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तू अगर बा - वफ़ा नहीं होता - सलीम रज़ा रीवा

 2122 1212 22 

तू अगर बा - वफ़ा नहीं होता
दिल ये तुझपे फ़िदा नहीं होता   
-
इश्क़ तुमसे किया नहीं होता 
ज़िन्दगी में मज़ा नहीं होता
-
ज़िन्दगी तो  संवर गयी  होती 
ग़र वो मुझसे जुदा नहीं होता
-
उसकी चाहत ने कर दिया पागल 
प्यार  इतना  किया  नहीं  होता 
-
सबको दुनिया बुरा बनाती है
कोई इंसाँ बुरा नही होता
-
चोट खाएँ भी मुस्कुराएँ भी
अब रज़ा हौसला नहीं होता.
_____________________
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Tiwari on January 14, 2018 at 8:28pm

आदरणीय सलीम साहब, अच्छे अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

दूसरे शेर में एक 'तो' कम है. तीसरा शेर कुछ अपूर्ण सा है. मक्ता बहुत अच्छा है.

सादर 

Comment by Mohit mishra (mukt) on January 14, 2018 at 10:34am

प्रेम रंग से सराबोर अच्छी रचना आदरणीय ,
हार्दिक बधाई , सादर।

कृपया ध्यान दे...

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