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Er. Ambarish Srivastava's Blog – October 2011 Archive (4)

आप सभी को दीपावली की बधाई व शुभकामनायें !

 

 

 

स्नेह मिलता रहे, दीप जलते रहें,



प्यार से हम सभी, रोज मिलते रहें,…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 25, 2011 at 12:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल





मैं जुबां पर सिर्फ मैं, यह बात है अभिमान की,

छोड़ मैं को अब बनें हम बात ये ही ज्ञान की. |१|

 

जो किसी को भी न भातीं छोड़ दो वो आदतें,

दोस्तों अब फिक्र हो इस देश के सम्मान की.   |२|



माँ से हमको है मिलाया बाप का साया दिया,

हम चुका सकते नहीं कीमत तेरे एहसान की. |३|



जान देकर जो गये अपनी शहीदाने…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 19, 2011 at 12:30am — 8 Comments

ग़ज़ल

अदब के साथ जो कहता कहन है 

वो अपने आप में एक अंजुमन है

 

हमें धोखे दिये जिसने हमेशा

उसी के प्यार में पागल ये मन है

 

हुई है  दिल्लगी बेशक हमीं से 

कभी रोशन था उजड़ा जो चमन है

 

अँधेरे के लिए शमआ जलाये

जिया की बज्म में गंगोजमन है  

 

नज़र दुश्मन की ठहरेगी कहाँ अब

बँधा सर पे हमेशा जो कफ़न है 

 

खिले हैं फूल मिट्टी है महकती 

यहाँ पर यार जो मेरा दफ़न है 

 

कहाँ परहेज मीठे से हमें…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 12:30am — 19 Comments

हरिगीतिका



हरिगीतिका

(1)

मधु छंद सुनकर छंद गुनकर, ही हमें कुछ बोध है,

सब वर्ण-मात्रा गेयता हित, ही बने यह शोध है, 

अब छंद कहना है कठिन क्यों, मित्र क्या अवरोध है,

रसधार छंदों की बहा दें, यह मेरा अनुरोध है ||



(2)

यह आधुनिक परिवेश इसमें, हम सभी पर भार है,

यह भार भी भारी नहीं जब, संस्कृति आधार  है,

सुरभित सुमन सब है खिले अब, आपसे मनुहार है, 

निज नेह के दीपक जलायें, ज्योंति का…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 1, 2011 at 2:31am — 15 Comments

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