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ग़ज़ल- रातें हुईं पहाड़ बताओ मैं क्या करूँ।

बह्र- मफऊल फाइलात मफाईल फाइलुन

रातें हुईं पहाड़ बताओ मैं क्या करूँ।
वो दिल गई उजाड़ बताओ मैं क्या करूँ।

इज़हारे इश्क जो किया तो उसने गाल पर,
मारे हैं ताड़ ताड़ बताओ मैं क्या करूँ।

पल्लू से उसके फिर से मैं बँध जाऊँ दोस्तो,
कोई नहीं जुगाड़ बताओ मैं क्या करूँ।

क्या दिन थे वो हँसीन कभी छत पे राह में
होती थी छेड़छाड़ बताओ मैं क्या करूँ।

मेरे खिलाफ उसने कटा दी एफआईआर,
जाना है अब तिहाड़ बताओ मैं क्या करूँ।

तन्हा हूँ और सिर्फ है तन्हाई मेरे साथ,
गायब है भीड़भाड़ बताओ मैं क्या करूँ।

उस बेवफा की याद में रोता हूँ रात दिन,
अब मारकर दहाड़ बताओ मैं क्या करूँ।

आया खराब वक्त तो कमबख्त वक्त ने,
मुझको दिया पछाड़ बताओ मैं क्या करूँ।

मैंने तो तेरे इश्क में सब कुछ लुटा दिया,
गिरवीं है माँस हाड़ बताओ मैं क्या करूँ।

हड़तालियों ने खौफ से अपने ही आप जब,
तम्बू लिया उखाड़ बताओ मैं क्या करूँ

आया जो रात देर से बीवी ने क्लास ली,
जमकर पड़ी लताड़ बताओ मैं क्या करूँ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 4, 2017 at 8:46pm

आदरणीय अफरोज सर मिसरा बह्र में है। तख्ती लिखने के अनुसार नहीं की जाती है। हम जैसा पढ़ते हैं हमारे कान जैसा सुनते हैं उसी अनुसार बह्र का निर्धारण होता है। आप का बहुत बहुत शुक्रिया टीप्पणी करने के लिये।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 4, 2017 at 8:40pm

आदरणीय उस्मानी साहब बहुत बहुत शुक्रिया ग़ज़ल सराहना के लिये।

Comment by Ajay Tiwari on December 4, 2017 at 3:47pm

आदरणीय राम अवध जी,

ज़िन्दगी में हास्य भी ज़रूरी है. और इस ज़रुरत को आपकी ये ग़ज़ल बेहतर तरीके से पूरा करती है. हार्दिक बधाईयाँ.

सादर 

Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 4, 2017 at 11:49am

आ राम अवध विश्वकर्मा जी ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है पर तकनिकी पक्ष पर आ समर कबीर साहिब की टिपण्णी  से मुझे भी सिखने को मिली \ सादर नमन  

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on December 3, 2017 at 3:50pm
आद0 राम अवध विश्वकर्मा जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का बेहतरीन प्रयास किया है आपने,शायद रदीफ़ का चयन और उत्तम होता तो गजलियत निखर जाती। शेष आद0 समर साहब कह चुके हैं।। इस प्रस्तुति पर मेरी बधाई निवेदित है।सादर
Comment by Manoj kumar shrivastava on December 3, 2017 at 1:32pm

आदरणीय विश्वकर्मा जी बहुत ही अच्छी रचना है, बधई स्वीकार करें।

Comment by Mohammed Arif on December 3, 2017 at 7:40am
आदरणी राम अवध जी आदाब,
ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की बातों का गंभीरता से संज्ञान लें ।हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Samar kabeer on December 2, 2017 at 10:18pm
जनाब राम अवध जी आदाब,इस ग़ज़ल की रदीफ़ 'बताओ मैं क्या करूँ'एक सवाल है जो हर शैर में आप पूछ रहे हैं,जैसे मिसाल के तौर पर 'अब मारकर दहाड़''जमकर पड़ी लताड़'ये आप ऐसे प्रश्न पूछ रहे हैं,जिनका कोई क्या जवाब दे सकता है,और इसके कारण ग़ज़ल अपनी ग़ज़लियात खोकर हास्य ग़ज़ल हो गई है,और हास्य भी ऐसा जिस पर मुस्कुराना भी मुश्किल है,मेरा मश्विरा है, संजीदा ग़ज़लें कहें जो आप बहुत अच्छी कहते हैं,आपकी पिछली ग़ज़ल भी इन्हीं क़वाफ़ी पर मबनी थी,ग़ज़ल का मिज़ाज बहुत नाज़ुक होता है,और वो इस तरह के शब्द बर्दाश्त नहीं कर पाती,इसका ख़ास ख़याल रखना चाहिए,उम्मीद है आप मेरा इशारा समझ गए होंगे?
नवें शैर में शुतरगुर्बा दोष है ।
Comment by Afroz 'sahr' on December 2, 2017 at 9:30pm
आदरणीय राम अवध जी इस रचना पर बहुत बधाई आपको
"मेंरे ख़िलाफ़ उसने कटा दी एफआईआर" ये मिसरा लय में नहीं है,,,,देखिएगा
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 2, 2017 at 8:52pm
बेहतरीन काफ़िओं के साथ मज़ेदार किंतु विचारोत्तेजक ग़ज़ल के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब राम अवध विश्वकर्मा जी।

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