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दामन को तीरगी से बचाते चले गए - सलीम रज़ा रीवा

221 2121 1221 212 
दामन को तीरगी से बचाते चले गए
ईमाँ की रोशनी में  नहाते चले गए

 -
हम दर-बदर की ठोकरे खाते चले गए
फिर भी तराने प्यार के गाते चले गए
 -
कोशिश तो की भंवर ने डुबोने की बारहा
हम कश्ती-ए-हयात बचाते चले  गए

 -

रुसवाईयों के डर से कभी बज़्में नाज़ में
हंस-हंस के दिल का दर्द छुपाते चले गए

 -

अपना रहा ख़्याल न कुछ होश ही रहा
आँखों में उनकी हम तो समाते चले गए

 -

करता है जो सभी के मुक़द्दर का फ़ैसला
उसकी रज़ा की शम्अ जलाते चले गए

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Comment by Mohammed Arif on December 6, 2017 at 2:17pm

आदरणीय सलीम रज़ा साहब आदाब,

                                      बहुत ही प्यारी और बेहतरीन अशआरों से सजी ग़ज़ल । हर शे'र उम्दा । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

Comment by Afroz 'sahr' on December 6, 2017 at 12:41pm
आदरणीय सलीम रज़ा साहिब इस रचना पर बहुत बधाई आपको आपकी ग़ज़ल ने बहुत पुराने गीत,,
"उनके ख़्याल आए तो आते चले गए"
" दीवाना ज़िंदगी को बनाते चले गए"
की यादें ताज़ा कर दीं ,,,,,
Comment by Shyam Narain Verma on December 6, 2017 at 12:02pm
"क्या बात है ..... बहुत खूब ... बधाई आप को "
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 6, 2017 at 8:17am

जनाब सलीम रज़ा साहिब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें

Comment by SALIM RAZA REWA on December 5, 2017 at 9:27pm
जनाब समर साहब,
ग़ज़ल को महब्बत से नवाज़ने के लिए शुक्रिया,
रुसवाईयों "" कर दिया जाएगा
Comment by Samar kabeer on December 5, 2017 at 9:12pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

चौथे शैर के ऊला मिसरे में 'रुस्वाइओं' को "रुसवाइयों" कर लें ।

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