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वहाँ  मैं भी  पहुंचा  मगर  धीरे धीरे 

१२२    १२२     १२२     १२२   

बढी भी तो थी ये उमर धीरे  धीरे

तो फिर क्यूँ न आये हुनर धीरे धीरे

चमत्कार पर तुम भरोसा करो मत

बदलती  है  दुनिया मगर धीरे धीरे

हक़ीक़त पचाना न था इतना आसां

हुआ सब पे सच का असर धीरे धीरे

ज़बाँ की लड़ाई अना  का है क़िस्सा

ये समझोगे तुम भी मगर धीरे धीरे

ग़मे ज़िंदगी ने यूँ ग़फ़लत में  डाला

हुये इल्मो  फन बे असर धीरे  धीरे

जिधर रोशनी की झलक मिल रही है

चलो ना, चलें  हम  उधर धीरे धीरे

मुहब्बत इनायत शिकायत या नफरत

करेंगे  ये सारे   असर   धीरे  धीरे

अँधेरा  किसी  दिन  उजाला  बनेगा

उफ़क पर  दिखेगा सहर  धीरे  धीरे

दुकाने  बजारें  थियेटर  खुले   जब

हुआ  गाँव  मेरा  नगर  धीरे   धीरे

सभी  हड़बड़ी  में  गये गिरते पड़ते

वहाँ  मैं भी  पहुंचा  मगर  धीरे धीरे

वो अब तेज़ रौ के अलम  ना  उठायें

जो चलते  रहे  उम्र  भर  धीरे  धीरे 
**********************************

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 6, 2025 at 5:08pm

आदरणीय सौरभ भाई , दिल  से से कही ग़ज़ल को आपने उतनी ही गहराई से समझ कर और अपना कर मेरी मेनहत सफल कर दी आपका हार्दिक आभार |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 6, 2025 at 1:45pm

इस प्रस्तुति के अश’आर हमने बार-बार देखे और पढ़े. जो वाकई इस वक्त सोच के करीब लगे उन्हें रख रह हूँ~ - 

हक़ीक़त पचाना न था इतना आसां

हुआ सब पे सच का असर धीरे धीरे   ... उस्तादाना 

ज़बाँ की लड़ाई अना  का है क़िस्सा

ये समझोगे तुम भी मगर धीरे धीरे  ........ सिम्पली कमाल 

जिधर रोशनी की झलक मिल रही है

चलो ना, चलें  हम  उधर धीरे धीरे   ...   फलसफा खूबसूरती से जाहिर हुआ है 

मुहब्बत इनायत शिकायत या नफरत

करेंगे  ये सारे   असर   धीरे  धीरे  ......... सही बात 

इशारों को अगर समझो राज को राज रहने दो .. 

बधाइयाँ  बधाइयाँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 29, 2025 at 10:28am

आदरणीय सौरभ भाई , ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार , आपके पुनः आगमन की प्रतीक्षा में हूँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 29, 2025 at 10:26am

आदरणीय लक्ष्मण भाई ग़ज़ल की सराहना  के लिए आपका हार्दिक आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 25, 2025 at 7:03pm

वाह वाह 

आदरणीय, आपकी प्रस्तुति पर पुन: आता हूँ। 

करूँगा मैं चर्चा सबुर आप रक्खें 

पुन: आ रहा हूँ मगर धीरे-धीरे 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 24, 2025 at 9:31pm

आ. भाई गिरिराज जी, सादर अभिवादन। बहुत खूबसूरत गजल हुई है। हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 18, 2025 at 10:59am

आदरणीया प्राची जी , ग़ज़ल पर उपस्थित हो उत्साह वर्धन करने के लिए आपका हार्दिक आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 16, 2025 at 3:35pm

सभी अशआर बहुत अच्छे हुए हैं 

बहुत सुंदर ग़ज़ल 

कृपया ध्यान दे...

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