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 18, 2018 at 10:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल(डर लग रहा है तेवरे दिलदार देख कर )

ग़ज़ल(डर लग रहा है तेवरे दिलदार देख कर )



(मफ ऊल-फाइलात-मफाईल-फाइलुन/फाइलात)



इक़रार में छुपा हुआ इनकार देख कर।

डर लग रहा है तेवरे दिलदार देख कर ।

जो आरज़ूए दीद थी काफूर हो गई

रुख़ पर पड़ी निक़ाब की दीवार देख कर ।

दिल की ख़ता है और निशाना जिगर पे है

तीरे नज़र चलाइए सरकार देख कर ।

अगला निशाना तू ही है दहशत पसन्द का

हँस ले तू ख़ूब घर मेरा मिस्मार देख कर ।

शायद बना लिया गया फिर…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 11, 2018 at 4:39pm — 23 Comments

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