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'उन्होंने एक लघु कथा लिखी।फेसबुक पर आ गयी।हठात उसपर मेरी नजर पड़ी। शीर्षक,समापन सब मेरे थे।बापू की मूर्त्ति के नीचे ही वार्त्तालाप हुआ था।मैं चकित था।सुबह मैंने लिखी,अपराह्न तक दोस्त ने दुहरा दी।बापू की जयकार बोलने का इससे बढ़िया दूसरा तरीका शायद ही हो।'---
मधुकर जी एक ही साँस में इतना सब कुछ बोल गए।
'क्या जमाना आ गया ?', माधवी पति का उद्विग्न चेहरा देखकर बोली।
.
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on January 14, 2018 at 1:05pm

आदरणीया नीता जी,आभार आपका।

Comment by Manan Kumar singh on January 14, 2018 at 1:04pm

आभारी हूँ आदरणीया कल्पना जी।मनन हूँ मैं।

Comment by Manan Kumar singh on January 14, 2018 at 1:04pm

आभारी हूँ आदरणीय सतविंदर जी।

Comment by Nita Kasar on December 26, 2017 at 7:11pm

क्या ज़माना आ गया है उम्दा कथा के लिये बधाई आद०मनन कुमार सिंह जी ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 20, 2017 at 6:56pm

हार्दिक बधाई इस बढ़िया लघुकथा के लिए आदरणीय निलेश जी |

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 19, 2017 at 9:36pm

सही कही..क्या जमाना आ गया है.. फेसबुकिया लेखक कुछ इसे भी हैं.. बधाई आदरणीय

Comment by Manan Kumar singh on December 18, 2017 at 7:54pm

आदरणीय समर साहिब,आदाब एवं बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on December 18, 2017 at 5:22pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अपनी ही लघुकथा को आधार बनाकर एक और लघुकथा लिख दी वाह बहुत ख़ूब, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Manan Kumar singh on December 18, 2017 at 2:06pm

आभारी हूँ आदरणीया।

Comment by Neelam Upadhyaya on December 18, 2017 at 12:21pm

कम शब्दों में भी अत्यंत गंभीर विषय की अभियक्ति । बहुत ही बढ़िया । बधाई स्वीकार करें ।

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