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मान और सम्मान की,नहीं कलम को भूख
महक  मिटे  ना पुष्प  की , चाहे जाये सूख |

 

खानपान  जीवित  रखे , अधर रचाये पान
जहाँ  डूब कान्हा मिले , ढूँढो वह रस खान |

 

दीपक पलभर जल बुझे, नित्य जले आदित्य
सकल जगत जगमग करे,कालजयी साहित्य |

 

अलंकार  रस  छंद  के , बिना  कहाँ रस-धार
बिन  प्रवाह  कविता  नहीं गीत  बिना  गुंजार |

 

अक्षर - अक्षर चुन सदा, शब्द गठरिया बाँध
राह दिखाये व्याकरण , भाव लकुठिया काँध |

 

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर , जबलपुर (म.प्र.)

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Comment

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Comment by Saurabh Pandey on September 11, 2012 at 12:29pm

भाव गहन मन में हुए, फूटी रस की धार
अरुण लिये संभावना, आया जग के द्वार.. .

 

Comment by MAHIMA SHREE on September 11, 2012 at 12:09pm

खानपान  जीवित  रखे , अधर रचाये पान
जहाँ  डूब कान्हा मिले , ढूँढो वह रस खान |

 

दीपक पलभर जल बुझे, नित्य जले आदित्य
सकल जगत जगमग करे,कालजयी साहित्य |

 बहुत ही सुंदर दोहे रचे .. आदरणीय निगम सर .. बधाई स्वीकार करें 

Comment by K.K.Singh Aamad Sadhupuri on September 11, 2012 at 12:00pm

ek mera doha padho ji

MAN   KE    SANG    JO   NACHTE,   ANT JAT   PACHHTAT

MAST MAJON KE CHAKKAR MAI,KASIKAIN MUH KI KHAT

Comment by K.K.Singh Aamad Sadhupuri on September 11, 2012 at 11:50am

bahut majedar dohe hain ji par abhi kabir vali bat nahi hai ji

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