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ग़ज़ल...इश्क़ चल के आ गया अपने हंसी अंजाम तक -बृजेश कुमार 'ब्रज'

2122 2122 2122 212
इश्क़ चल के आ गया अपने हंसी अंजाम तक
मुस्कुराती भोर से आँसू बहाती शाम तक

कल तलक तो साथ ही था हमनशीं हमदर्द सा
अनसुनी कर चल दिया अब दर्द का पैगाम तक

जा रहे हो छोड़कर इतना यकीं रखना सनम
हम सिमट जायेंगे तेरी याद तेरे नाम तक

है अजब सी ख़ामुशी सहमे हुये मंज़र सभी
मौन है अब दर दरीचा चुप्पी पसरी बाम तक

फिर सहर होगी यक़ीनन रात ये ढल जाएगी
क्या रखोगे हौसला तुम गर्दिशे अय्याम तक

'ब्रज' चले थे हौंसलों को पोटली में बाँध कर
ज़िन्दगी भर कर सफ़र पहुँचे दिले नाकाम तक
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Tuesday

आ. भाई बृजेश जी सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Monday

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सुरेन्द्र जी..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Monday

हार्दिक अभिनन्दन एवं आभार आदरणीय अजय जी..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Monday

आदरणीय समर कबीर जी सादर नमस्कार..सर्वप्रथम देरी के लिए माफ़ी चाहता हूँ..आपके सुझाव उम्दा हैं आदरणीय उनके मुताबिक सुधार करता हूँ..सादर

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 15, 2018 at 9:59am

आद0 बृजेश कुमार ब्रज जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने, शेष आली जनाब समर साहब कह चुके हैं। इस ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई

Comment by Ajay Tiwari on January 14, 2018 at 7:20pm

आदरणीय बृजेश जी, अच्छे अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई. शेष सब कुछ आदरणीय समार साहब कह चुके हैं.  

Comment by Samar kabeer on January 14, 2018 at 6:02pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले के ऊला मिसरे में 'हंसी' को "हसीं" कर लें ।

दूसरा शैर यूँ कर सकते हैं :-

'लन्तरानी भी मेरी सुनता था कल जो ग़ौर से

आज क्यों सुनता नहीं वो दर्द का पैग़ाम तक'

तीसरे शैर में शुतरगुर्बा दोष है,ऊला मिसरा यूँ कर लें :-

'जा रहा है छोड़कर इतना यकीं रखना सनम'

4थे शैर का सानी मिसरा यूँ कर लें :-

'हर दरीचा मौन है चुप्पी है पसरी बाम तक'

मक़्ते का सानी मिसरा यूँ कर सकते हैं:-

'देखना घर लौट कर आएंगे बुद्धू शाम तक'

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 14, 2018 at 5:07pm

आदरणीय आरिफ जी सादर नमस्कार..अपने बिलकुल दुरुस्त फ़रमाया..तीसरे,चौथे शेर एवं मक़्ते में गहराई नहीं ला पाया..काफी समय से इस ग़ज़ल के लिए प्रयासरत हूँ लेकिन सफलता नहीं मिली। पटल पे लाया हूँ ताकि बड़ों की तरफ से कुछ सुझाव मिलें और ग़ज़ल पूर्ण हो..क्योंकि इसका मतला मेरे दिल के बहुत करीब है।

Comment by Mohammed Arif on January 14, 2018 at 10:27am

आदरणीय बृजेश कुमार जी आदाब,

                    पूरी ग़ज़ल पढ़ी । जैसी आपकी ग़ज़लें हुआ करती है उस स्तर की नहीं लगी । यह मेरा मानना है । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियाँ  है, देखिएगा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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