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ग़ज़ल - जानवर कितने समझदार मिले

बह्र- फाइलातुन मुफाइलुन फैलुन
2122 1212 22

शेर की खाल में सियार मिले।
जानवर कितने समझदार मिले।

मुझसे जो दूर दूर रहते थे,
जब पड़ा काम बार बार मिले।

जिनकी किस्मत में सिर्फ बीड़ी है,
उनके होठो पे कब सिग़ार मिले।

हर किसी की यही तमन्ना है,
देश में सबको रोजगार मिले।

कैसी हसरत है नौजवानों की,
उनको शादी मैं मँहगी कार मिले।

उसने टरका दिया हमें हर बार,
उससे दफ्तर में जितनी बार मिले।

अपनी किस्मत में खोट है साहब,
फूल चाहा तो हमको खार मिले।

नीबू जैसे हमें निचोड़ा है,
हमको ऐसे भी दोस्त यार मिले।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 29, 2017 at 7:59pm

आदर्णीय संदीपकुमार पटेल जी ग़ज़ल पसन्दगी के लिये सादर आभार

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 29, 2017 at 7:49pm

ग़ज़ल हुई है या हज़ल हुई है ..................बाकमाल सिस्टम पर तंज कसती हुई इस ग़ज़ल के लिए दिली मुबराकबाद आदरणीय 

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 25, 2017 at 3:52pm

आदर्णीय बलराम धाकड़ जी ग़ज़ल पसन्दगी के लिये सादर आभार

Comment by Balram Dhakar on December 25, 2017 at 11:23am

आदरणीय राम अवध जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने।दिल से मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं।

सादर।

Comment by surender insan on December 18, 2017 at 9:12am

वाह जी वाह बहुत अच्छा प्रयास ग़ज़ल का जी। बहुत बहुत बधाई हो जी।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 10, 2017 at 2:15pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय राम अवध जी, बधाई स्वीकार करें।

Comment by Gajendra shrotriya on November 7, 2017 at 3:37pm
आ० रामअवध जी नमस्कार!बहुत अच्छे और नये अशआर कहे हैं आपने। इस सार्थक और कामयाब ग़ज़ल के लिए मेंरी बधाई स्वीकार करें।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 6, 2017 at 11:19pm
आ. भाई रामअवध जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 6, 2017 at 8:53pm
वाह आदरणीय बहुत शानदार मतला के साथ ग़ज़ल खूब हुई..सादर
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on November 6, 2017 at 2:33pm
धन्यवाद आदरणीय मोहम्मद आरिफ सर जी ग़ज़ल सराहना के लिये।

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