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बोलो किसको राम कहूँ मै ( गीत ) गिरिराज भंडारी

बोलो किसको राम कहूँ मै

*********************

सबके दिल मे रावण देखा, बोलो किसको राम कहूँ मै !

 

धृतराष्ट्र से मोह मे अन्धे

अपना अपना बचा रहे है

चौक चौक मे दुर्योधन बन

चौसर द्युत सा सजा रहे है

 

भीष्म सदा ही चुप रहता है

बोलो किसको श्याम कहूँ मै

सबके दिल मे रावण देखा, बोलो किसको राम कहूँ मै !!

 

हर राजा सर चढ़ा ज़ुर्म है

भूले सारे सत्य - मर्म हैं

मानव सेवा की क़समे लें

केवल लूटें , यही धर्म है

तुम भूखे थे, रोटी छीनी

फिर किसको बदनाम कहूँ मैं

सबके दिल मे रावण देखा, बोलो किसको राम कहूँ मै !!!

सुबह हुई  पर डरी हुई है

धूप है लेकिन मरी हुई है

सारे मौसम  आतंकित हैं

सब में दहशत भरी हुई है

                                                                                    

सच कोने मे छिपा हुआ है

क्यों सच का संग्राम कहूँ मै

सबके दिल मे रावण देखा, बोलो किसको राम कहूँ मै !!!!

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 15, 2013 at 5:52pm

आदरणीया महिमा श्री जी , गीत के प्रयास की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार !!!!

Comment by बृजेश नीरज on October 15, 2013 at 2:07pm

वाह! बहुत ही सुन्दर गीत है! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by वेदिका on October 15, 2013 at 11:18am

मनमोहक सामयिक गीत प्रस्तुति हुयी है| सभी बंद अपने आप पूर्ण और प्रभावशाली है| 

सुबह हुई  पर डरी हुई है

धूप है लेकिन मरी हुई है

सारे मौसम  आतंकित हैं

सब में दहशत भरी हुई है

                                                                                    

ये पंक्तियाँ समाज मे बलनेरबिलिटी को बखूबी दर्शा रही है|

बहुत बहुत बधाई आ0 श्याम जी!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 15, 2013 at 9:50am

सबके दिल मे रावण देखा, बोलो किसको राम कहूँ मै !!-----एक सटीक कथ्य -----जब तक अन्दर का रावण नहीं मरेगा तब तक कैसे रामराज्य होगा 

 

तुम भूखे थे, रोटी छीनी

फिर किसको बदनाम कहूँ मैं-----आह निकल जाती है ये गरीबी भुखमरी देख कर 

सुबह हुई  पर डरी हुई है

धूप है लेकिन मरी हुई है

सारे मौसम  आतंकित हैं

सब में दहशत भरी हुई है---प्रकृति भी कहाँ अछूती है इस कलियुगी अत्याचार से ,बहुत शानदार बंद 

                                                                                    

सच कोने मे छिपा हुआ है

क्यों सच का संग्राम कहूँ मै

 

 कितना सार्थक लयबद्ध गीत लिखा आदरणीय गिरिराज जी दिल से बधाई आपको 

Comment by Sushil.Joshi on October 15, 2013 at 4:54am

तुम भूखे थे, रोटी छीनी

फिर किसको बदनाम कहूँ मैं,,,,,, वाह.... बहुत ही सार्थक एवं लयबद्ध प्रस्तुति है आदरणीय गिरिराज जी.... पूरे गीत ने बाँधकर रखा है... बधाई हो.....

Comment by MAHIMA SHREE on October 14, 2013 at 10:39pm

सुबह हुई  पर डरी हुई है

धूप है लेकिन मरी हुई है

सारे मौसम  आतंकित हैं

सब में दहशत भरी हुई है

                                                                                    

सच कोने मे छिपा हुआ है

क्यों सच का संग्राम कहूँ मै

सबके दिल मे रावण देखा, बोलो किसको राम कहूँ मै !!!!...

वाह वाह  यथार्थ को बहुत ही सुंदर ढंग से  प्रस्तुत करता गीत .... हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 14, 2013 at 12:46pm

आदरणीय बडे भाई अखिलेश जी , उत्साह वर्धन के लिये आभार !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 14, 2013 at 12:46pm

आदरणीय बडे भाई कपीश जी , गीत की सराहना कर उत्साह वर्धन के लिये आपका आभार !!!

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 14, 2013 at 12:34pm

छोटे भाई ,  बधाई । कलियुग में  रावण , शूर्पणखा की भरमार है, इसलिए देश का ये हाल है ।

Comment by Kapish Chandra Shrivastava on October 14, 2013 at 12:04pm


   गिरिराज , बहुत बढ़िया बहुत अर्थ पूर्ण और सामयिक गीत रचा है तुमने । बहुत बहुत बधाई । 

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