For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

चलो ये मान लेते हैं... (ग़ज़ल)- बलराम धाकड़

1222, 1222, 1222, 1222

चलो ये मान लेते हैं कि दफ़्तर तक पहुँचती है।
मगर क्या वाकई ये डाक, अफ़सर तक पहुँचती है।

नज़र मेरी सितारों के बराबर तक पहुँचती है।
दिया हूँ, रोशनी मेरी हर इक घर तक पहुँचती है।

वहां कैसा नज़ारा है, चलो देखें, ज़रा सोचें,
नज़र सैयाद की चींटी के अब पर तक पहुँचती है।

शरीफ़ों की हवेली में ये आहें गूँजती तो हैं,
ज़रा धीरे भरो सिसकी, ये बाहर तक पहुँचती है।

किसी से भी पता पूछा नहीं उसने कभी लेकिन,
नदी अपनी मशक्कत से समन्दर  तक पहुँचती है।

जुआ उसने नहीं खेला, कभी चाही नहीं सत्ता,
बताओ द्रौपदी क्यों कर के चौसर तक पहुँचती है।

तुम्हारे पैतरेबाजी से दिल्ली दूर रहती है,
हमारी चीख बस नक्सल से बस्तर तक पहुँचती है।

(मौलिक/अप्रकाशित)
--- बलराम धाकड़

Views: 165

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Balram Dhakar on December 25, 2017 at 8:40pm

सुख़न नवाज़ी का बहुत बहुत शुक्रिया, मोहतरम जनाब नादिर ख़ान साहब। आपको ग़ज़ल पसंद आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ।
सादर

Comment by नादिर ख़ान on December 25, 2017 at 6:56pm

किसी से भी पता पूछा नहीं उसने कभी लेकिन,
नदी अपनी मशक्कत से समन्दर  तक पहुँचती है।

जुआ उसने नहीं खेला, कभी चाही नहीं सत्ता,
बताओ द्रौपदी क्यों कर के चौसर तक पहुँचती है।

तुम्हारे पैतरेबाजी से दिल्ली दूर रहती है,
हमारी चीख बस नक्सल से बस्तर तक पहुँचती है।

आदरणीय धाकड़ जी आपने अपने नाम अनुरूप धाकड़ अशआर कहे बहुत पसंद आए ... रचना थोड़ा सा  फिनिशिंग टच माँग रही है.... गुणीजनों ने उत्तम सुझाओ दिया है ...

Comment by Balram Dhakar on December 25, 2017 at 1:16pm

आदरणीय अजय जी,ग़ज़ल में शिरक़त, सुखन नवाज़ी और हौसला अफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया।
आपने बहुत बारीक़ी से कहन को समझा, आपके दोनों की सुझाव शिरोधार्य हैं।
सादर।

Comment by Ajay Tiwari on December 25, 2017 at 1:13pm

आदरणीय बलराम जी, 

छठे शेर में 'क्यों कर के' थोड़ा खटकता है 'मगर चौसर पे फिर भी द्रौपदी क्यों कर पहुंचती है' या 'बताओ द्रौपदी क्यों कर जुआघर तक पहुँचती है' जैसा कुछ किया जा सकता है. 

'शरीफ़ों की हवेली में ये आहें गूँजती तो हैं,
ज़रा धीरे भरो सिसकी, ये बाहर तक पहुँचती है।'     अगर सिसकी बहर नहीं पहुँचने देने की बात है तो मेरे ख्याल से पहले मिसरे में 'तो' की जगह 'भी' ठीक रहेगा. 

'किसी से भी पता पूछा नहीं उसने कभी लेकिन,
नदी अपनी मशक्कत से समन्दर  तक पहुँचती है '  क्या शेर है!

बेहतरीन ग़ज़ल हुई. हार्दिक बधाई. 

सादर 

Comment by Balram Dhakar on December 25, 2017 at 1:05pm

आदरणीय समर सर, ग़ज़ल में आपकी शिरक़त और हौसला अफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया। आपके द्वारा की गई प्रशंसा बेहतर लेखन के लिये सदा ही प्रोत्साहित करती है।
आपकी समझाइश और सुझाव हमेशा ही बेशकीमती और इसीलिये शिरोधार्य होते हैं।
सादर।

Comment by Samar kabeer on December 25, 2017 at 12:44pm

जनाब बलराम जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'दिया हूँ रौशनी मेरी हर इक घर तक पहुंचती है'

दिये की रौशनी कैसे हर इक घर तक पहुँचती है'?

'नदी अपनी मशक़्क़त से समन्दर तख़ पहुंचती है'

ये शैर बहुत पसंद आया ।

Comment by Balram Dhakar on December 25, 2017 at 12:34pm

सुख़न नवाज़ी का बहुत बहुत शुक्रिया, जनाब मोहतरम अफ़रोज़ साहब।
टंकण त्रुटि की ओर ध्यान आकर्षित करने का आभार। अवश्य सुधार कर लूँगा।
सादर।

Comment by Afroz 'sahr' on December 25, 2017 at 12:14pm
आदरणीय बलराम धाकड़ जी उम्दा ग़ज़ल है।बधाई स्वीकार करें। आख़िरी शेर के ऊला मिसरे में "तुम्हारे पैंतरे बाज़ी" को तुम्हारी पैंतरेबाज़ी करलें।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"मुहतरम जनाब आरिफ साहिब आदाब, ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया |"
5 minutes ago
Mohan Begowal replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"      प्यार मिलने को है जाना तो बहाना देखो बन न जाये कहीं  झूठा ये तमाशा …"
7 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"'तुम' के साथ क्या परेशानी है,बात तो "आप" की वजह से है, आप तो ये बताएं कि मैंने…"
18 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"जनाब दिनेश कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । 'फ़ानी दुनिया…"
23 minutes ago
अजय गुप्ता replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"वाह। इस संकलन की सबसे आला ग़ज़लों में से एक। एक से बढ़कर एक शेर"
32 minutes ago
अजय गुप्ता replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"अच्छा प्रयास हुआ"
33 minutes ago
अजय गुप्ता replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"वाह। अच्छी ग़ज़ल कही। ए हवाओं मुझे कर देना......बढ़िया शेर। खास पसंद आया"
35 minutes ago
अजय गुप्ता replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"शुक्रिया अंजली जी"
39 minutes ago
अजय गुप्ता replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"शुक्रिया आरिफ़ साहब"
40 minutes ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"आ. तुम के साथ अगर यही वाक्य कहना हो तो?"
43 minutes ago
Mohammed Arif replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-95
"सर से पानी कहीं हो जाए न ऊंचा देखो |एक क़ातिल बना बैठा है मसीहा देखो |बहुत ख़ूब ! बहुत अच्छा तंज़ है…"
51 minutes ago
somesh kumar posted a blog post

दिव्य-कृति(कहानी )

“सर,इस सेम की बेल को खंबे पर लिपटने में मुश्किल आएगी |” मैंने सुरेंदर जी की तरफ़ देखते हुए…See More
55 minutes ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service