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ग़ज़ल--बह्र फेलुन×5+फा

कुछ भूला कुछ पहचाना सा लगता है
कोई मुझको दीवाना सा लगता है ।

थोड़ी उलझन थोड़े आँसू जैसा वो
जीवन का ताना बाना सा लगता है ।

ग़ुरबत में देखा जो मुझको यारों ने
बोले कोई अंजाना सा लगता है ।

वक़्त बदलते देर नहीं लगती भाई
अपना होकर बेगाना सा लगता है ।

शाइर बनकर घूम रहा है देखो तो
'आरिफ़'कोई दीवाना सा लगता है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 23, 2017 at 7:44pm

आआ० आरिफ साहिब अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 23, 2017 at 5:38pm
मुहतरम जनाब आरिफ साहिब आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by Samar kabeer on November 23, 2017 at 5:23pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Afroz 'sahr' on November 23, 2017 at 1:52pm
जनाब आरिफ़ साहिब इस रचना पर बहुत बधाई आपको ,,

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