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-धन्यवाद, पैसे खाते में आ गये।प्रयाग में विमोचन हो जाये?
-‎अच्छा रहेगा।
-‎हॉल वगैरह बुक कर दिया है।बस कुछ लोगों की व्यवस्था आप करा लीजिये।
-‎आपके प्रकाशन की और पुस्तकें भी हैं न?
-‎थीं,पर अब उनका विमोचन शायद अलग से हो।
-‎क्यूँ?
-‎लेखकों की भागीदारी पूरी नहीं हो रही है।
-‎फिर?
-‎यह कार्यक्रम आपका ही होगा।सम्मानित भी हो जायेंगे आप।
-‎बात तो समूह में पुस्तकों के विमोचन की थी।
-‎सम्भव नहीं है।
-‎फिर अलग से देखेंगे।मेरे पैसे में कितनी प्रतियाँ छपेंगी?
-‎दो सौ।
-‎छाप दीजिये',लेखक-कवि की वाणी सुदृढ़ थी।
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 15, 2018 at 5:54am

आद0 मनन कुमार सिंह जी सादर नमस्कार। बढ़िया लघुकथा, व्यंग कसते हुए, आजकल बहुत सम्पादक और लेखक हो गयेऐं।बधाई इस प्रस्तुति पर।

Comment by Manan Kumar singh on January 14, 2018 at 7:15pm
आदरणीय तिवारी जी,आपका बहुत बहुत आभार।आजकल ज्यादातर यही चल रहा है।जिसका साहित्य में कहीं नाम-पता नहीं,वह संपादक बनकर टहल रहा है।इस भीड़ में असली लेखक-संपादक तो जैसे खो ही जायेंगे।
Comment by Ajay Tiwari on January 14, 2018 at 6:26pm

आदरणीय मनन जी, कथा के माध्यम से आज के साहित्यिक परिदृश्य पर अच्छी टिप्पणी की है. हार्दिक बधाई 

Comment by Manan Kumar singh on January 14, 2018 at 5:13pm
बहुत बहुत शुक्रिया आरिफ भाई।
Comment by Mohammed Arif on January 14, 2018 at 3:54pm

आदरणीय मनन कुमार जी आदाब,

                           बहुत ही बेहतरीन लघुकथा । आजकल यही सबकुछ चल रहा है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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