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*धुआँ (सरसी छःन्द)*

आसमान में धुआँ धुआँ है, हुए सभी बेहाल |
व्याकुलता बढ़ती जाती है, जीना हुआ मुहाल ||

काली धुंध सड़क पे छायी, मुश्किल चलनी राह |
नर नारी सबके ही मुख से, निकल रही है आह ||

अस्त व्यस्त सारा जन जीवन, सुनता कौन पुकार |
आपस में कर खींचातानी,बढ़ा रहे तकरार ||

जिम्मेदारी भूल गए हैं, सभी बजाते गाल |
दिल के भीतर कालापन है, बिगड़ गयी है चाल ||

धुँधलायी नित बढ़ती जाती,उठता रोज सवाल |
फिक्र नहीं है यहाँ किसी को, मन में यहीं मलाल ||

आज प्रदूषण की चक्की में, पिसते हैं इंसान |
घुट घुट कर मरते जाते हैं, बालक वृद्ध जवान ll

धुँधली छाया मिट जाएगी, करें सभी मिल काम l
घर घर में चेतना जगाएं, दें अच्छा पैगाम ||

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by SALIM RAZA REWA on November 14, 2017 at 7:08pm
छोटे लाल जी,
ख़ूबसूरत रचना के लिए बधाई.
Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 14, 2017 at 8:01am

ज्वलंत समस्या पर सरसी छंद में खुबसूरत रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करे आ डॉ छोटेलाल सिंह जी 

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