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एक पत्थर सा बस पड़ा हूँ मैं......( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 1212 22/112

एक पत्थर सा बस पड़ा हूँ मैं
हूँ मुसाफ़िर या रास्ता हूँ मैं (1)

अब कोई ढूँढता नहीं मुझको
एक मुद्दत से लापता हूँ मैं (2)

ज़िंदगी आजकल जहन्नम है
ख़्वाब जन्नत के देखता हूँ मैं (3)

छोड़ कर सब चले गए हैं या
भीड़ में फिर से खो गया हूँ मैं (4)

अब नहीं इंतिज़ार तेरा पर
रास्ता रोज़ देखता हूँ मैं (5)

हर तरफ है अजीब वीरानी 
खुद में शायद उजड़ रहा हूँ मैं (6)

जिसने महरूम ही रखा सबको
क्यों वफा उनसे माँगता हूँ मैं (7)

* मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by सालिक गणवीर on January 25, 2021 at 12:42pm

 मुहतरम अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक आभार . ममनून हूँ कि आपने इस नाचीज़ के मिसरे पर इतनी मिहनत की. शुक्रिय : जनाब 

Comment by सालिक गणवीर on January 25, 2021 at 12:38pm

उस्ताद - ए - मुहतरम समर कबीर साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ और आपकी क़ीमती इस्लाह के लिए तह-ए -दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ. सलामत रहें।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on January 24, 2021 at 8:06pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने, उस्ताद मुहतरम की इस्लाह पर अमल के बाद ग़ज़ल और बहतर हो जाएगी। मतले के ऊला के लिए चंद मिसरे सुझाव के तौर पर पेश करने की जसारत कर रहा हूँ  -

1. एक पत्थर सा बस पड़ा हूँ मैं 2. कबसे पत्थर सा बन खड़ा हूँ मैं 3. एक पत्थर सा बन गया हूँ मैं

4. फिर उसी रस्ते पर खड़ा हूँ मैं 5. चलके दो गाम बस पड़ा हूँ मैं   सादर।

Comment by Samar kabeer on January 24, 2021 at 2:33pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'एक ही जगह बस पड़ा हूँ मैं'

इस मिसरे में आपने 'जगह' शब्द को 21 पर लिया है, जबकि इसका वज़्न 12 होता है, सुधारने का प्रयास करें ।

'गुम गया हूँ या लापता हूँ मैं'

इस मिसरे को यूँ कहें:-

'एक मुद्दत से लापता हूँ मैं'

'ऐसी वीरानगी है चारों सू
लग रहा है उजड़ रहा हूँ मैं'

इस शैर को यूँ कहें:-

'हर तरफ़ है अजीब वीरानी

ख़ुद में शायद उजड़ रहा हूँ मैं'

Comment by सालिक गणवीर on January 22, 2021 at 7:22pm

आदरणीय भाई  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक आभार.

Comment by सालिक गणवीर on January 22, 2021 at 7:08pm

आदरणीय Samar kabeer साहिब
आदाब
मुहतरम ये ग़ज़ल आपकी इस्लाह की मुंतज़िर है. ओ बी ओ पर कल ही अप्रूवल मिला है।

Comment by Samar kabeer on January 22, 2021 at 5:55pm

इस ग़ज़ल पर शायद मैं पहले टिप्पणी कर चुका हूँ, लेकिन वो नज़र नहीं आ रही है?

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 21, 2021 at 7:22pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

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